
क्या आपने कभी सुना है कि किसी धार्मिक नाटक का मंचन रात 10 बजे शुरू होता हो और तड़के 5 बजे तक जारी रहता हो और वह भी प्रतिदिन और कई दिनों तक? ऐसे नाटक में काम करने वाले कलाकार एक भी पैसा नहीं लेते हों? दूर-दूर से लोग ऐसे नाटक को टिकट खरीदकर देखने आते हों?
राजस्थान के अलवर शहर में इसी तरह के एक नाटक का मंचन साल 1958 में हो रहा है। वह भी हर साल। लगातार। रोजाना एक ही कहानी। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान भी यह परंपरा नहीं टूटी। इस साल यह नाटक मंचन 22 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 6 नवंबर तक चलेगा। इस नाटक का नाम है-महाराजा भर्तृहरि नाटक।
बरसों पुरानी यह अनूठी पहल अलवर में आज भी पूरी शिद्दत के साथ जारी है। श्री राजर्षि अभय समाज की ओर से वर्ष 1958 में पहली बार पारसी शैली में महाराजा भर्तृहरि नाटक मंचन शुरू हुआ था। इसके बाद यह क्रम कभी नहीं टूटा। साल-दर-साल जारी रहा। यह संस्था अब तक 1451 दिन इस नाटक का मंचन कर चुकी है।
महाराजा भर्तृहरि के जीवन पर आधारित यह नाटक आस्था, परंपरा और भारतीय रंगमंच की अनूठी मिसाल है। यह नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों की आस्था का प्रतीक भी है। अलवर में छह दशक से अधिक समय से हर साल मंचित हो रहा यह नाटक धार्मिक आस्था के साथ-साथ पारसी रंगमंच की समृद्ध परंपरा को भी जीवित रखे हुए है। कलाकारों का समर्पण और दर्शकों की निरंतर भागीदारी इसे अलवर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। अलवर शहर से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर बाबा भर्तृहरि धाम बना हुआ है, जहां हर साल मेला भरता है।
महाराजा भर्तृहरि को अलवर में लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। लोगों की गहरी आस्था है। नाटक देखने आने वाले कई श्रद्धालु भावविभोर होकर रंगमंच को बाबा भर्तृहरि का स्थान मानते हैं और अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु दोबारा नाटक देखने पहुंचते हैं और बाबा भर्तृहरि के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
पारसी रंगमंच अपनी भव्यता, विशिष्ट वेशभूषा, आकर्षक श्रृंगार, विशेष मेकअप और विशाल पर्दों के लिए जाना जाता है। इस शैली में विद्युत प्रकाश व्यवस्था और बड़े-बड़े पर्दों का विशेष महत्व होता है। पात्रों का मेकअप इस तरह किया जाता है कि लंबे मंचन के दौरान भी उसका प्रभाव बना रहे। वेशभूषा और श्रृंगार भी इस शैली को अन्य रंगमंचीय शैलियों से अलग पहचान देते हैं। पारसी शैली में नाटक का मंचन करना खर्चीला और मेहनत भरा कार्य है। इसके बावजूद श्री राजर्षि अभय समाज के कलाकार वर्षों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कलाकारों का निःशुल्क योगदान इस सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
महाराजा भर्तृहरि उज्जैन के राजा थे। उनके नाम से प्रसिद्ध तीन शतक नीति शतक, श्रृंगार शतक और वैराग्य शतक जीवन के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं। नाटक में इन्हीं तीनों पक्षों के माध्यम से महाराजा भर्तृहरि के जीवन और उनके आध्यात्मिक परिवर्तन को दर्शाया जाता है।
महाराजा भर्तृहरि के जीवन पर आधारित यह नाटक समाज को जीवन के संतुलन का संदेश देता है। व्यक्ति के जीवन में नीति, प्रेम और पारिवारिक संबंधों का अपना महत्व है, लेकिन सांसारिक मोह में पड़कर अपने कर्तव्यों को भूलना उचित नहीं है। अंततः आत्मज्ञान, वैराग्य और प्रभु भक्ति के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
राजर्षि अभय समाज के महामंत्री राजेंद्र प्रसाद शर्मा बताते हैं कि वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान भी अलवर में महाराजा भर्तृहरि नाटक का मंचन किया गया था। इससे जो आय हुई, उसको सरकारी राजकोष में जमा कराया गया, ताकि यह राशि सेना के काम में आ सके।