Desert Greening Revolution: दुनिया भर में फैले मरुस्थलों में आज इंसानी प्रयास के चलते हरियाली आ रही है। आइए भारत समेत दुनिया के कुछ उदाहरणों से हम इंसानी सभ्यता के जल प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संतुलन के रोचक पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Desert Greening Revolution: प्रकृति किसी हिस्से में बहुत बारिश गिराती है तो कहीं बहुत कम, लेकिन इंसान विश्व के हर कोने में खुद का अस्तित्व बनाए और बचाए रखने के लिए अपनी जुगत लगाता है। हम उन रेगिस्तानी या अतिशुष्क क्षेत्रों के बारे में जानते हैं, जहां प्रकृति ने पानी ना के बराबर दिया लेकिन इंसानों ने अपनी बुद्धि के दम पर उसे हरा-भरा कर दिया या यूं कहें कि अपनी जीवन को आसान बना लिया। आइए, दुनिया के कुछ उदाहरणों से इसे समझने की कोशिश करते हैं।
भारत के थार मरुस्थल (Thar Desert Area) क्षेत्र में पानी की उपलब्धता अभी भी कम ही है लेकिन इंदिरा गांधी नहर के निर्माण के बाद इस इलाके में हरियाली बढ़ी है। इस नहर के शुरू होने से पहले थार के बड़े हिस्से में सिर्फ रेत और झाड़ियां ही दिखती थीं। खेती ना के बराबर होती थी। अब गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर जैसे इलाकों में हरी-भरी खेती शुरू हुई और “मरुस्थल” के कई हिस्से अब खेती योग्य बन गए। यही वजह है कि इसे “रेगिस्तान का हरित क्रांति” भी कहा जाता है।
इंदिरा गांधी नहर भारत की सबसे लंबी नहर (करीब 204 किलोमीटर लंबी) है। इसका निर्माण मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान के थार इलाके में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिए किया गया। इस नहर की परिकल्पना बीकानेर के इंजीनियर कंवर सेन ने की थी। इस परियोजना की आधारशिला 31 मार्च 1958 को रखी गई थी। यह नहर सतलुज और व्यास नदियों के संगम पर पंजाब के हरिके बैराज से निकलती है। इस नहर के निर्माण में करीब 25 वर्ष लग गए। यहां के खेतों की सिंचाई का मुख्य आधार नहर ही है।
यहां जलस्तर में वृद्धि होने के चलते अब ट्यूबवेल के जरिए भी सिंचाई होने लगी। यहां खेती में पानी की बर्बादी कम से कम हो, किसान आधुनिक ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक का इस्तेमाल करने लगे। इसके अलावे जल संरक्षण के लिए पारंपरिक जल संचयन तकनीक के बतौर टांका (भूमिगत टैंक), नाड़ी (तालाब), बेरी/कुई (उथला कुआं), खड़ीन और जोहड़ अभी भी इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। इन सबके बावजूद अभी भी नहर से दूर के इलाकों की हालत में पानी के मामले में ज्यादा सुधार नहीं हो पाया है।
पहले इस इलाके में शुष्क क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसलें बाजरा और ज्वार की पैदावार ही किसान ले पाते थे। नहर की शुरुआत के बाद यहां के किसान गेहूं, सरसों, कपास की पैदावार लेने के साथ ही मवेशियों के लिए चारे का भी इंतजाम कर पा रहे हैं। जाहिर सी बात है कि खेती अच्छी होने लगी तो लोगों की नियमित आय में बढ़ोत्तरी होने लगी। इस इलाके में पक्के मकान, पक्का स्कूल और अस्पतालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। इसके साथ राजनीतिक पार्टियों ने क्षेत्र के विकास पर भी ध्यान दिया, जिसके चलते बिजली और सड़कें बेहतर होती गईं। खेती के साथ मवेशियों की संख्या बढ़ी, जिससे डेयरी उद्योग को बल मिला। कुल मिलाकर इस इलाके के लोगों के जीवन स्तर में काफी सुधार दर्ज किया गया। भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई मरुस्थलीय इलाकों में इंसानों ने अपनी बुद्धिमता से हरियाली हासिल कैसे की, आइए जानते हैं।
इजराइल को उन्नत तकनीक वाला देश माना जाता है, लेकिन प्रकृति ने अगर किसी भी देश को बहुत कुछ दिया है तो बहुत कुछ कम भी कर दिया है। यहां एक ऐसा ही क्षेत्र है- नेगेव मरुस्थल। यह पूरा इलाका पहले पूरी तरह से बंजर था, लेकिन आधुनिक ड्रिप इरिगेशन तकनीक (Drip Irrigation) और जल संरक्षण के कारण यहां खेती और हरियाली विकसित हो गई है। आज यह क्षेत्र कृषि नवाचार का उदाहरण है।
