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पाइपलाइन में बह गया भरोसा! जितना पानी खराब उतना बड़ा कारोबार, बोतलबंद पानी का चमका बाजार

जब नलों के पानी पर भरोसा टूटने लगा, तो बोतलबंद पानी का कारोबार फलने-फूलने लगा।भारत में पानी अब प्यास बुझाने का जरिया भर नहीं, जेब की ताकत और सेहत का सवाल भी बन चुका है।

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Apr 22, 2026
drinking water crisis: (AI photo)

Drinking Water Crisis bottle water demand: नल का पानी न जानें अब कैसा आए... नगर निगम की पाइपलाइन से टूटता भरोसा अब हर आम आदमी के जहन में है क्या यह पीने लायक है? शहरों से लेकर कस्बों तक पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि साफ और सुरक्षित पानी लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। यही कारण है कि बोतलबंद पानी का बाजार तेजी से फल-फूल रहा है और मजबूरी में लोग अपनी जेब ढीली कर रहे हैं। कहीं 20 रुपए की 1 लीटर पानी की बोतल है, तो कहीं वही पानी की बोतल 100-200 रुपए में बिक रही है। पानी की शुद्धता और सुरक्षा के नाम पर चल रहे इस पूरे खेल के बीच आम आदमी अपनी प्यास और खर्च दोनों के लिए संघर्ष कर रहा है।

सरकारी रिपोर्ट्स इस चिंता को ज्यादा स्याह और गहरा करती हैं, जो बताती हैं कि भूजल और सप्लाई का पानी कई जगह मानकों पर खरा नहीं है। ऐसे में पानी अब सिर्फ एक जरूरत नहीं, बल्कि एक महंगा प्रोडक्ट बन रहा है, सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में साफ पानी सिर्फ उन्हीं लोगों तक सीमित रह जाएगा, जो इसकी कीमत चुका सकें? पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट- जो सुना रही है प्यास, पानी और बाजार के बदलते दौर की कहानी...

इंदौर दूषित पानी से मौतों का दर्दनाक मामला ताजा है

नल से आने वाला पानी पीने लायक नहीं है। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के भागीरथपुरा का मामला इसका ताजा उदाहरण बना, जहां दूषित पानी पीने से 16 लोगों की जान चली गई। मौतों का यह आंकड़ा सरकारी है, लेकिन हकीकत में यह संख्या 35 से ज्यादा थी। वहीं 250 से 300 करीब लोग बीमार हुए थे। पानी पीने से मौतों का यह भयावह मामला लोगों को इतना अवेयर तो कर ही गया कि वो नगर निगम की ओर से भेजे जा रहे टैंकर के पानी का इंतजार करने के बजाय 15-20 लीटर बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने लगे। वहीं कुछ परिवारों ने अपने घरों में आरओ का यूज करना शुरू कर दिया।

एमपी के 55 में से 39 जिलों में भूजल का मतलब खतरे की घंटी

मध्यप्रदेश के बड़े शहरों खासतौर पर भोपाल-इंदौर में भूजल की स्थिति केवल उपलब्धता का नहीं, बल्कि गुणवत्ता का संकट दर्शाता रहा है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के 55 में से 39 जिलों में नाइट्रेट का स्तर 45mg/L की सुरक्षित सीमा से ऊपर पाया गया है, जो पीने के पानी के लिए खतरे की घंटी है।

सेंट्रल पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड(CPCB) भी अपने आकलन में साफ करता है कि शहरी इलाकों में भूजल प्रदूषण का बड़ा कारण अनट्रीटेड सीवेज और खराब वेस्ट मैनेजमेंट है। यही नहीं भोपाल पर किया गया एक वैज्ञानिक शोध भी इस स्थिति को स्पष्ट करता है, जहां कई सैंपलों में नाइट्रेट की सीमा जरूरत से ज्यादा दर्ज की गई। सीवेज का रिसाव सीधे भूजल में पाया गया। तेजी से होते शहरीकरण और अधूरी सीवेज व्यवस्था ने इन शहरों में भूजल को धीरे-धीरे असुरक्षित बना दिया है।

