
मध्य प्रदेश में दगना कुप्रथा आज भी जारी है (Photo: Rajasthan Patrika, Designed: ChatGpt)
Dagna Parampara : शहडोल के ग्रामीण अंचलों में किसी गांव की गली से गुजरिए तो कई जगह दीवारों पर लिखा दिखाई देता है ‘दगना अपराध है।’ हाट-बाजारों में दगना के खिलाफ गीत और नुक्कड़ नाटक आयोजित होते रहते हैं। गांवों में जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। हजारों लोगों से शपथ पत्र भरवाए गए। अधिकारियों ने गांव-गांव जाकर समझाइश दी और कई मामलों में एफआईआर तक हुई। लेकिन वर्षों तक इस कुप्रथा की पड़ताल के दौरान गांवों की जमीन पर जो तस्वीर दिखाई दी, वह इन नारों से बिल्कुल अलग थी।
शहडोल संभाग कभी दगना की कुप्रथा की बुरी तरह चपेट में था। ठंड और बारिश के करीब पांच महीने, जब बच्चों में निमोनिया, सांस और दूसरी बीमारियां बढ़ती हैं, अस्पतालों के आईसीयू और बच्चा वार्ड तक ऐसे बच्चों को पहुंचते देखा गया, जिनके शरीर पर बीमारी से ज्यादा गर्म सलाखों के निशान थे। कई बार शरीर पर इतने दाग होते थे कि उन्हें गिनना मुश्किल हो जाता था। किसी बच्चे के पेट पर 10 निशान थे तो किसी के शरीर पर 50 तक। यह वर्षों पुरानी तस्वीर है, लेकिन यह कहानी खत्म नहीं हुई है।
हाल ही में मध्य प्रदेश के कालापानी में डेढ़ साल के बच्चे को निमोनिया होने पर दागने का मामला सामने आया। इसके पहले झाबुआ में भी तीन बच्चों को दागे जाने की घटना सामने आई थी। यानी जिस कुप्रथा को जागरूकता, कार्रवाई और अभियानों के जरिए खत्म करने की कोशिश की गई, उसके निशान आज भी प्रदेश के आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में मौजूद हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है जब बच्चे को सांस लेने में तकलीफ हो तो वह अस्पताल पहुंचने से पहले गर्म सलाख तक क्यों पहुंच जाता है? जबकि शहडोल संभाग में दागना के मामले आने पर प्रदेशभर में हड़कंप की स्थिति बनने के साथ ही एसओपी तैयार कराई गई थी।
स्थानीय स्तर पर इसे दगना या आंकना कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से यह मान्यता चली आ रही है कि जन्म के बाद बच्चा कमजोर होने लगे, पेट फूल जाए, सांस लेने में तकलीफ हो, दर्द हो या शरीर के किसी हिस्से में परेशानी हो तो गर्म लोहे से दागने पर बीमारी ठीक हो जाती है। कई जगह नवजात के पेट पर दिखाई देने वाली नीली नस को बीमारी या दर्द का संकेत माना जाता है। इसके बाद परिवार के बुजुर्ग, दाई या स्थानीय उपचार करने वाले की सलाह पर गर्म सलाख से बच्चे के शरीर को दाग दिया जाता है। सलाख को आग में गर्म किया जाता है और फिर दर्द या बीमारी वाली जगह पर रखकर जला दिया जाता है। कई मामलों में एक-दो निशान नहीं होते। शरीर पर दर्जनों दाग होते हैं।
दगना की भयावहता को समझने के लिए वर्षों पहले शहडोल से लगे उमरिया के देवगवां, सेमहरिया और खम्हरिया सहित कई गांवों में की गई पड़ताल काफी है। इन गांवों में बच्चों के शरीर पर गर्म लोहे से दागने के निशान मिले थे। किसी बच्चे के पेट पर 10 निशान थे तो किसी के शरीर पर 50 तक। ग्रामीणों का तर्क था कि यह तरीका उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है। मान्यता थी कि जिस हिस्से में दर्द हो रहा है, उससे संबंधित नस को गर्म लोहे से दागने पर बीमारी ठीक हो जाती है। कुछ जगह गर्म सरिया तो कहीं हंसिया तक गर्म करके दागने की बात सामने आई थी। चिकित्सकों के लिए यह इलाज नहीं, बल्कि बच्चे के शरीर पर एक और चोट थी।
दगना को सिर्फ अंधविश्वास कहकर इस समस्या से बाहर निकलना आसान है। लेकिन गांवों की पड़ताल में इसकी एक दूसरी तस्वीर भी सामने आती है। दूर-दराज के गांवों में स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच आसान नहीं है। कई परिवार बीमारी की गंभीरता को समझ नहीं पाते। कहीं परिवहन की समस्या है तो कहीं समय पर डॉक्टर और जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में परिवार पहले बुजुर्गों, दाई या स्थानीय उपचार करने वाले के पास जाता है। अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही गर्म लोहे से दागने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यानी अंधविश्वास के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधा की दूरी भी इस कुप्रथा को जिंदा रखने वाली जमीन तैयार करती है।
गुना के कालापानी का हालिया मामला इसी सवाल को फिर सामने लाता है। डेढ़ साल के बच्चे को निमोनिया की शिकायत थी। जिस उम्र में उसे डॉक्टर, दवा और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन की जरूरत थी, उसे गर्म लोहे से दाग दिया गया। सवाल सीधा है—फेफड़ों और सांस से जुड़ी बीमारी का इलाज गर्म सलाख से कैसे हो सकता है? झाबुआ में भी तीन बच्चों को दागे जाने का मामला सामने आया था। ये घटनाएं बताती हैं कि दगना केवल शहडोल संभाग की समस्या नहीं है। अलग-अलग समय पर प्रदेश के दूसरे आदिवासी अंचलों से भी इसके मामले सामने आते रहे हैं।
दगना के खिलाफ शहडोल संभाग में बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। गांवों में जागरूकता अभियान हुए, हजारों लोगों से शपथ पत्र भरवाए गए। अधिकारी गांव-गांव पहुंचे। दगने वालों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गईं। इन प्रयासों का असर यह हुआ कि दगना के मामले काफी कम हुए। लेकिन कम होना और खत्म होना दो अलग बातें हैं। वर्षों बाद भी जब प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों को दागने की घटनाएं सामने आती हैं तो यह सवाल जरूरी हो जाता है कि क्या अभियान के बाद गांवों में निगरानी और जागरूकता लगातार बनी रही?
