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Retinopathy of Prematurity : समय से पहले जन्मे बच्चों की आंखों पर संकट, जानें क्या है ROP

समय से पहले जन्मे बच्चों में अंधेपन का सबसे बड़ा कारण है ROP। जानें क्या है इसके जोखिम कारक, लक्षण और वह 30 दिन का गोल्डन रूल, जो आपके बच्चे की आंखों की रोशनी बचा सकता है। नेत्र विशेषज्ञ डॉ. जयदीप शर्मा से विस्तार से समझें।

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May 05, 2026

Retinopathy of Prematurity : क्या आप जानते हैं कि समय से पहले जन्मे बच्चे के पास अपनी आंखों की रोशनी बचाने के लिए केवल 30 दिनों का समय होता है? मेडिकल सांइस ने आज इतनी उन्नति कर ली है कि 25-26 हफ्तों में जन्मे बच्चों को भी जीवन मिल जाता है। लेकिन इन 'नन्हें योद्धाओं' के सामने जीवन की शुरुआत में ही कई चुनौतियां होती हैं, जिनमें से एक सबसे गंभीर चुनौती होती है- रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP)। यह एक ऐसी बीमारी है जो अगर सही समय पर न पकड़ी जाए, तो नवजात को जीवन भर के लिए दृष्टिहीनता का शिकार बना सकती है। भारत जैसे देश में, जहां प्रीमैच्योर जन्म (Premature Birth of Baby) दर अधिक है, इसके प्रति जागरूकता किसी संजीवनी से कम नहीं है।

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What is Retinopathy of Prematurity: क्या है ROP?

आमतौर पर गर्भ में पल रहे शिशुओं की आंखों की रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) का विकास गर्भावस्था के आखिरी महीनों में पूरा होता है। लेकिन जब बच्चा समय से बहुत पहले पैदा हो जाता है, तो इस प्रोसेस में बाधा उत्पन्न हो जाती है और जिसके चलते आंखों का विकास थम सकता है।

आंख के पर्दे (Retina) पर असामान्य रक्त वाहिकाएं बढ़ने लगती हैं। ये वाहिकाएं नाजुक होती हैं और इनसे रक्त का रिसाव हो सकता है, जिससे रेटिना पर निशान (Scar tissue) बन जाते हैं। यह रेटिना को अपनी जगह से खींच लेते हैं, जिसे 'रेटिनल डिटेचमेंट' कहा जाता है। यही स्थिति दृष्टिहीनता (blindness) का कारण बनती है।

Risk Factor : जोखिम की जद में कौन?

हर प्रीमैच्योर बेबी (Premature Baby)ROP का शिकार नहीं होता, लेकिन कुछ श्रेणियां अत्यंत संवेदनशील होती हैं।

  • जन्म के समय कम वजन: जिन बच्चों का वजन 1500 ग्राम (1.5 किलो) से कम होता है।
  • समय से पूर्व जन्म: 32 सप्ताह या उससे कम की गर्भावस्था में जन्मे बच्चे।
  • ऑक्सीजन थेरेपी: NICU (Neonatal Intensive Care Unit) में लंबे समय तक हाई-फ्लो ऑक्सीजन ( High Flow Oxygen) पर रहने वाले बच्चे।
  • अन्य जटिलताएं: एनीमिया, सांस लेने में तकलीफ (Respiratory distress), या बार-बार होने वाले इन्फेक्शन।

The 30-Day Rule : '30 दिनों का गोल्डन रूल'

ROP के मामले में समय ही सबसे बड़ा दुश्मन और सबसे बड़ा दोस्त है। मेडिकल रिर्पोट के अनुसार, किडनी या दिल की बीमारी के लिए शायद आपके पास इंतजार करने का समय हो, लेकिन आंखों के लिए नहीं। बच्चे के जन्म के 30 दिनों के भीतर पहली स्क्रीनिंग अनिवार्य है। यदि बच्चा बहुत अधिक प्रीमैच्योर है (28 सप्ताह से कम), तो यह स्क्रीनिंग और भी जल्दी (2-3 सप्ताह में) होनी चाहिए। इसे 'गोल्डन पीरियड' कहा जाता है क्योंकि इस दौरान बीमारी को पकड़ने पर इलाज 100% सफल हो सकता है।