अकेले मध्य प्रदेश में नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भूजल की यह स्थिति और भी चिंताजनक तस्वीर दिखाती है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 20 फीसदी भूजल सैंपलों में नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है। जबकि करीब 28 फीसदी सैंपल किसी न किसी मानक पर खरे नहीं उतरते।

ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) द्वारा तय 45 mg/l की सीमा को पार करना सीधे जोखिम से जुड़ा है। सैंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड(CPCB) के मुताबिक शहरी भारत में नाइट्रेट की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। इनका मुख्य कारण अनट्रीटेड सीवेज और कचरा निपटान की खामियां हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत का 70 फीसदी भूजल प्रदूषित है। यह स्थिति बताती है कि भूजल प्रदूषण अब किसी एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय और गंभीर संकट बन चुका है। जहां पानी की उपलब्धता से ज्यादा उसकी शुद्धता सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।

अब बोतलबंद पानी पर ज्यादा भरोसा

स्थिति ये है कि मध्यप्रदेश समेत देशभर के ज्यादातर राज्यों में रहने वाले लोग अपने घरों में नलों के पानी का इस्तेमाल पीने और खाना बनाने के लिए तो बिल्कुल नहीं करना चाहते।

राजधानी भोपाल की अर्चना सिंह कहती हैं, हमारे यहां नर्मदा का पानी आता है। लेकिन वह इसे डायरेक्ट पीने के लिए या खाना बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं करतीं। उन्होंने घर में और अपने ऑफिस में भी आरओ लगा रखा है, ताकि पीने का पानी साफ और सुरक्षित मिले। हालांकि वे कहती हैं कि इसके बारे में भी सुना है कि यह पानी के मिनरल्स को खत्म कर देता है। यही नहीं उनका कहना है कि उन्हें हड्डियों और दांतों से जुड़ी कुछ समस्याएं हैं। डॉक्टर्स ने उन्हें आरओ का पानी पीने के लिए मना किया है। लेकिन वह आरओ का पानी नहीं छोड़ पा रहीं। उन्हें डर है कि यह सेहत को और ज्यादा खराब कर सकता है।

पुराने भोपाल (सिटी) में रहने वाली साक्षी पटेल हाल ही अपने नये घर में शिफ्ट हुई हैं। पहले उनका परिवार नॉर्मल पानी का इस्तेमाल करता था। लेकिन करीब एक साल 6 महीने पहले हुई बेटी को वह पानी सूट नहीं किया। बार-बार लूज मोशन होने के कारण डॉक्टर्स ने उसे आरओ का पानी पिलाने की सलाह दी। बस फिर क्या था साक्षी बताती हैं कि मैंने सबसे बेहतर आरओ ढूंढ़ने में 1 महीना निकाल दिया। जब नये घर में शिफ्ट हुई तो वहां इसी महंगे आरओ को लगवाया। 20 हजार के इस आरओ में पानी का स्वाद और उसकी जरूरी चीजें जैसे मिनरल्स मिल जाती हैं। हालांकि वह यह कहने से भी नहीं चूंकि कि ऐसा उन्हें आरओ कंपनी वालों ने बताया है यह कितना सच है यह तो वही जानें। लेकिन फिलहाल आरओ के पानी के इस्तेमाल से उनकी बेटी को अक्सर रहने वाली लूज मोशन की समस्या बिल्कुल खत्म हो गई। भले ही उन्होंने अपनी हैसियत के मुताबिक खर्च कर आरओ लगवाया है।

इंदौर के पीथमपुर में आरओ के साथ ही 15-20 लीटर बोतलबंद पानी का इस्तेमाल भी बताता है कि लोग अब साफ और सुरक्षित पानी पीना चाहते हैं। ऐसे कई मामले उस वक्त सामने आए जब लोगों ने कहा था कि भले ही कम पानी पिएं लेकिन वह शुद्ध हो, अपनों को खोने का जख्म अब और नहीं...।

