
Chhattisgarh Forest: बस्तर के घने जंगल एक बार फिर अपनी जैव विविधता और प्राकृतिक रहस्यों के कारण चर्चा में हैं। इस बार माचकोट फॉरेस्ट रेंज में एक ऐसी दुर्लभ मेंढक प्रजाति दिखाई दी है, जिसे सामान्यत: लोग शायद ही कभी देख पाते हों। बारिश शुरू होते ही जमीन के भीतर छिपकर रहने वाला ‘स्फिरोथिका मस्की’ या मस्की बरोइंग फ्रॉग जंगल के रास्ते पर फुदकता हुआ दिखाई दिया।
दिलचस्प बात यह है कि यह दुर्लभ प्रजाति उस समय नजर आई, जब वन्यजीव विशेषज्ञ और शोधकर्ता डॉ. सुशील दत्ता माचकोट के जंगल में बाघ के पंजों के निशानों का अवलोकन करने निकले थे। रात करीब 8 बजे बारिश के बाद जंगल के एक रास्ते पर यह विशेष मेंढक सड़क पार करता दिखाई दिया।
चूंकि यह प्रजाति मुख्य रूप से रात्रिचर होती है, इसलिए रात के समय ही इसकी गतिविधियां अधिक देखने को मिलती हैं। डॉ. दत्ता ने बताया कि मस्की बरोइंग फ्रॉग रेतीली और नम मिट्टी में खुद को दबाकर रहने वाला मेंढक है। बारिश होने पर यह जमीन से बाहर निकलता है और प्रजनन गतिविधियों में सक्रिय हो जाता है। यह अस्थायी जलभराव वाले गड्ढों और छोटे जलस्रोतों में प्रजनन करता है।
यह मध्यम आकार का मेंढक होता है, जिसकी लंबाई लगभग 4 सेंटीमीटर तक होती है। इसका सिर शरीर की तुलना में अपेक्षाकृत चौड़ा होता है तथा थूथन थोड़ा लंबा दिखाई देता है। इसकी पिछली टांगों की उंगलियों के पास फावड़े जैसी विशेष संरचना होती है, जिससे यह गीली मिट्टी को तेजी से खोदकर जमीन के भीतर छिप सकता है। पीले-कत्थई रंग के इस मेंढक की पीठ पर अंग्रेजी के उल्टे ‘ङ्क’ जैसा निशान और शरीर पर पीले धब्बे इसकी प्रमुख पहचान हैं।
डॉ. सुशील दत्ता ने इसकी तस्वीरें जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रत्यूष महापात्र को भेजीं, जिन्होंने इसकी पहचान स्फिरोथिका मस्की के रूप में पुष्टि की। डॉ. दत्ता ने बताया कि प्रारंभिक अध्ययन में इस मेंढक को दूसरी प्रजाति समझा जा रहा था, लेकिन गहन शोध और तुलनात्मक अध्ययन के बाद इसकी सही पहचान हो सकी। उन्होंने कहा कि कई बार एक जैसे रंग, आकार और स्वरूप वाले मेंढक सामान्य लोगों को एक ही प्रजाति के लगते हैं, जबकि डीएनए बारकोङ्क्षडग जैसी आधुनिक तकनीकें बताती हैं कि वे अलग-अलग प्रजातियां हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश के मौसम में यदि जंगलों में नियमित रात्रिकालीन सर्वेक्षण किया जाए तो कई और दुर्लभ उभयचर तथा अन्य जीव प्रजातियां सामने आ सकती हैं। भारत के अलावा यह मेंढक नेपाल और पाकिस्तान में भी पाया जाता है। डॉ. दत्ता ने बताया कि छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाले मेंढकों और टोड प्रजातियों पर आधारित एक विस्तृत पुस्तक भी जल्द प्रकाशित होने वाली है।
राज्य की समृद्ध जैव विविधता के बारे में नई जानकारी सामने आएगी। माचकोट के जंगल में दिखा यह छोटा सा मेंढक एक बार फिर साबित करता है कि बस्तर के जंगल केवल बाघ और वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि अनगिनत दुर्लभ और कम ज्ञात प्रजातियों के लिए भी एक सुरक्षित आश्रय हैं।
डॉ. सुशील दत्ता ने बताया कि छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाले मेंढकों और टोड प्रजातियों पर आधारित एक विस्तृत पुस्तक भी जल्द प्रकाशित होने वाली है। इस पुस्तक में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाने वाले उभयचरों की जानकारी, उनकी पहचान, आवास और संरक्षण संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य शामिल किए जाएंगे।