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Democratic Fight : महलों वाली धरती ने देश को सिखाया सवाल पूछना, पढ़िए राजस्थान में लोकतांत्रिक लड़ाई के 7 किस्से

Democratic Fight : राजस्थान से ही पंचायत से आरटीआई तक की शुरुआत हुई। अब जेन-जी आंदोलन की भी नींव भी इसी धरती पर पड़ी। आइए ऐसे राजस्थान के लोकतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई के सात किस्सों के बारे में शैलेन्द्र अग्रवाल की खास रिपोर्ट पढ़कर जानते हैं।
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Oct 16, 2026
Democratic Fight in Rajasthan
राजस्थान ने लोकतांत्रिक लड़ाई में हर बार बढ़चढ़ कर योगदान दिया है। (ChatGpt)

Democratic Fight : अगर कोई पूछे कि बापू के ग्राम स्वराज यानी पंचायतीराज की नींव देश में कहां पड़ी, सांसद-विधायक की तरह आमजन को सरकारी कागज़ दिखाने के हक़ की आवाज किस ज़मीन से उठी, किस एक ही राज्य से अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में अध्यक्ष, देश में मुख्य चुनाव आयुक्त, आरबीआई गवर्नर और देश की पहली महिला राष्ट्रपति तक निकले, जवाब एक ही है कभी रियासतों से पहचान रखने वाला राजस्थान। जेन-जी आंदोलन से भी इस राज्य का नाम अलग नहीं है।

कभी रियासतों, महलों-किलों से पहचान रखने वाली मरूधरा ने आज़ादी के बाद लोकतंत्र को ताकत देने में प्रमुख भूमिका निभाई। आप जानते हैं लोकतंत्र की वे सात कहानियां, जो 2047 तक दुनिया में देश का चेहरा बदलकर रख देंगी।

इस सफ़र की पहली अहम कड़ी थे वी. टी. कृष्णमाचारी, जो जयपुर रियासत के प्रधानमंत्री रहे और बाद में संविधान सभा में उपाध्यक्ष चुने गए। योजना आयोग में रहते हुए सामुदायिक विकास की नींव रखी, उसी ने पंचायती राज की सोच को बल दिया। वे नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की वित्तीय समावेशन से जुड़ी कमेटी के अध्यक्ष भी रहे। अब हम बात करते हैं लोकतंत्र के सफर की।

1. स्थानीय शासन: बगदरी से पंचायतीराज की शुरुआत

2 अक्टूबर 1959, गांधी जयंती का वह दिन, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नागौर जिले के बगदरी गांव पहुँचे और देश में पंचायती राज की नींव रखी। पर लोकतंत्र की इस सबसे निचली और महत्वपूर्ण सीढ़ी का रास्ता आसान नहीं रहा। पंचायतीराज की नींव राजस्थान में रखे जाने के बावजूद शुरुआती 28 में से करीब 20 वर्ष पंचायतों के चुनाव नहीं हुए। हाल ही करीब एक-डेढ़ साल तक पंचायत और निकाय चुनाव टाले गए। "वन स्टेट, वन इलेक्शन" का तर्क देकर चुनाव टलते रहे। मामला तीन बार हाईकोर्ट पहुंचा, तब कोर्ट ने 15 नवम्बर 2026 की समयसीमा तय कर राज्य निर्वाचन आयोग से सीधे चुनाव कार्यक्रम ही मांग लिया। निकाय चुनावों के बाद अब पंचायत चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

2. लोकतंत्र में चौकीदारी: सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, आरबीआई और सीएजी

अब आते हैं लोकतंत्र में चौकीदारी पर। यह किस्सा कुर्सी का नहीं, लोकतंत्र की पहचान का है। डूंगरपुर में राजपरिवार में जन्मे डॉ. नागेन्द्र सिंह पहले देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने, जो चौथे मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। इसके बाद हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अध्यक्ष बने। वे भारतीय सिविल सेवा में आजादी से पहले आए और संविधान सभा के सदस्य भी रहे। राष्ट्रपति के सचिव, संयुक्त राष्ट्र सभा और संयुक्त राष्ट्र अन्तरराष्ट्रीय विधि आयोग में भारत के प्रतिनिधि रहे। वे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश पद तक पहुंचने वाले पहले भारतीय थे। वे अकेला नहीं हैं, जिन्होंने राजस्थान की माटी में जन्म लेकर आज़ादी के बाद लोकतंत्र को दिशा दी।
और आज? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश दलवीर भंडारी का अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में दूसरा कार्यकाल है। भारत की ओर से अब तक किसी ने इस न्यायालय में देश का दो बार प्रतिनिधित्व नहीं किया।