दगना और कुपोषण से जुड़े मामलों की पड़ताल के दौरान शहडोल और आसपास के आदिवासी गांवों में आधा सैकड़ा से अधिक गांवों का जायजा लिया गया था। कई गांवों में बच्चों के शरीर पर दगने के निशान मिले थे। ग्रामीणों ने बताया था कि बच्चा जन्म के कुछ समय बाद कमजोर पड़ता है, सांस लेने में परेशानी होती है, पेट फूलता है या दर्द होता है तो उसे दागा जाता है। कई परिवारों में बुजुर्गों का दबाव भी इसकी बड़ी वजह सामने आया था। कुछ मामलों में परिवार अस्पताल जाने के बजाय पहले दाई या स्थानीय उपचार करने वाले के पास पहुंचता था। कई बच्चों के शरीर पर एक से अधिक बार दागने के निशान थे। दगना और कुपोषण से जुड़े कई मामलों में एक पैटर्न भी सामने आया। जब मामला मीडिया के सामने आया तो प्रशासन सक्रिय हुआ। बच्चे को अस्पताल पहुंचाया गया। इलाज शुरू हुआ। परिवार को सरकारी योजनाओं से जोडऩे की कोशिश हुई।
आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विभाग की मैदानी व्यवस्था अगर समय पर सक्रिय हो तो बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही बच्चे की पहचान हो सकती है। परिवार को अस्पताल तक पहुंचाया जा सकता है और दगने जैसी कुप्रथा को वहीं रोका जा सकता है।
आठ माह की बच्ची: शहडोल के ब्यौहारी ब्लॉक के ओढारी कोलान टोला की बच्ची जन्म से कुपोषण की शिकार थी। उसका वजन महज ढाई किलो था। आंगनबाड़ी के रिकॉर्ड में नाम नहीं होने के कारण वह पोषण पुनर्वास केंद्र तक नहीं पहुंच सकी। मामला सामने आने के बाद प्रशासन सक्रिश् हुआ, लेकिन तब तक उसकी हालत गंभीर हो चुकी थी।
51 दाग के बाद नहीं बची रुचिका: सिंहपुर कठौतिया गांव की ढाई माह की रुचिका कोल का मामला सबसे भयावह था। निमोनिया और झटकों की शिकायत के बाद उसे झाड़-फूंक के नाम पर गर्म सलाखों से 51 बार दागा गया। हालत बिगडऩे पर मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी।
मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की पूर्व सदस्य मेघा पवार कहती हैं, प्रदेश के आदिवासी अंचलों में दागना आज भी जकड़ रखा है। शहडोल संभाग मेें 90 प्रतिशत तक कमी आई लेकिन प्रदेश के बाकी आदिवासी अंचलों में भी उसी तरह अभियान चलाना होगा। लगातार केस आ रहे हैं तो मैदानी अमले को मजबूत करना होगा। मॉनीटरिंग बढ़ानी होगी।
एनएचएम की स्टेट ट्रेनर सुचिता शर्मा कहती हैं, कानूनी कार्रवाई जरूरी है। बच्चों को गर्म सलाखों से दागना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन स्थायी बदलाव के लिए गांव तक स्वास्थ्य व्यवस्था पहुंचानी होगी। जहां स्वास्थ्य केंद्र दूर है, वहां पहुंच आसान करनी होगी। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को जोखिम वाले बच्चों की नियमित निगरानी करनी होगी। जिन गांवों में पहले दगना के मामले सामने आए हैं, वहां विशेष निगरानी और लगातार जागरूकता अभियान चलाने होंगे। क्योंकि जिस परिवार को बीमारी समझ नहीं आती और अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लगते हैं, वहां अंधविश्वास के लिए जगह बनना आसान है।
Updated on:
16 Sept 2026 11:20 am
Published on:
16 Sept 2026 11:20 am