Stages of ROP: बीमारी के चरण

  • स्टेज 1 और 2: यहां हल्का असामान्य विकास होता है। अक्सर ये बिना किसी इलाज के खुद ठीक हो जाते हैं, लेकिन कड़ी निगरानी जरूरी है।
  • स्टेज 3: यहां उपचार की तत्काल आवश्यकता होती है ताकि रेटिना (Retina) अलग न हो।
  • स्टेज 4: रेटिना आंशिक रूप से अपनी जगह छोड़ देता है।
  • स्टेज 5: रेटिना पूरी तरह अलग हो जाता है, जिससे दृष्टि पूरी तरह जा सकती है।

Modern Treatment Methods: आधुनिक उपचार पद्धतियां

आज के दौर में ROP का इलाज काफी प्रभावी और कम दर्दनाक हो गया है।

  • लेजर थेरेपी (Laser Photocoagulation): यह सबसे आम इलाज है। लेजर की मदद से रेटिना के उन हिस्सों को 'सील' कर दिया जाता है जहां रक्त वाहिकाएं ( blood vessels) नहीं पहुंची हैं, ताकि असामान्य विकास रुक जाए।
  • एंटी-वीईजीएफ इंजेक्शन (Anti-VEGF Injections): हाल के वर्षों में यह तकनीक बहुत लोकप्रिय हुई है। आंख में एक विशेष दवा का इंजेक्शन लगाया जाता है जो असामान्य वाहिकाओं की वृद्धि को रोकता है।
  • विट्रेक्टोमी (Vitrectomy): रेटिना आंशिक रूप से अपनी जगह छोड़ देता है और रेटिना पूरी तरह अलग हो जाता है, जिससे दृष्टि पूरी तरह जा सकती है जिसमें सर्जरी की आवश्यकता होती है, जो काफी जटिल होती है।

माता-पिता के लिए चेतावनी के संकेत

ROP की सबसे डरावनी बात यह है कि बाहर से आंखें बिल्कुल सामान्य दिखती हैं। बच्चा न रोता है, न उसे दर्द होता है। फिर भी, यदि स्थिति गंभीर हो जाए तो ये लक्षण दिख सकते हैं।

  • White Reflex पुतली के बीच में सफेद घेरा दिखना ।
  • Nystagmus आंखों का असामान्य रूप से डोलना ।
  • बच्चे का चीजों पर ध्यान केंद्रित न कर पाना।
  • Squint भेंगापन विकसित होना।

Challenges in India: भारत में चुनौतियां और समाधान

भारत में हर साल लगभग 35 लाख बच्चे प्रीमैच्योर पैदा होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पीडियाट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिस्ट (बच्चों के नेत्र रोग विशेषज्ञ) की कमी एक बड़ी चुनौती है।

  • टेली-मेडिसिन का बढ़ता प्रभाव: अब डिजिटल कैमरों (जैसे Wide-field Imaging) की मदद से NICU में ही बच्चे की आंखों की फोटो ली जाती है और शहर के विशेषज्ञ को भेज दी जाती है। इससे दूर-दराज के गांवों में भी बच्चों की रोशनी बचाई जा रही है।
  • कंगारू मदर केयर (KMC): शोध बताते हैं कि मां के स्पर्श और उचित पोषण से बच्चे का विकास बेहतर होता है, जो परोक्ष रूप से ROP के जोखिम को भी कम करता है।

बचाव और भविष्य की राह

ROP से जंग जीतने के लिए तीन स्तरों पर काम होना जरूरी है:

  • गाइनेकोलॉजिस्ट की भूमिका: कोशिश की जाए कि प्रीमैच्योर डिलीवरी न हो। मां का उचित स्वास्थ्य प्रबंधन जरूरी है।
  • पीडियाट्रिशियन का सजग होना: NICU से डिस्चार्ज करते समय हर प्रीमैच्योर बच्चे के डिस्चार्ज कार्ड पर 'ROP Screening' का उल्लेख अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
  • जन-जागरूकता: समाज में यह संदेश फैलाना कि हर प्रीमैच्योर बच्चा जोखिम में है।

पत्रिका की खास बातचीत डॉ. जयदीप शर्मा के साथ

ROP क्या है और यह समय से पहले जन्मे (Premature) बच्चों की आंखों को कैसे प्रभावित करता है?