दुकानों से घरों तक पहुंचा बोतलबंद पानी

30-40 रुपए में मिलने वाला इस बोतलबंद पानी से भरे सैकड़ों वाहन शहर भर की सड़कों पर दौड़ते नजर आते हैं। शहर की दुकानों पर कभी इनका दिखना आम था, लेकिन अब ये घरों तक पहुंच चुके हैं। चार सदस्यों के एक परिवार में जहां गर्मियों के दिनों में एक महीने में करीब 15-18 बोतलें खाली होती हैं। तो एक बड़े परिवार में पानी की बोतलों की सप्लाई का आकड़ा महीने के 30-31 दिन से दोगुना पहुंच रहा है।

सिर्फ प्यास बुझाने का जरिया नहीं, सुरक्षा, स्टेटस और ब्रांड का बाजार भी

भोपाल, इंदौर या पूरे मध्यप्रदेश में ही नहीं भारत भर में ऐसे करोड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। अगर ये कहें कि भारत अब ऐसा देश बनता जा रहा है, जहां पानी अब सिर्फ प्यास बुझाने का जरिया भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा बाजार बन चुका है, जहां सुरक्षा, स्टेटस और ब्रांड की कीमतें अलग-अलग तय होती हैं। एक ओर जहां रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर एक लीटर पानी की बोतल 20-30 रुपए में मिलती है, तो दूसरी ओर फाइव स्टार होटल्स, एयरपोर्ट और मॉल्स में यही बोतलबंद पानी 100 से 200 रुपए या उससे भी ज्यादा कीमत पर बेचा जा रहा है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं रहा कि क्या यह सिर्फ पैकेजिंग का फर्क है.... या फिर देश में पानी की हकीकत कुछ और ही कहानी सुना रही है।

भारत में बोतलबंद पानी का कारोबार 80-90 हजार करोड़ पार

भारत में बोतलबंद पानी का कारोबार 80-90 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चुका है। दूसरी तस्वीर कि यह तेजी से बढ़ भी रहा है। मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में जहां भूजल और नल-जल की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं। वहां मिनरल वॉटर की मांग लगातार बढ़ रही है। इंदौर जैसी घटनाओंके बाद लोगों का भरोसा पाइपलाइन से हटकर पैकेजिंग वॉटर पर शिफ्ट होता दिख रहा है। ऐसे में यह सेक्टर तेजी से बूम कर रहा है और बड़ा उपभोक्ता बाजार बन गया है।

बड़ा असंगठित बाजार

मध्यप्रदेश में मिनरल वॉटर का कारोबार का कोई एक आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं हो पाया। लेकिन संस्थागत मांग, शहरी विस्तार और पानी की गुणवत्ता पर बढ़ते सवालों के कारण यह सेक्टर तेजी से फल-फूल रहा है। अस्पतालों, शिक्षण, संस्थानों और आवासीय कॉलोनियों में सालभर की स्थिर मांग साफ संकेत देती है कि पैकेज्ड वॉटर अब एक बड़ी जरूरत बन चुका है। वहीं हजारों छोटे RO प्लांट्स और जार सप्लाई नेटवर्क इस कारोबार को एक बड़े लेकिन असंगठित बाजार में बदल रहे हैं। इसका वास्तविक आकार सरकारी आंकड़ों से कहीं बड़ा है।

भारत की टॉप 10 वाटर कंपनियां

  • बिसलेरी (Bislery)- भारत की सबसे पुरानी और डोमिनेंट ब्रांड है, इसकी मार्किट लीडरशिप लंबे समय से बरकरार है
  • किनली (kinley) - कोका कोला कंपनी का ये ब्रांड रेलवे, एयरपोर्ट, इवेंट्स में जरूर मिल जायेगा।
  • एक्वाफिना (Aquafina)- पेप्सिको का प्रोडक्ट है
  • इनके अलावा - रेल नीर(Railneer), बेली(Bailey), टाटा कॉपर-वाटर(Tata copper-water), हिमालयन वाटर (Himalayan water) भी इस लिस्ट में शामिल हैं

