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Who is Popabai : न राजा का पता, न रियासत का… फिर भी मशहूर है पोपाबाई का राज, सादुलशहर में सजा है दरबार

Who is Popabai : ‘पोपाबाई का राज’... अव्यवस्था और अराजकता पर तंज कसने वाला यह जुमला राजस्थान विधानसभा तक में गूंज चुका है। श्रीगंगानगर के सादुलशहर में करीब एक दशक पहले जयपुर से मंगवाकर स्थापित करवाई गई पोपाबाई की प्रतिमा, दो पीढ़ियों की स्मृति से भी जुड़ी है। आखिर कौन थीं पोपाबाई, जिनका नाम कहावत बन गया और क्या है उनके राज की रोचक लोककथा? पढ़िए महेन्द्र सिंह शेखावत की खास​ रिपोर्ट।
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Updated: 5 Nov 2026, 12:49 PM IST
Popabai
कौन है पोपाबाई? (Photo: Rajasthan Patrika)

Who is Popabai : राजनीति में कभी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना हो, कभी प्रशासनिक व्यवस्था पर कटाक्ष करना हो या फिर कहीं कानून-कायदे ताक पर रखे नजर आएं तो एक जुमला खूब सुनाई देता है, ‘यहां तो पोपाबाई का राज है।’

कौन है पोपाबाई, कैसे बनी कहावत?

इस नाम का इस्तेमाल करने वाले भी कम नहीं और इसे सुनकर मुस्कुराने वाले भी खूब मिल जाएंगे। खास बात यह है कि इस जुमले को बोलने के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं पड़ती। सुनते ही इसका मतलब समझ में आ जाता है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में कुछ तो गड़बड़ है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि आखिर ये पोपाबाई थीं कौन? उनका राज कैसा था? वे कहां की रहने वाली थीं और उनके नाम पर अव्यवस्था का पर्याय बन चुकी यह कहावत कैसे चल पड़ी?

इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करें तो कहानी लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं और जनश्रुतियों की गलियों से होकर गुजरती है। इस कहानी का एक दिलचस्प सिरा श्रीगंगानगर जिले के सादुलशहर में भी मिलता है। यहां पोपाबाई केवल कहावत या राजनीतिक कटाक्ष तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका बाकायदा दरबार सजा हुआ है। कस्बे की श्री रामबाग कल्याण भूमि में उनकी प्रतिमा स्थापित है। मुक्तिधाम परिसर में दूसरी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के बीच पोपाबाई की प्रतिमा बरबस लोगों का ध्यान खींचती है। जिस नाम का इस्तेमाल लोग अव्यवस्था पर तंज कसने के लिए करते हैं, उसी नाम की प्रतिमा यहां पूरे सम्मान के साथ स्थापित है।

दो पीढ़ियों की स्मृति में सजा पोपाबाई का दरबार

सादुलशहर में पोपाबाई की प्रतिमा स्थापित होने के पीछे भी एक रोचक पारिवारिक प्रसंग है। करीब एक दशक पहले स्व. मोतीराम गोयल और उनके पुत्र स्व. गिरधारीलाल गोयल की स्मृति में उनके परिजनों सरोज गोयल, रितेश गोयल और अर्जुन गोयल ने यह प्रतिमा स्थापित करवाई थी।

परिवार के सदस्य रितेश गोयल ने बताया कि स्व. मोतीराम गोयल की प्रतिमा स्थापित करवाने का विचार उनके पुत्र गिरधारीलाल गोयल ने किया था। हालांकि, इस विचार को अमलीजामा पहनाने से पहले ही कुछ समय बाद गिरधारीलाल गोयल का भी निधन हो गया। इसके बाद परिवार ने अनुष्ठान करवाने वाले ब्राह्मण के सुझाव पर श्री रामबाग कल्याण भूमि में पोपाबाई की प्रतिमा स्थापित करवाने का निर्णय लिया। प्रतिमा जयपुर से मंगवाई गई और विधिवत स्थापित करवाई गई। इस तरह दो पीढ़ियों की स्मृति से जुड़ा यह प्रसंग सादुलशहर में पोपाबाई के दरबार की स्थापना का कारण बना। आज यहां आने वाले लोगों के लिए यह प्रतिमा कौतूहल का विषय भी है। आखिर पोपाबाई का नाम तो उन्होंने खूब सुना है, लेकिन उनकी प्रतिमा और मंदिर देखने का अनुभव कम ही लोगों को होता है।

विधानसभा में भी उठा सवाल, कौन थीं पोपाबाई?