उन्होंने इस सवाल के जवाब में बताया, रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) एक गंभीर नेत्र रोग है, जो मुख्य रूप से समय से पहले (Premature) और कम वजन वाले नवजात शिशुओं को प्रभावित करता है। सामान्य गर्भावस्था में, आंखों की रक्त वाहिकाओं (Blood vessels) का विकास अंतिम हफ्तों में पूर्ण होता है। लेकिन समय से पूर्व जन्म के कारण यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप, रेटिना (आंख के पर्दे) पर असामान्य और नाजुक रक्त वाहिकाएं उगने लगती हैं। इन वाहिकाओं से रिसाव होने पर रेटिना पर घाव के निशान (Scarring) बन जाते हैं, जो धीरे-धीरे पर्दे को अपनी जगह से खींच लेते हैं (Retinal Detachment)। यदि समय पर उपचार न मिले, तो यह स्थिति स्थायी अंधापन का कारण बन सकती है। जन्म के शुरुआती 30 दिनों में स्क्रीनिंग ही इसका एकमात्र बचाव है।

क्या हर प्रीमैच्योर बच्चे को ROP का खतरा होता है या इसके लिए वजन और जन्म का समय (Gestation period) मायने रखता है?

उन्होने बताया, हर प्रीमैच्योर बच्चे को ROP नहीं होता, लेकिन खतरा सभी में रहता है। इसमें वजन और जन्म का समय सबसे महत्वपूर्ण होता हैं। आमतौर पर, जिन बच्चों का वजन 1500 ग्राम (1.5 किलो) से कम है या जिनका जन्म 32 सप्ताह से पहले हुआ है, वे 'हाई रिस्क' श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा, जिन बच्चों को लंबे समय तक ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया हो या जिन्हें बार-बार इन्फेक्शन हुआ हो, उनमें खतरा और बढ़ जाता है। इसलिए, हम वजन और जन्म के समय को आधार मानकर ही स्क्रीनिंग की सलाह देते हैं, ताकि समय रहते दृष्टि बचाई जा सके।

माता-पिता को किन बाहरी लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए? क्या शुरुआती दौर में कोई लक्षण दिखाई देते हैं?

उन्होने बताया, माता-पिता के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि ROP के शुरुआती दौर में बाहर से कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते। न तो बच्चे की आंखें लाल होती हैं, न उनमें दर्द होता है और न ही बच्चा रोता है। आंखों की पुतली बाहर से बिल्कुल सामान्य और चमकती हुई दिखाई देती है। यही कारण है कि इसे 'साइलेंट ब्लाइंडनेस' कहा जाता है।

बाहरी लक्षण तभी नजर आते हैं जब बीमारी गंभीर (4 या 5) स्टेज पर पहुंच जाती है। उन लक्षणों में शामिल हैं:

  • पुतली के बीच में सफेद घेरा या चमक (White Reflex) दिखना।
  • आंखों का असामान्य रूप से हिलना या डोलना।
  • बच्चे का किसी रोशनी या खिलौने पर ध्यान केंद्रित न कर पाना।
  • भेंगापन (Squint) विकसित होना।

बच्चों की पहली स्क्रीनिंग कब होनी चाहिए? (जैसे कि '30 days rule' क्या है?)

उन्होने बताया, ROP के मामले में '30 डेज रूल' (30 Days Rule) जीवन रक्षक मंत्र की तरह है। इसका सीधा मतलब है कि समय से पहले जन्मे बच्चे की आंखों की पहली स्क्रीनिंग जन्म के 30 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से हो जानी चाहिए। यदि बच्चा बहुत अधिक प्रीमैच्योर है (28 सप्ताह से कम या 1 किलो से कम वजन), तो यह जांच 2 से 3 सप्ताह के भीतर ही हो जानी चाहिए। देरी होने पर रेटिना को होने वाला नुकसान स्थायी हो सकता है। स्क्रीनिंग के जरिए यह देखा जाता हैं कि रक्त वाहिकाओं का विकास सही दिशा में हो रहा है या नहीं। याद रखें, स्क्रीनिंग में देरी यानी जीवन भर का अंधेरा।

नवजात शिशुओं को दी जाने वाली 'ऑक्सीजन थेरेपी' और ROP के बीच क्या संबंध है?

