
Rural Migration in India: महात्मा गांधी मानते थे भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गांवों की आधुनिकता उनके विकास को भारत के विकास का आधार बताया। लेकिन उत्तराखंड के हजारों गांवों का निर्जन होना, युवाओं का रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर दूसरे शहरों में पलायन करना बताता है कि स्थिति बेहतर नहीं है। रोजगार की तलाश में लगातार पलायन अब सामान्य हो चला है। देश के गांव अब खास तौर पर अपनी युवा और कमाई करने वाली उम्र की वो आबादी खो रहे हैं, जो उनकी अर्थव्यस्था को सहारा दे सकती है। 2011 की जनगणना, श्रम सर्वेक्षण और कई अध्ययनों का विश्लेषण किया जाए, तो पलायन की ये तस्वीर किसी एक गांव या राज्य की नहीं है, बल्कि बदलते ग्रामीण भारत की नई कहानी बयां कर रही है, क्या भारत की ये आत्मा धीरे-धीरे बुजुर्ग हो रही है? क्या नेहरू के सपनों का भारत बिखर रहा है? सवाल अहम हैं और जरूरी भी अपना गांव क्यों छोड़ रहे लोग, किन राज्यों में पलायन बढ़ा है, अपना घर छोड़ ये लोग जा कहां रहे हैं और इनके जाने से गांवों की अर्थव्यवस्था, खेती और सामाजिक ढ़ांचे पर कैसे असर पड़ रहा है? पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
आंकड़ों के मुताबिक यदि हर तीन में से एक व्यक्ति ने अपना घर छोड़ा है, तो सवाल वाकई सिर्फ ये नहीं है कि लोग गांव छोड़ रहे हैं, बल्कि सवाल ये है कि जा कौन रहा है, क्यों जा रहा है और इसका भारत के ग्रामीण नक्शे पर क्या असर पड़ा है? जनगणना से लेकर श्रम सर्वेक्षणों और कई अध्ययनों को साथ पढ़ने पर संकेत मिलते हैं कि ग्रामीण भारत का सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक ढांचा भी धीरे-धीरे बदलता जा रहा है।
आंकड़ों से एक बात तो साफ है कि पलायन शब्द की कहानी एक जगह से दूसरी जगह जाने की नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई आर्थिक, सामाजिक और बुनियादी सुविधाओं जैसे महत्वपूर्ण कारक जुड़े हैं। जनगणना में जहां विवाह और परिवार के साथ स्थानांतरण बड़ी वजहें हैं। वहीं पुरुषों के गांव छोड़ने का बड़ा कारण रोजगार न होने को माना गया है। वे रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों और राज्यों तक पहुंच रहे हैं।
पलायन को लेकर भारतीय राज्यों में सूरत एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों से लंबे समय से और लगातार श्रमिक और युवा दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या बिहार, उत्तर प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों से हैं। इन क्षेत्रों में पलायन का पैटर्न बताता है कि मौसमी श्रमिक लंबे समय से यहां से पलायन कर रहे हैं। इसके अलावा उत्तराखंड की तस्वीर जहां गांवों में ताले लटक चुके हैं, वह बताती है कि भौगोलिक परिस्थितियां, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में कमी पलायन पर असर दिखाती है।
बिहार - रोजगार
यूपी - रोजगार
राजस्थान - रोजगार
मध्य प्रदेश - कुछ क्षेत्रों से श्रमिक पलायन
झारखंड - रोजगार
ओडिशा - मौसमी मजदूरी
छत्तीसगढ़ - मौसमी पलायन
उत्तराखंड - रोजगार और भौगोलिक परिस्थितियां
असम - रोजगार
पलायन करने वाले अगर अपना गांव छोड़ रहे हैं, तो अब सवाल ये है कि ये जा कहां रहे हैं? दरअसल अपने गांव में गरीबी, आय के संसाधनों में कमी, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यस्था जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी को देखते हुए बड़ी संख्या में पलायन कर रहे लोगों को कुछ राज्य अट्रैक्ट करते हैं। उद्योग, फैक्ट्रियों, निर्माण, परिवहन से लेकर सेवा क्षेत्रों में रोजगार के कारण इनकी पहली पसंद बनते हैं महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिमी बंगाल जैसे राज्य।