न्याय का शीर्ष संस्थान सुप्रीम कोर्ट: जोधपुर में जन्मे राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस.के. मल लोढ़ा के पुत्र आर. एम. लोढ़ा भारत के मुख्य न्यायाधीश बने। उनका रहन-सहन भले सादगीपूर्ण है, लेकिन उन्हें न्यायपालिका में उच्च आदर्शों के लिए जाना जाता है।

अर्थव्यवस्था का शीर्ष संस्थान भारतीय रिजर्व बैंक: देश की मौद्रिक नीति की कमान इन दिनों राजस्थान में जन्मे संजय मल्होत्रा के हाथ में है। 1990 बैच के राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी मल्होत्रा आरबीआई के मौजूदा गवर्नर हैं। वित्त मंत्री बनने से पहले डॉ. मनमोहन सिंह भी आरबीआई गवर्नर रहे, जो दो बार देश के प्रधानमंत्री रहे। वे जयपुर स्थित विकास अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष और राजस्थान से राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

नीति आयोग: पहले उपाध्यक्ष रहे प्रो. अरविंद पानगड़िया भी राजस्थान के ही हैं, उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। इससे पहले प्रमुख अर्थशास्त्री विजय शंकर व्यास भी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक सलाहकार परिषद में रहे थे।

नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक-सीएजी: यह संस्थान सरकारी खर्च की ऑडिट करने वाला देश का प्रमुख व विश्वसनीय संस्थान है। इस संस्थान का राजस्थान को दो बार नेतृत्व करने का मौका मिला। पहली बार राजीव गांधी के कार्यकाल में, जब टीएन चतुर्वेदी ने सीएजी का जिम्मा संभाला। कुछ साल पहले मोदी सरकार के कार्यकाल में राजीव महर्षि भी इस पद का जिम्मा संभाल चुके। वे केंद्र में वित्त और गृह सचिव तथा उससे पहले राजस्थान के मुख्य सचिव भी रहे।

केन्द्रीय सूचना आयोग: आमजन के सूचना के अधिकार की रक्षा कर उसे सरकारी जानकारी दिलाने वाले सूचना का अधिकार के केंद्रीय आयोग में भी राजस्थान की छाप रही। केन्द्रीय सूचना आयाोग में मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में राजस्थान मूल के आईएएस हीरालाल सामरिया ने कुछ ही समय पहले अपना कार्यकाल पूरा किया। इससे पहले राजस्थान कैडर के आईएएस सुधीर भार्गव भी इस आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त रहे थे।

3. जानने का हक़: देवडूंगरी से दिल्ली तक

मेरा जानने का हक रे…म्है नहीं मांगा गाडी-बंगला…जैसे गीत तो आपने सुने ही होंगे। नहीं सुना, कोई बात नहीं, हम आपको बता रहे हैं राजस्थान ने देश को सबसे बड़ा हथियार दिया और वह है सरकार को आमजन को कागज़ दिखाने को कहने का हक़।

भारतीय प्रशासनिक सेवा की नौकरी छोड़कर आई अरुणा रॉय 1987 में राजसमंद ज़िले के देवडूंगरी गांव आईं। वे मूलत: दक्षिण भारत से हैं, लेकिन उन्होंने अपनी कर्मस्थली राजस्थान को बनाया। 1990 में मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) बनाया। उन्होंने शुरूआत में मज़दूरी और राशन के रिकॉर्ड देखने की मांग से आंदोलन शुरू किया। जन सुनवाइयों से शुरू होकर यह सिलसिला सूचना का अधिकार और ग्रामीणों को काम के हक़ की मांग तक पहुंचा। सितंबर 1995 में ब्यावर की जनसभा को सूचना के अधिकार की पहली सार्वजनिक मांग माना जाता है। करीब 6 महीने बाद ब्यावर के चांग गेट पर 40 दिन धरना चला, जिसमें ग्रामीण महिलाएं बड़ी संख्या में थीं। उनकी अगुवाई अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह ने की। आंदोलन ने पहले राज्य में सूचना का अधिकार दिलाया और फिर 2005 में राष्ट्रीय स्तर पर कानून बना। कहानी यहां ही ख़त्म नहीं होती। एमकेएसएस से जुड़े निखिल डे कहते हैं कि सरकारें कानून को कमज़ोर बना रही है, इस वजह से लड़ाई जारी है।