Who is Simcha Blass? नेगेव मरुस्थल में खेती अत्याधुनिक तकनीकों पर आधारित है। यहां ड्रिप सिंचाई तकनीक से खेती का विकास सिम्चा ब्लास ने किया था। सिम्चा ब्लास एक इजराइली इंजीनियर थे, जिन्हें ड्रिप सिंचाई तकनीक का जनक माना जाता है। 1950 के दशक में उन्होंने पानी की बूंदों को सीधे जड़ों तक पहुंचाने की विधि का ईजाद किया है। पानी की कम बर्बादी वाले इस मॉडल पर आधारित सिंचाई का धीरे-धीरे पूरी दुनिया में इस्तेमाल होने लगा। इसके साथ ही इजराइल ने नेगेव मरुस्थल में खारे पानी को उपयोगी बनाने के लिए डिसेलिनेशन (लवण हटाना) तकनीक अपनाया। इसके साथ ग्रीनहाउस खेती, प्लास्टिक मल्चिंग (Plastic Mulching) और सटीक पोषक तत्व प्रबंधन से उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। प्लास्टिक मल्चिंग आधुनिक खेती की एक तकनीक है, जिसमें फसलों के बीच की मिट्टी की सतह को प्लास्टिक शीट या पन्नी से ढका जाता है। यहां खेती में पानी व खाद की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए सेंसर और कंप्यूटर आधारित निगरानी की जाती है। इन तकनीकों से रेगिस्तान में भी सब्जियां, फल और फूल की पैदावार ली जा रही है।
चीन के शिनजियांग क्षेत्र का लोप नूर इलाका पहले सूखा और निर्जन था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां कुछ जल स्रोत और मरुभूमि या नखलिस्तान (Oasis) विकसित हुए हैं, जिसके चलते स्थानीय पारिस्थितिकी में बदलाव आया है। सरकार द्वारा चलाए गए पर्यावरण पुनर्वास कार्यक्रम के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किए गए। पूरे देश के साथ इन इलाकों में 'ग्रीन बेल्ट' बनाने की योजनाएं लागू की। इसके इसके साथ ही 'नदी प्रबंधन और जल आपूर्ति सुधार' किए गए हैं। लोप नूर इलाके की तारिम नदी में पानी छोड़कर सूखे क्षेत्रों को नमी प्रदान की गई।
इस इलाके में हरियाली बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीकों को इस्तेमाल में लाया गया। ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर और प्लास्टिक मल्चिंग जैसी तकनीकों से कम पानी में पौधों को जीवित रखा जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में लवण-सहिष्णु (Salt-Tolerant) पौधों को लगाया जा रहा है, जो खारी मिट्टी में भी उग सकते हैं। इसके अलावा रेत को स्थिर करने (sand fixation) के लिए घास और झाड़ियों की कतारें लगाई जाती हैं, जिससे हवा से उड़ती रेत कम होती है और मिट्टी टिकती है। लोप नूर की यह हरियाली पूरी तरह प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव-निर्मित प्रयासों का परिणाम है। इसे बनाए रखने के लिए लगातार जल प्रबंधन जरूरी है।
सहारा दुनिया का सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान है, लेकिन इसके कुछ हिस्सों में भूमिगत जल स्रोतों और नखलिस्तानों के कारण पानी की उपलब्धता बनी रहती है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में वर्षा में हल्की वृद्धि और हरियाली के संकेत भी मिले हैं। लीबिया जैसे देशों ने ग्रेट मैन-मेड रिवर परियोजना के माध्यम से गहरे एक्वीफर से पानी निकालकर रेगिस्तान में खेती शुरू की। इसके अलावा, कई जगह क्या है केंद्र-धुरी सिंचाई (center pivot irrigation) अपनाई गई है, जिससे उपग्रह चित्रों में गोल-गोल हरे खेत दिखाई देते हैं। आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर और ग्रीनहाउस का उपयोग करके कम पानी में फसल उगाई जा रही है।
केंद्र-धुरी सिंचाई एक किस्म की आधुनिक सिंचाई तकनीक है, जिसमें खेत के बीच में एक स्थिर बिंदु होता है और उससे जुड़ी लंबी पाइपलाइन गोल-गोल घूमकर पूरे खेत में पानी देती है। आइए जानते हैं कि यह कैसे काम करती है?