-महाराष्ट्र
-गुजरात
-दिल्ली
-कर्नाटक
-तमिलनाडु
-पश्चिमी बंगाल
उत्तराखंड की स्थिति पर नजर डाली जाए तो पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि राज्य के कई गांवों से लगातार पलायन हुआ है। वहीं कुछ गांवों की निर्जन स्थिति इस बहस को और तेज कर देती है कि गांव सच में खाली हो रहे हैं। लेकिन रुकिए… पूरे भारत के परिप्रेक्ष्य में ऐसा कहना वास्तव में सच नहीं होगा, बल्कि हम इसे एक चेतावनी के रूप में देख सकते हैं कि अगर अब हमने गांवों के विकास, उनमें मूलभूत और बुनियादी सुविधाओं के साथ ही रोजगार के नए अवसर नहीं दिए तो गांवों के खालीपन की यह तस्वीर चौंका देने वाली साबित हो सकती है।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रुड़की के शोध के मुताबिक जलवायु परिवर्तन, सूखते जलाशय, रोजगार की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और कमजोर होतीं अन्य बुनियादी सुविधाओं के चलते पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के गांवों में पलायन तेजी से बढ़ रहा है। यही कारण है कि यहां के ज्यादातर गांव खाली होते जा रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य में करीब 1792 गांव निर्जन हो गए हैं। वहीं कई गांवों में रहने वाले लोगों में सिर्फ बुजुर्ग ही बचे हैं। उधर 110 परिवार वाले गांव में भी अब आबादी लगभग आधी रह गई है और यहां से पलायन अब भी जारी है।
बीजेपी के नेशनल मीडिया प्रभारी और लोक सभा सांसद अनिल बुलानी ने निर्जन हुए पौड़ी गढ़वाल को फिर से बसाने के लिए अभियान शुरू किया है। उनका कहना है कि केवल उनके संसदीय क्षेत्र में पुरी जिले में ही करीब 150 ऐसे गांव हैं जहां अब कोई नहीं रहता। वे खुद गांवों का दौरा करते हैं और वहां रहने वाले बच्चों का जन्मदिन मनाते हैं। वे ग्रामीणों से अपने गांवों, अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। यहां सरकार भी पलायन रोकने के लिए आयोग का गठन तक कर चुकी है। इसके प्रयासों से कुछ लोग वापस भी लौटे हैं।''भारत के प्रमुख शोधकर्ता जिन्होंने प्रवास पर अध्ययन किए हैं, उनकी रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए होने वाला पलायन लगातार ग्रामीण समाज का स्वरूप बदल रहा है। क्योंकि प्रवास केवल लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने भर की घटना नहीं है, हमें समझना होगा कि यह एक सामाजिक, आर्थिक बदलाव की प्रक्रिया भी है। अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि लगातार कम उम्र के युवाओं का पलायन करने से गांव में बुजुर्गों और आश्रितों का अनुपात बढ़ा है।
खेती, ग्रामीण आय और रोजगार से जुड़े अर्थशास्त्री और शोधकर्ता हिमांशु के प्रवास पर किए गए अध्ययन में गांवों से पलायन (Rural Migration Reason) की एक बड़ी वजह खेती से घटती आय को भी माना गया। स्थिति ये है कि खेती करने वाले एक परिवार का जरूरी खर्च भी मुश्किल से निकल पाता है। अकेले खेती करने से इनके लिए परिवार का पालन-पोषण मुश्किल है। यही कारण है कि ग्रामीण अपनी आय का जरिया शहरों में ढूंढ़ने निकल पड़ते हैं। हिमांशु के अध्ययनों में स्पष्ट है कि शहरों में रोजगार से अब काम नहीं चलेगा, गांवों में भी आर्थिक अवसर बढ़ाने होंगे। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा जैसी बेसिक सुविधाओं पर काम करना होगा, तभी पलायन को रोका जा सकता है। हालांकि आज सरकारें किसानों की आय बढ़ाने के संभव प्रयास करती हैं। लेकिन ये प्रयास काफी नहीं लगते।