पोपाबाई का नाम केवल गांवों की चौपालों, आम बोलचाल और राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहा। राजस्थान विधानसभा में भी उनके नाम पर खूब चर्चा हो चुकी है। दिलचस्प यह है कि जिस सदन में प्रदेश के कानून, नीतियां और सरकार का कामकाज तय होता है, वहां भी एक दिन पोपाबाई की पहचान को लेकर सवाल खड़ा हो गया था।

विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में जब पोपाबाई के बारे में पूछा था सवाल

27 जुलाई 2004 को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुमित्रा सिंह ने सदन में सवाल उठाया था कि क्या दो सौ माननीय सदस्यों में से कोई ऐसा है, जो जानता हो कि पोपाबाई कौन थीं? उन्होंने यह भी कहा था कि ‘पोपाबाई का राज’ का मुद्दा इस सदन में एक बार नहीं, अनेक बार उठाया गया है। उनके इस सवाल के बाद सदन में चर्चा का दौर चल पड़ा। करीब एक दर्जन सदस्यों ने पोपाबाई के राज पर टिप्पणियां कीं और सदन में ठहाके गूंजते रहे। इस दौरान तत्कालीन शिक्षा मंत्री घनश्याम तिवाड़ी की टिप्पणी भी खूब चर्चित हुई।

उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मुखातिब होते हुए कहा कि यदि वे पुरस्कार दें तो वह बताएंगे कि पोपाबाई कौन थीं। उनकी इस बात पर सदन में हंसी का माहौल बन गया। हालांकि, ठहाकों के बीच भी यह सवाल अपनी जगह कायम रहा कि आखिर पोपाबाई थीं कौन? यह प्रसंग बताता है कि पोपाबाई का नाम राजस्थान की राजनीतिक शब्दावली में कितना गहरे तक रच-बस चुका है। नेता एक-दूसरे पर कटाक्ष करने के लिए इस जुमले का इस्तेमाल करते हैं और सुनने वाले इसका आशय समझने में देर नहीं लगाते।

Photo: Rajasthan Patrika

लोककथाओं में पोपाबाई का रहस्यमयी राज

अब सवाल उठता है कि जिस पोपाबाई के नाम पर अव्यवस्था और अराजकता का जुमला बना, उनकी कहानी आखिर है क्या? इस बारे में लोककथाओं और धार्मिक कथाओं में अलग-अलग प्रसंग सुनने को मिलते हैं। बुजुर्गों के अनुसार कार्तिक माह में महिलाएं पोपाबाई की कथा सुनती हैं। इस कथा में स्वर्ग, धर्मराज, मृत्यु और मनुष्य के कर्मों का हिसाब-किताब जैसे प्रसंग आते हैं।

एक प्रचलित कथा के अनुसार, मृत्यु के बाद एक दंपती स्वर्ग पहुंचता है, लेकिन वहां का दरवाजा बंद मिलता है। वे दरवाजा खुलवाने की कोशिश करते हैं, तभी धर्मराज प्रकट होते हैं। पूछने पर बताया जाता है कि वहां पोपाबाई का राज है। इसके बाद दंपती को मृत्युलोक लौटकर सात दिन तक कथा सुनने और उद्यापन करने की सलाह दी जाती है। कथा में आगे आठ खोपरा, उनमें राई भरने और पांच कपड़े ऊपर रखने जैसी परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। कथा का समापन एक खास पंक्ति के साथ होता है, जिसे सुनने वाले भी दोहराते हैं,

‘राज है पोपाबाई का, लेखा लेगी राई-राई का’

इस पंक्ति का भाव है कि कर्मों का हिसाब बारीकी से होगा। राई के एक-एक दाने का भी लेखा लिया जाएगा। कथा में पोपाबाई के राज का जिक्र और कर्मों के हिसाब की यह बात अपने आप में दिलचस्प है। हालांकि, लोककथाओं में वर्णित इन प्रसंगों से पोपाबाई के वास्तविक ऐतिहासिक अस्तित्व, उनके जीवनकाल या किसी वास्तविक शासन की पुष्टि नहीं होती। कहावत का मतलब बदल गया, नाम रह गया।

समय के साथ पोपाबाई का नाम एक ऐसे जुमले के रूप में प्रचलित हो गया, जिसका इस्तेमाल व्यवस्था की बदहाली पर व्यंग्य करने के लिए किया जाने लगा। कहीं कोई जवाबदेही न हो, नियम-कायदे दिखाई न दें, हर कोई अपनी मर्जी से काम करता नजर आए या प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर पड़े तो लोग कह देते हैं ‘यहां तो पोपाबाई का राज है।’ इस जुमले की खासियत यह है कि इसमें किसी व्यक्ति या व्यवस्था का नाम लिए बिना ही पूरा कटाक्ष हो जाता है। राजनीतिक मंच हो, विधानसभा हो या आम बोलचाल, पोपाबाई का नाम आते ही बात का मर्म समझ में आ जाता है। शायद यही वजह है कि इतने वर्षों बाद भी यह कहावत लोगों की जुबान पर कायम है।

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5 Nov 2026, 12:49 PM IST
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