
Paper Waste In India : फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने सभी फूड बिजनेस ऑपरेटर्स को अखबार में खाना पैक करने और परोसने से रोकने के साफ निर्देश दिए हैं। साथ ही इसके कई नुकसान भी बताए हैं। पर, आप यह जानकर हैरान हो सकते हैं कि इन रद्दी पेपर्स को फेंकना, जलाना या बेचना भी उतना ही खतरनाक है। यह रद्दी पेपर थोड़ा-बहुत नहीं बल्कि सालाना 4.5 मिलियन टन होता है।
भारत वर्तमान में लगभग 1.45 लाख मीट्रिक टन ठोस कचरा रोज पैदा करता है। इसमें 35% सूखा कचरा होता है, और इस सूखे कचरे में 21% हिस्सा केवल कागज और कार्डबोर्ड (गत्ते) का होता है। इस हिसाब से करीब 4.5 मिलियन टन सिर्फ कागज का कचरा बनता है।
गंगा नदी और भारत के अन्य जल स्रोतों पर शोध कर चुकीं पर्यावरण और क्लाइमेट एक्सपर्ट सुनंदा भोला (WII- वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और NAT Geo- नेशनल ज्योग्राफिक की पूर्व शोधार्थी) ने इस विषय पर पत्रिका के साथ बातचीत में कई महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं।
वह कहती हैं कि यह पेपर वेस्ट सबसे अधिक मात्रा में पैदा होता है। घर के आसपास, नदी किनारे, सड़क पर रद्दी अखबार या अन्य कागज के पैकेट्स पानी और धरती पर हर तरफ बिखरे दिख जाते हैं। लोग अक्सर इन कागजों को जला देते हैं, जबकि ऐसा करना भी बेहद खतरनाक है। भारत में पेपर वेस्ट (कागज का कचरा) एक गंभीर और तेजी से बढ़ता हुआ संकट है, जो पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।
कागज में मौजूद खतरनाक केमिकल्स को गिनाते हुए वह कहती हैं कि प्रिंटिंग वाले कागजों में ब्लीचिंग केमिकल्स, प्रिंटिंग इंक (स्याही), आर्सेनिक, कैल्शियम, कैडमियम, क्रोमियम, पारा, सीसा, टिन और नियोडिमियम जैसी भारी धातुएं पाई जाती हैं। जब आप इन्हें फेंकते हैं, तो ये कचरे के रूप में पानी या मिट्टी में जाकर मिल जाते हैं, जिससे गंभीर प्रदूषण फैलता है। इसलिए, सही तरीके से रिसाइकिल करना ही एकमात्र समाधान है।
IPPTA (क्वाटरली जर्नल ऑफ इंडियन पल्प एंड पेपर टेक्निकल एसोसिएशन) की शोध रिपोर्ट भी इसकी गंभीरता को रेखांकित करती है। भारत में कागज की वर्तमान खपत 16 से 22 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जिसके वर्ष 2026-2027 तक 6 से 7% की दर से बढ़कर 30 मिलियन टन प्रति वर्ष होने का अनुमान है।
चिंता की बात यह है कि भारत में उपयोग किए जाने वाले कुल कागज और पेपरबोर्ड का केवल 27% ही सालाना सिस्टम में वापस यानी रिसाइकिल हो पाता है। बाकी का सारा कचरा पानी और मिट्टी को दूषित करके हमें बीमार बना रहा है।
कागज को चमकाने के लिए क्लोरीन जैसे विषैले ब्लीचिंग केमिकल्स का इस्तेमाल होता है। जब ये कागज कचरे के ढेरों में सड़ते हैं, तो मीथेन गैस पैदा करते हैं, जो कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की तुलना में 25 गुना अधिक खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है। इसके अलावा, इसमें मौजूद भारी धातुएं पानी और मिट्टी में मिलकर उन्हें भी दूषित करती हैं।
फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI), देहरादून (2023) के सेल्यूलोज और पेपर डिसिप्लिन के शोधकर्ताओं - उन्नति चौधरी, रोहित गुसाईं, ज्ञानेश जोशी, आकाश देव और विकास राणा ने अपने शोध में बताया है कि भारत में वेस्ट पेपर के उचित पुन: उपयोग के लिए फिलहाल कोई विकसित, व्यवस्थित और टिकाऊ कचरा संग्रहण तंत्र (Waste Collection System) मौजूद नहीं है।
टंडन और अन्य शोधकर्ताओं (2013) ने अपने अध्ययन में बताया कि यदि अपशिष्ट कागज (वेस्ट पेपर) की रिकवरी दर में केवल 1% की भी वृद्धि की जाए, तो 0.2 मिलियन टन कच्चे माल, 0.16 मिलियन टन कोयले, 2750 मेगावाट बिजली और 7.7 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की बचत की जा सकती है।
बांदारा और इंदुनिल (2022) के अध्ययन के अनुसार, वर्जिन (नए) कागज की तुलना में रिसाइकिल किए गए कागज के उत्पादन में 50% कम पानी लगता है और वायु प्रदूषण में 74% की कमी आती है। साथ ही, 1 टन अखबार या प्रिंटिंग पेपर को रिसाइकिल करने से 1 से 2 टन लकड़ी (पेड़) को बचाया जा सकता है।
गौरतलब है कि 1 टन नया कागज बनाने के लिए 17 पेड़ों और 3,24,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। वर्ष 2027 तक हमारी मांग 30 मिलियन टन होने जा रही है। यदि हमारी रिकवरी और रिसाइकिल दर ऐसे ही कम रही, तो जंगलों का तेजी से सफाया हो जाएगा।
TBI की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 600 मिलियन (60 करोड़) से अधिक लोग पहले से ही भयंकर जल संकट (Water Stress) का सामना कर रहे हैं। कागज बनाने के लिए इतने विशाल पैमाने पर पानी का दोहन भविष्य में इस संकट को और गहरा कर देगा।
कचरे से निकलने वाली मीथेन गैस और कागज मिलों का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रहा है। वहीं, आर्सेनिक, लेड और मर्करी जैसी भारी धातुएं सीधे हमारे जल स्रोतों और कृषि योग्य भूमि को जहरीला बना रही हैं।
इस स्थिति को देखते हुए कचरे को सही तरीके से रिसाइकिल करके दोबारा उपयोग करना ही सबसे बेहतर विकल्प है। पर सवाल यह है कि क्या हम इसके लिए तैयार हैं? और अगर हम तैयार भी हैं, तो क्या सरकार ने इस तरह के सूखे कचरे को इकट्ठा करने के लिए कोई ठोस या विशेष व्यवस्था की है?