ऑरगनाइज़्ड सेक्टर में ये ब्रांड जरूर दिखते हैं, लेकिन टोटल कंसप्शन का बड़ा हिस्सा लोकल सप्प्लायर्स के पास है

घर के बोरिंग से खड़ा किया बिजनेस

नाम न छापने की शर्त पर भोपाल के एक शख्स ने बताया कि उनके क्षेत्र में लोग पीने के पानी के लिए बहुत परेशान होते हैं। नलों में सप्लाई होने वाला पानी कभी-कभी बहुत गंदा होता था। तो कभी उससे दुर्गंध आती थी। इस परेशानी को देखते हुए उन्होंने अपने घर में बोरिंग खुदवा लिया। साफ पानी आने पर वह खुश हो गए। पहले उन्होंने अपने आस-पास वालों को साफ पानी ऐसे ही भरने की अनुमति दे दी, लेकिन बाद में उन्होंने इसे बिजनेस बना लिया। आज वह 15-20 लीटर और 5 लीटर वाली बोतलों में पानी पैक करते हैं और शहर की दुकानों, ऑफिसों और बड़ी संख्या में घरों तक भी भिजवाते हैं। वे बताते हैं कि हर महीने उपभोक्ताओं का आंकड़ा बढ़ता है। अकेले ये शख्स ही नहीं, भोपाल समेत पूरे मध्यप्रदेश और देशभर में असंगठित स्तर पर कई छोटी-मोटी फैक्ट्रियां शुरू करने वाले भी लाखों का कारोबार कर रहे हैं।

सुरक्षित पेयजल पर लोगों का भरोसा कम हुआ है

पानी के बेतहाशा बढ़ते कारोबार के पीछे सबसे बड़ा कारण है, सुरक्षित पेयजल पर लोगों का भरोसा कम होना। Central Ground Water Board (CGWB) की रिपोर्ट बताती है कि देश में करीब 20 प्रतिशत भूजल सैंपलों में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा से ज्यादा पाई गई है। वहीं Central Pollution Control Board के अनुसार शहरी इलाकों में नाइट्रेट, फ्लोराइड और बैक्टीरिया जैसे प्रदूषक पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। यानी साफ शब्दों में कहा जाए, तो लोगों के सामने विकल्प है या तो वे जोखिम उठाएं, या फिर बोतलबंद पानी खरीदें।

इन विकल्पों की वजह है कि अब पानी का बाजार दो हिस्सों में बंटता जा रहा है। पहला हिस्सा वह है जो ₹20 से ₹30 की सामान्य बोतल खरीदता है, जिसे कहा जा सकता है एक जरूरत है, इसका खर्च तो करना ही पड़ेगा।

वहीं दूसरा हिस्सा वह है, जो ₹100 से ₹200 तक की प्रीमियम बोतल खरीदता है। जहां पानी के साथ 'शुद्धता का भरोसा' और 'स्टेटस' भी बिकता है। Himalayan Water या Aava जैसे ब्रांड इसी प्रीमियम सेगमेंट को टारगेट करते हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय ब्रांड जैसे Evian और Perrier लग्जरी मार्केट में अपनी जगह बना चुके हैं।