भारत में प्रवास (Rural Migration in India Study) को लेकर शोध करने वाले और इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट से जुड़े इंडिया माइग्रेशन रिपोर्ट के संपादक एस. इरुदया राजन के अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में पलायन कोई नई बात नहीं है। लेकिन रोजगार और शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। छोटे शहर और बड़े महानगर युवाओं को लुभाते रहे हैं। शोध में स्पष्ट है कि गांवों की आबादी ही कम नहीं हो रही, बल्कि कुशल और कामकाजी युवाओं की संख्या भी कम हो रही है। एस. इरुदया के अध्ययन बताते हैं कि इसका असर गांवों की खेती की व्यवस्था, स्थानीय अर्थव्यवस्था और बुजुर्गों की आबादी पर पड़ रहा है। अपने अध्ययन में उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि रोजगार, बुनियादी सुविधाएं नहीं बढ़ाई गईं, तो गांवों से पलायन जारी रहेगा और गांव खाली होते रहेंगे।
भारत में शहरीकरण और ग्रामीण-शहरी पलायन (Rural Migration Type) पर गहराई से अध्ययन करने वाले अर्थशास्त्री अमिताभ कुंदू के शोध बताते हैं कि प्रवास को केवस समस्या नहीं बल्कि, आर्थिक बदलाव की प्रक्रिया के नजरिये से भी देखना और समझना चाहिए। उनका मानना है कि पलायन चेतावनी और चुनौती तब है, जब गांवों में अवसरों की कमी हो और लोग मजबूरी में पलायन कर रहे हैं।
दूसरे राज्यों में पलायन करना हमेशा बुरा नहीं है, ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जो गांव में रहने वाले अपने परिवार को पैसा भेजते हैं। इससे कई परिवार ऐसे भी हैं, जिनकी आय बढ़ाने में मदद मिलती है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च आसान होता है। इसके साथ ही मकान निर्माण कर लोग सुखी जीवन बिताते हैं।
खेतों में काम करने वाले हाथ जब कम होते हैं, तो खेती तो प्रभावित होगी ही। ऐसा होने पर कई परिवार मजदूरों पर निर्भर होते हैं या फिर खेती नहीं कर पाते, इससे खेती का रकबा घट जाता है।
स्थानीय बाजारों में सेवाओं की मांग घटती है। गांवों की दुकानें, छोटे कारोबारी इसका असर झेलते हैं।
निर्माण कार्य, कृषि और अन्य स्थानीय कार्यों के लिए श्रमिकों का मिलना मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति में मजदूरी की लागत बढ़ती है।
लगातार आबादी घटने से स्कूलों में बच्चों की संख्या कम हो जाती है, कुछ सेवाएं सीमित होने से चुनौतियां सामने आ सकती हैं। हालांकि जरूरी नहीं कि ऐसी स्थिति हर गांव की हो।
''जनसांख्यिकि विशेषज्ञ और भारत में आंतरिक प्रवास पर लंबे समय से शोध करने वाले आर.बी. भगत के अध्ययनों से पता चलता है कि प्रवास या पलायन करना किसी गांव को छोड़कर शहर जाने का नाम नहीं है। यह सीधे तौर पर रोजगार, शिक्षा, विवाह, परिवार और क्षेत्रीय स्तर की असमानताओं से जुडा़ है। प्रवास को समझने के लिए ग्रामीण-शहरी, ग्रामीण-ग्रामीण और अंतरराज्यीय प्रवास को भी समान समझना होगा। इसके साथ ही राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण जैसे स्रोतों का समग्र विश्लेषण करना होगा, क्यों कि बदलती अर्थव्यवस्था के साख ही प्रवास के स्वरूप में भी बदलाव आ रहा है।''
कहना होगा कि Rural Migration Facts या पलायन भारत में नया नहीं है, बस समय के साथ बदलती अर्थव्यवस्था के बीच इसका भी स्वरूप बदला है। अक्सर नकारात्मक समझा जाने वाला पलायन विकास की कहानी भी बुनता है। लेकिन जब गांवों से युवा बाहर जानें लगें, तो यह देश के नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती और चेतावनी बन जाता है। सवाल अब यही है कि क्या गांव अब असल में खाली और निर्जन होते जाएंगे या फिर उनमें बुनियादी सुविधाओं के साथ रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएंगे?