
Narayanpur Silk Production: एक समय था जब नारायणपुर का नाम सुनते ही लोगों के जेहन में नक्सल हिंसा, बारूदी सुरंगें और सुरक्षा बलों के अभियान की तस्वीर उभरती थी। विकास की योजनाएं अक्सर सुरक्षा चुनौतियों के बीच सिमट जाती थीं और रोजगार की तलाश में ग्रामीणों को गांव छोड़ना पड़ता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज यही नारायणपुर रेशम के धागों से आत्मनिर्भरता की नई कहानी बुन रहा है। यहां जंगल केवल वन संपदा का स्रोत नहीं, बल्कि आजीविका और समृद्धि की नई राह बन रहे हैं।
मलबरी और टसर रेशम विकास योजनाओं ने जिले के ग्रामीणों के जीवन में ऐसा बदलाव लाया है, जिसने न केवल उनकी आय बढ़ाई है बल्कि आत्मविश्वास भी लौटाया है। खास बात यह है कि इस बदलाव की सबसे बड़ी भागीदार महिलाएं और आदिवासी परिवार बने हैं।
नारायणपुर में रेशम उत्पादन अब सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनता जा रहा है। जिले में वर्तमान में दो मलबरी और चार टसर रेशम केंद्र संचालित हो रहे हैं। नारायणपुर और कुसरतराई स्थित मलबरी केंद्रों में 22.5 एकड़ क्षेत्र में शहतूत का पौधारोपण किया गया है, जहां स्व-सहायता समूहों के सदस्य रेशम के कीड़ों का पालन कर रहे हैं। वहीं 62 हेक्टेयर क्षेत्र में टसर कृमिपालन का विस्तार किया गया है। इससे सैकड़ों ग्रामीणों को गांव में ही नियमित रोजगार मिलने लगा है। पहले जहां जंगल केवल जीविका का पारंपरिक साधन था, वहीं अब वही जंगल "सिल्क इकोनॉमी" का आधार बन रहा है।
इस पूरी पहल की सबसे बड़ी ताकत गांवों की महिलाएं हैं। स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कृमिपालन, कोसापालन, पौधों की देखभाल और ककून उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। पहले परिवार की आय पूरी तरह खेती या मजदूरी पर निर्भर थी, लेकिन अब रेशम उत्पादन ने महिलाओं को नियमित आय का नया माध्यम दिया है। इससे परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और महिलाओं की निर्णय लेने में भागीदारी भी बढ़ी है।
नारायणपुर के कई गांवों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण युवाओं को दूसरे जिलों या राज्यों में काम की तलाश में जाना पड़ता था। रेशम केंद्रों ने इस स्थिति को बदलना शुरू कर दिया है। पौधारोपण, निराई-गुड़ाई, कृमिपालन, ककून उत्पादन और रखरखाव जैसे कार्यों ने पूरे वर्ष रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए हैं। इससे ग्रामीणों को गांव छोड़ने की जरूरत कम हुई है और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी नई जान आई है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में मलबरी रेशम के लिए 4,400 किलोग्राम ककून उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। इसके मुकाबले 4,180 किलोग्राम उत्पादन हुआ। इससे जुड़े 47 हितग्राहियों को 7.72 लाख रुपये से अधिक की राशि सीधे बैंक खातों में मिली। टसर रेशम उत्पादन में भी जिले ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। 8.52 लाख कोसाफल के लक्ष्य के मुकाबले 9.73 लाख से अधिक कोसाफल का उत्पादन हुआ। इससे जुड़े 64 हितग्राहियों को लगभग 36.97 लाख रुपये की आय प्राप्त हुई। ये आंकड़े बताते हैं कि योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोगों की आय बढ़ाने में प्रभावी साबित हुई है।
रेशम विभाग की ओर से हितग्राहियों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण, उत्पादन की सतत निगरानी और समय पर भुगतान की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है। यही कारण है कि हर साल नए परिवार इस योजना से जुड़ने के लिए आगे आ रहे हैं। विशेषज्ञ गांवों में पहुंचकर कृमिपालन, रोग नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने के तरीकों की जानकारी देते हैं। इससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार हुआ है।
नारायणपुर की यह कहानी बताती है कि किसी भी क्षेत्र का विकास केवल बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार मॉडल से भी संभव है। रेशम उत्पादन ने यहां महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत किया, युवाओं को गांव में रोजगार दिया और आदिवासी परिवारों को आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान किया। यह बदलाव केवल आय का नहीं, बल्कि सोच का भी है। जिस जिले की पहचान कभी बारूद और बंदूक के साये से होती थी, वहां अब रेशम के धागे विकास, विश्वास और समृद्धि का ताना-बाना बुन रहे हैं।
मलबरी रेशम केंद्र – 2
टसर रेशम केंद्र – 4
मलबरी पौधारोपण – 22.5 एकड़
टसर कृमिपालन क्षेत्र – 62 हेक्टेयर
मलबरी ककून उत्पादन – 4,180 किलोग्राम
मलबरी हितग्राही – 47
मलबरी से आय – ₹7.72 लाख से अधिक
टसर कोसाफल उत्पादन – 9.73 लाख से अधिक
टसर हितग्राही – 64
टसर से आय – लगभग ₹36.97 लाख
नारायणपुर में रेशम के धागे केवल कपड़ा तैयार नहीं कर रहे, बल्कि विकास, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की नई पहचान भी गढ़ रहे हैं। यह मॉडल बताता है कि जब स्थानीय संसाधनों, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और समुदाय की भागीदारी एक साथ आती है, तो सबसे कठिन परिस्थितियों वाले क्षेत्र भी जनसमृद्धि की नई मिसाल बन सकते हैं।