
Snake Bite Report: बारिश शुरू होते ही महाकौशल और विंध्य के गांवों में सर्पदंश का खतरा बढ़ गया है। खेतों में काम कर रहे किसान-मजदूरों से लेकर घरों में सो रहे लोगों तक को सांप अपना शिकार बना रहे हैं। कई परिवारों ने अपनों को खोया है।
अनूपपुर में जुलाई में एक ही परिवार के तीन लोगों को सांप ने डसा, जिसमें बेटी की मौत हो गई। कटनी में दादा और दो साल की पोती सर्पदंश का शिकार हुए, जिसमें मासूम की जान नहीं बच सकी। इसी बीच देश में सर्पदंश को लेकर सामने आई आइसीएमआर समर्थित एक बड़ी स्टडी ने चर्चा छेड़ दी है। देश के 11 राज्यों के 25 जिलों में हुए इस अध्ययन में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्य शामिल नहीं हैं। ऐसे में महाकौशल-विंध्य जैसे सर्पदंश प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर राष्ट्रीय अध्ययन में सामने ही नहीं आ सकी। जिस मौसम में महाकौशल-विंध्य के खेतों में सांप और इंसान आमने-सामने हैं, उसी समय राष्ट्रीय अध्ययन में इस क्षेत्र की तस्वीर ही नहीं है। एक वर्ष के दौरान 25 जिलों में 7094 सर्पदंश के मामले दर्ज किए गए। इनमें 62.1 प्रतिशत मामले मानसून के दौरान सामने आए। सर्पदंश से हुई मौतों में करीब 43 प्रतिशत मौतें अस्पताल पहुंचने से पहले या रास्ते में हुईं।
करैत और कोबरा जैसे जहरीले सांपों के काटने पर मरीजों में लकवा (पैरालिसिस) जैसे गंभीर लक्षण देखे जा रहे हैं। इन दोनों ही सांपों में न्यूरोटॉक्सिक होता है। न्यूरोटॉक्सिक जहर के कारण कई मामलों में पीड़ितों को काटने का अहसास तक नहीं होता और 6-7 घंटे में पूरा शरीर बेजान हो जाता है। न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, वैस्कुलोटॉक्सिक स्नेक बाइट के केसों में तुरंत खून बहने या सूजन जैसे लक्षण दिखने लगते हैं जबकि न्यूरो टॉक्सिस केसों में पता नहीं लगता, लेकिन इलाज में देरी जानलेवा हो सकती है। ऐसे केस लगातार सामने आ रहे हैं। करैत और कोबरा के काटने से लकवा जैसे लक्षण आने लगते हैं। कई पीड़ितों को पता नहीं लग पाता है, उन्हें सांप ने काटा है।
महाकौशल और विंध्य के बड़े हिस्से में खेती और जंगल से जुड़ी आबादी है। बारिश के दौरान खेतों में पानी भरने, सांपों के बिलों से बाहर निकलने के कारण इंसान और सांप का संपर्क बढ़ जाता है। धान की रोपाई और खेतों में काम करने वाले मजदूरों के लिए खतरा और बढ़ जाता है। मानसून के दौरान सर्पदंश के मामलों की संख्या सबसे अधिक रही। कुल मामलों में 62.1 प्रतिशत मानसून के दौरान दर्ज हुए।
सर्पदंश से हुई मौतों में करीब 43 प्रतिशत मौतें अस्पताल के बाहर या अस्पताल पहुंचने के रास्ते में हुईं। यानी सर्पदंश में सिर्फ दवा उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महाकौशल और विंध्य के दूरदराज गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज तक पहुंचने में लगने वाला समय कई बार मरीज की जान पर बात आ जाती है।
अध्ययन 11 राज्यों के 25 जिलों में किया गया। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार इसमें शामिल नहीं हैं। ऐसे में इन बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्यों की वास्तविक स्थिति इस अध्ययन के आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाती।
अध्ययन में सर्पदंश के शिकार लोगों में 52.5 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे पाए गए। सबसे अधिक प्रभावित लोगों में मजदूर और खेती से जुड़े लोग रहे। 64.1 प्रतिशत पीड़ित पुरुष थे और 30-39 वर्ष आयु वर्ग का हिस्सा सबसे अधिक रहा। महाकौशल-विंध्य में भी खेतों में काम करने वाले किसान-मजदूर और जंगल पर निर्भर ग्रामीण आबादी सबसे ज्यादा जोखिम में रहती है। बारिश के दौरान बिना गमबूट, टॉर्च और सुरक्षा साधनों के खेतों में उतरना खतरा बढ़ाता है।
सर्पदंश के गंभीर मामलों में मरीज को एंटी-स्नेक वेनम के साथ लगातार निगरानी और जरूरत के अनुसार अन्य उपचार की जरूरत पड़ती है। डॉक्टर बताते हैं, कई बार जहर ज्यादा बढऩे पर एक मरीज से बीस से तीस एंटी-स्नेक वेेनम की जरूरत पड़ती है, जबकि विंध्य और महाकौशल के कई ऐसे आदिवासी क्षेत्र हैं, जहां पर्याप्त एंटी-स्नेक नहीं होती।
अनूपपुर: मां-पिता सहित बेटी को डसा, मासूम की मौत
कटनी के बडखेरा (नीम) में 22 अगस्त को घर में सो रही दो सगी बहनों को जहरीले सर्प ने काट लिया। 22 अगस्त की रात हादसे में तीन वर्षीय छोटी बहन आयुषी की घर पर ही मौत हो गई, जबकि 12 वर्षीय दीपिका ने उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।