उन्होने बताया, ऑक्सीजन थेरेपी और ROP के बीच गहरा और संवेदनशील संबंध है। समय से पहले जन्मे बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते, इसलिए उन्हें जीवित रखने के लिए अक्सर NICU में कृत्रिम ऑक्सीजन (Artificial Oxygen) दी जाती है। जब बच्चे को बहुत अधिक मात्रा में या अनियंत्रित (Fluctuating) ऑक्सीजन मिलती है, तो यह आंख के पर्दे (रेटिना) की सामान्य रक्त वाहिकाओं के विकास को रोक देती है। इसके जवाब में, शरीर प्रतिक्रिया करता है और रेटिना पर नई, असामान्य और बहुत ही नाजुक रक्त वाहिकाएं उगने लगती हैं। ये नई वाहिकाएं कमजोर होती हैं और इनमें से खून का रिसाव होने लगता है, जो बाद में 'रेटिनल डिटैचमेंट' और दृष्टिहीनता की ओर ले जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि ऑक्सीजन देना गलत है बल्कि ऑक्सीजन जीवन के लिए अनिवार्य है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा में अब 'टारगेटेड ऑक्सीजन थेरेपी' और ऑक्सीजन लेवल की निरंतर निगरानी पर जोर दिया जाता है, ताकि बच्चे की जान भी बचे और उसकी आंखों की रोशनी भी सुरक्षित रहे।

क्या सर्जरी के बाद बच्चा पूरी तरह सामान्य दृष्टि (Vision) पा सकता है?

उन्होने बताया, यदि ROP का पता शुरुआती चरणों (स्टेज 1, 2 या 3) में चल जाए, तो लेजर या इंजेक्शन जैसे उपचार के बाद बच्चा पूरी तरह सामान्य दृष्टि पा सकता है। आधुनिक तकनीक इतनी एडवांस्ड है कि सही समय पर इलाज मिलने से 90% से अधिक मामलों में रोशनी बचाई जा सकती है। हालांकि, यदि इलाज में देरी हो और बीमारी स्टेज 4 या 5 (रेटिना का अलग होना) तक पहुंच जाए, तो सर्जरी के बाद भी विजन सीमित रह सकता है। ऐसे बच्चों को भविष्य में चश्मा लगने या भेंगापन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

उपचार के बाद भी लंबे समय तक फॉलो-अप क्यों जरूरी है? क्या आगे चलकर मायोपिया (Myopia) या भेंगापन (Squint) जैसी समस्याएं हो सकती हैं?

उन्होने बताया, उपचार के बाद फॉलो-अप उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि खुद इलाज। ROP का इलाज हो जाने के बाद भी बच्चे की आंखों की बनावट और विकास पर असर पड़ता है। ऐसे बच्चों में भविष्य में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष), भेंगापन (Squint) और लेजी आई (Amblyopia) होने की संभावना सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं अधिक होती है। चूंकि बच्चे की आंखें उम्र के साथ बढ़ती हैं, इसलिए पर्दे की स्थिति और चश्मे के नंबर की नियमित जांच जरूरी है। फॉलो-अप के जरिए हम इन समस्याओं को शुरुआती दौर में ही पकड़कर चश्मे या एक्सरसाइज से ठीक कर सकते हैं, ताकि बच्चे का विजन डेवलपमेंट सामान्य रूप से हो सके।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सुविधाएं कम हैं, वहां 'टेली-रेटिनोपैथी' (Tele-ROP) कैसे मददगार साबित हो रही है?

उन्होने बताया, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 'टेली-आरओपी' (Tele-ROP) एक वरदान साबित हो रही है। अक्सर दूर-दराज के इलाकों में बच्चों के नेत्र विशेषज्ञ (Pediatric Ophthalmologist) उपलब्ध नहीं होते। इस तकनीक में प्रशिक्षित तकनीशियन NICU में ही एक विशेष डिजिटल कैमरे (Wide-field Camera) से बच्चे के पर्दे की हाई-रज़ोल्यूशन तस्वीरें लेते हैं। ये तस्वीरें तुरंत इंटरनेट के जरिए शहर में बैठे डॉक्टर को भेज दी जाती हैं। डॉक्टर वहीं से जांच कर बता देते हैं कि बच्चे को इलाज की जरूरत है या नहीं। इससे समय और पैसा दोनों की बचत होती है।

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