खेत के बीच एक मोटर/पंप लगाया जाता है
उससे जुड़ी लंबी पाइपलाइन पहियों पर लगी होती है
यह पाइप धीरे-धीरे वृत्त (circle) में घूमती है
पाइप पर लगे स्प्रिंकलर पानी का छिड़काव करते हैं
इससे पूरा खेत गोल आकार (circular pattern) में सिंचित होता है
कुछ अफ्रीकी देशों ने “ग्रीन वॉल” जैसी पहल के तहत पेड़ लगाकर मरुस्थलीकरण रोकने की कोशिश की है। वनीकरण के चलते मिट्टी में नमी बनी रहती है और इससे हरियाली बढ़ रही है।
दुनिया के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक है- अटाकामा। हाल के वर्षों में यहां के कुछ हिस्सों में हरियाली बढ़ रही है। चिली सरकार ने वैज्ञानिकों की मदद से समुद्री जल का विलवणीकरण (desalination) कर खेती और पेयजल के लिए उपयोग शुरू किया। तटीय क्षेत्रों में कोहरे से पानी एकत्र करने (fog harvesting) की तकनीक अपनाई गई। इस तकनीक के जरिए जाल (mesh nets) लगाकर हवा में मौजूद नमी को पानी में बदला जाता है। इससे पौधों को आवश्यक नमी मिलने लगती है। खेती के लिए ड्रिप सिंचाई, ग्रीनहाउस और हाइड्रोपोनिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे कम पानी में सब्जियां और फल उगाए जा रहे हैं। इसके अलावा सौर ऊर्जा से चलने वाली प्रणालियां पानी की आपूर्ति को आसान बनाती हैं।
हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में मिट्टी की जरूरत नहीं होती है। इसमें सिर्फ पोषक तत्वों से भरपूर पानी के घोल का उपयोग करके पौधे उगाए जाते हैं। इस तकनीक में पारंपरिक खेती की तुलना में 90% तक कम पानी का उपयोग होता है और साल भर उच्च गुणवत्ता वाली फसलों की पैदावार देती है।
अटाकामा में भी कभी-कभी “डेजर्ट ब्लूम” (Desert Bloom) की घटना होती है। इस घटना के चलते अचानक बारिश के कारण यहां फूल खिल उठते हैं और अस्थायी रूप से पूरा क्षेत्र हरा-भरा दिखने लगता है।
इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात में कभी सूखा मरुस्थल हुआ करता था, लेकिन पारंपरिक ‘अफलाज’ सिंचाई प्रणाली और आधुनिक जल प्रबंधन के कारण यहां खजूर के बाग विकसित हुए। अफलाज एक प्राचीन और टिकाऊ भूमिगत सिंचाई प्रणाली है। इस तकनीक का इस्तेमाल 500 ईस्वी से हो रहा है। इसमें गुरुत्वाकर्षण का उपयोग करके भूमिगत झरनों से पानी को खेतों और घरों तक पहुंचाया जाता है।
दुनिया में इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि जहां कभी पानी की भारी कमी थी, वहां आज जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, तकनीकी नवाचार और कुछ प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण हालात बदले हैं।