4. कलम की ताक़त: जब समाचार से गूंजी विधानसभा

2 अक्टूबर 1978 को राजस्थान पत्रिका में छपे अग्रलेख की गूंज चार दिन तक राजस्थान विधानसभा में रही।प्रेस की आज़ादी और विधायकों के विशेषाधिकार पर लंबी बहस चली। करीब 35 वर्ष पहले संविधान में उसके मूल स्वरूप में रहे पुरातन काल के चित्रों को अनिवार्य करने की मांग भी सुप्रीम कोर्ट में उठाई गई।

फिर आया 2017। जनता की आवाज़ दबाने के लिए लाए जा रहे कानून के ख़िलाफ़ राजस्थान पत्रिका ने साफ़ कह दिया: "जब तक काला, तब तक ताला।" नतीजा, सरकार को उस अध्यादेश और उसके स्थान पर पेश विधेयक को विधानसभा में वापस लेना पड़ा। कलम की ताकत से पत्रकारिता में विशेष स्थान बनाने वालों में राजस्थान के कई पत्रकार शामिल रहे हैं।

5. काला कोट, लोकतंत्र को रोशनी

कानून की दुनिया में राजस्थान का नाम बड़ा है:

एल. एम. सिंघवी: ब्रिटेन में उच्चायुक्त रहे। 73वें संविधान संशोधन की ज़मीन तैयार करने वाली संसदीय समिति भी उनके नेतृत्व में बनी।

गुमानमल लोढ़ा: सामाजिक न्याय के नज़रिए से न्याय व्यवस्था को विकसित किया। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश, गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा सदस्य रहे।

राम जेठमलानी: वकालत के माध्यम से विधि के क्षेत्र में प्रमुख स्थान पर रहे और राजस्थान से राज्यसभा में सदस्य रहे।

अभिषेक मनु सिंघवी: जुलाई 2020 में राजस्थान में सियासी खींचतान के समय हाईकोर्ट में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पैरवी की। वे राजस्थान के होने के साथ ही यहां से राज्यसभा में सदस्य भी रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में वकालत में उनकी अलग पहचान है।

6. लीडर: राजनीति से अर्थनीति तक

राजनीति: प्रतिभा देवीसिंह पाटिल पहले राजस्थान की पहली महिला राज्यपाल रहीं, फिर देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। उनका राजस्थान से पारिवारिक जुड़ाव भी है।

मुख्यमंत्री रह चुके भैरोंसिंह शेखावत और केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके वरिष्ठ अधिवक्ता जगदीप धनखड़ देश में उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचे। एक दौर ऐसा भी आया जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति धनखड़ राज्यसभा के सभापति थे और कोटा के ओम बिरला लोकसभा के अध्यक्ष। दोनों सदनों की कमान राजस्थान से नाता रखने वाले दोनों नेताओं के हाथ में थी।

उद्योग जगत: शेखावाटी सहित राजस्थान के कई इलाकों के उद्योगपतियों ने कोलकाता से ब्रिटेन तक और कई देशों में पहचान बनाई। बिड़ला समूह, बजाज समूह, पीरामल समूह, लोढ़ा समूह, स्टील किंग एल. एन. मित्तल और वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल, उद्योग जगत से जुडे कुछ ऐसे बडे नाम हैं जिनका राजस्थान से पूर्व में नाता रहा है ।

7. नया दौर: नीट से ज्ञानेश तक

अब आज की कहानी। इस साल एक नया शब्द चर्चा में आया, जेन-जी। सीजेआई सूर्यकांत के कॉकरोच शब्द का प्रयोग करने के बाद इसी साल अस्तित्व में आई सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यसमिति में जयपुर के आशुतोष रांका और अलवर के दीपक बालियान प्रमुख भूमिका में हैं। यह जोड़ी पहली बार तब सुर्खियों में आई, जब नीट को लेकर दिल्ली में हुए आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद जेन-जी ने राजस्थान के बदहाल और जर्जर स्कूलों में भी धूम मचाई। अब निशाने पर हैं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार। दिल्ली में उनके इस्तीफे, एसआईआर रद्द करने और चुनाव प्रणाली दुरुस्त करने की मांग उठ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रूप से निलंबित करने से इनकार किया, तो आंदोलन की आवाज़ और तेज़ हो गई। इसी बीच भारत निर्वाचन आयोग ने राजस्थान सहित जिन राज्यों में एसआईआर हो चुका, वहां छूटे मतदाताओं को नाम जुड़वाने का एक और मौका दिया है।

Updated on:
16 Oct 2026 12:01 pm
Published on:
16 Oct 2026 12:01 pm