  • नीता अंबानी जैसे अल्ट्रा वेल्दी लोग Acqua di Cristallo Tributo a Modigliani पानी का यूज कर रहे हैं। यह पानी दुनिया का सबसे महंगा पानी माना जाता है। जिसकी 750 mm की बोतल की कीमत 40-50 लाख तक या इससे अधिक है। इस पानी में 24 कैरेट सोना मिला होता है।
  • Aur'a Natural Gold Water भी पानी का एक लक्जरी ब्रांड है, जो ट्रांसिल्वेनिया के पहाड़ों से आता है। सोने के कणों के साथ प्राकृतिक एल्कलाइन पानी होने के कारण इसके अंदर डिटॉक्सिफाइंग गुण मौजूद होते हैं।
  • Evian ब्रांड का पानी भारत के अमीर लोगों के साथ ही क्रिकेटर्स और एक्टर, एक्टर्स यूज करते हैं। विराट कोहली और अनुष्का शर्मा अपनी फिटनेस को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं और वे एवियन नेचुरल स्प्रिंग वॉटर (Evian Natural Spring Water) पीते हैं। यह फ्रांस के आल्प्स पहाड़ों से आता है। यह 100% शुद्ध प्राकृतिक मिनरल वॉटर्स में गिना जाता है। Evian Natural Spring Water की गुणवत्ता खिलाड़ियों की फिटनेस के लिए अच्छी मानी जाती है। इसकी कीमत 600 रुपए से शुरू होकर 35 हजार रुपए या उससे भी ज्यादा तक हो सकती है।
  • Aava भी भारतीय अमीरों के बीच एक लोकप्रिय ब्रांड है। यह भारत की अरावली की पहाड़ियों से आता है। कांच की बोतलों में आने वाले इस पानी में प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट्स होते हैं, जो इसे प्रीमियम विकल्पों के बीच लोकप्रिया बनाते हैं

अमीर लोगों की पहली पसंद बना 100% शुद्ध और मिनरल्स युक्त पानी सिर्फ प्यास बुझाता, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए एंटीऑक्सीडेंट, हाई pH, मिनरल्स और लग्जरी लाइफ स्टाइल का सिंबल बन चुका है।

अब ये कहानी कैसे न कहे कोई

लेकिन पानी की इस कहानी का दूसरा पहलू भी है और वो भी बहुत गंभीर.. देश के कई हिस्सों में आज भी लोग साफ पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं और शहरी क्षेत्रों में भी पाइपलाइन लीकेज, सीवेज मिक्सिंग जैसी समस्याएं आम हैं। ऐसे में एक तरफ जहां एक वर्ग महंगे पानी पर खर्च कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग सुरक्षित पानी के लिए जूझ रहा है।

यानी भारत में अब एक ऐसा परिदृश्य बेहद अहम और सबसे बड़ा सवाल उठा रहा है कि क्या पानी भी अब 'आर्थिक असमानता' का प्रतीक बन गया है?

जब एक ही देश में कोई व्यक्ति 200 रुपए की बोतल खरीद रहा हो और दूसरा व्यक्ति दूषित पानी पीने को मजबूर हो, तो यह सिर्फ बाजार की कहानी नहीं रह गई, बल्कि लचर व्यवस्था का हिस्सा भी बन गई है। सरकार ने इस सेक्टर को रेगुलेट करने के लिए नियम जरूर बनाए हैं। Bureau of Indian Standards (BIS) के तहत हर पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर यूनिट को ISI मार्क लेना जरूरी है, जबकि Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) से लाइसेंस अनिवार्य है।

इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई अवैध यूनिट्स और बिना टेस्टिंग के सप्लाई की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। यानी एक तरफ सख्त नियम जरूर हैं, लेकिन दूसरी तरफ उनका पालन पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पा रहा।

सुरक्षित पेयजल को लेकर नजर आने वाला यह बड़ा बदलाव सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है। भोपाल, इंदौर जैसे टियर-2 शहरों में भी बड़ी रिहायशी सोसायटी, ऑफिस और अस्पताल नियमित रूप से पैकेज्ड पानी पर निर्भर हो चुके हैं। यानी पानी अब 'सरकारी सप्लाई' से बाहर निकलकर एक 'प्राइवेट प्रोडक्ट' की सूरत लेता जा रहा है।

Published on:
22 Apr 2026 07:00 am
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