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आत्महत्या पर कैसी हो सार्वजनिक भाषा? दो मनोचिकित्सकों की चेतावनी- WHO की गाइडलाइन भी यही कहती है

Student Suicide Prevention: नीट छात्र आत्महत्याओं के बीच दो मनोचिकित्सकों की चेतावनी, WHO की गाइडलाइन और रिसर्च बताती है कि जिम्मेदार संवाद क्यों है आत्महत्या रोकने के लिए
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Jul 27, 2026
Suicide Prevention
Suicide Prevention: NEET स्टूडेंट्स आत्महत्या और मुआवजे की मांग पर मनोचिकित्सक ने लिखा खुला पत्र, तो स्टूडेंट सुसाइड केसेस पर भी चेता रहे एक्सपर्ट्स (AI Creative)

Student Suicide Prevention: देश में NEET अभ्यर्थियों की आत्महत्याओं के बाद न्याय, मुआवजे और परीक्षा व्यवस्था पर बहस तेज है। राजनीतिक दल पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और कार्रवाई की मांग कर चुके हैं। इसी बीच एमपी की राजधानी भोपाल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने एक खुला पत्र जारी कर आत्महत्या जैसे संवेदनशील मामलों में राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और मीडिया से जिम्मेदार भाषा अपनाने की अपील की है। वहीं आत्महत्या की रोकथाम के प्रयासों को लेकर मनोवैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह राजपूत का कहना है कि परिवार, स्कूल शिक्षक और समय पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता इसमें अहम भूमिका निभा सकती है। patrika.com पर संजना कुमार के साथ जानिए आखिर क्यों विशेषज्ञ कह रहे हैं कि स्टूडेंट्स आत्महत्याओं को रोकने के लिए सिर्फ न्याय नहीं, जिम्मेदार संवाद और मेंटल हेल्थ पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है…

इसी चिंता को लेकर भोपाल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने राजनीतिक दलों के नाम एक खुला पत्र लिखा है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि NEET कैंडिडेट्स की आत्महत्याएं बेहद दुखद हैं। वहीं पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना और न्याय की मांग पूरी तरह वाजिब और उचित है। हालांकि वे आगे यह भी लिखते हैं कि मुआवजे या विरोध की मांग करते समय सार्वजनिक मंचों पर ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जिससे अनजाने में आत्महत्या का महिमामंडन हो या मानसिक संकट से पहले से जूझ रहे युवाओं तक इसका गलत संदेश पहुंचे।

Senior psychiatrist writes open letter to Cockroach Janata Party: कॉकरोच जनता पार्टी को लिखे पत्र में अहम संदेश। (patrika photo: AI creation)

दरअसल डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि सार्वजनिक संदेश कभी-कभी गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे संवेदनशील युवाओं को यह संदेश दे सकते हैं कि आत्महत्या के बाद परिवार को आर्थिक लाभ या विशेष समामाजिक ध्यान मिल जाएगा। मेंटल हेल्थ की दृष्टि से ऐसी किसी भी संभावित व्याख्या से बचना आवश्यक है। इसीलिए न्याय की मांग के साथ-साथ यह संदेश भी प्रमुखता से दिया जाना चाहिए कि आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।

पत्रिका से विशेष बातचीत में डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि ''क्लिनिकल प्रैक्टिस में यह देखा गया है कि आत्महत्या या किसी चर्चित घटना की लगातार और भावनात्मक कवरेज कुछ संवेदनशील लोगों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मीडिया रिपोर्टिंग आत्महत्या का कारण बनती है। दरअसल जिस तरीके से किसी घटना को प्रस्तुत किया जाता है, वह पहले से अवसाद, चिंता या आत्मघाती विचारों से जूझ रहे कुछ लोगों में जोखिम (Suicide Contagion) बढ़ा सकता है।''

क्या है Suicide Contagion?

डॉ. त्रिवेदी बताते हैं कि Suicide Contagion यानी आत्महत्या का संक्रामक प्रभाव। यह वह स्थिति है, जब किसी आत्महत्या की अत्यधिक, सनसनीखेज या महिमामंडन करने वाली चर्चा के बाद कुछ संवेदनशील लोग उसी व्यवहार की नकल करने लगते हैं या उनके भीतर पहले से मौजूद आत्मघाती विचार अधिक तीव्र हो जाते हैं। किशोरों और युवाओं में इसका खतरा अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) आत्महत्या की घटनाओं पर जिम्मेदार रिपोर्टिंग और संयमित सार्वजनिक संवाद की सलाह देता है।

WHO Guideline: आत्महत्या की रिपोर्टिंग से जुड़ी WHO की गाइडलाइन (AI Infographic)

इधर मनोवैज्ञानिक नरेंद्र सिंह राजपूत ने भी चेताया, पत्रिका से बातचीत में कहा- परिवार और शिक्षक निभा सकते हैं सबसे बड़ी जिम्मेदारी

मनोवैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह राजपूत का कहना है कि छात्र आत्महत्या के मामले अचानक नहीं होते। इसके संकेत पहले से दिखाई देने लगते हैं, लेकिन अक्सर परिवार, शिक्षक और मित्र उन्हें पहचान नहीं पाते। उनका कहना है कि सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे पहली जिम्मेदारी परिवार, शिक्षकों और करीबी लोगों की होती है।

बच्चों को भरोसा दिलाएं परिणा कैसा भी हो, आप हमेशा उनके साथ हैं

डॉ. राजपूत कहते हैं कि न केवल खुद सीखें बल्कि बच्चों को भी सिखाएं कि रिजल्ट छोटी चीज है, जिंदगी बड़ी है। बच्चों को यह भरोसा होना चाहिए कि परिणाम चाहे जैसा हो, परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहेगा। बच्चों पर अवास्तविक अपेक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए। वहीं अपने बच्चे को पहचानें, अगर प्रैक्टिस में उसके 400-500 अंक आ रहे हैं, तो 600 अंकों की उम्मीद बनाकर उस पर अतिरिक्त दबाव नहीं डालना चाहिए। बच्चे की तुलना दूसरों से नहीं, बल्कि बच्चे की अपनी प्रगति से होनी चाहिए।

Suicide Intent Symptoms: मनोवैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह राजपूत ने बताया जब दिखे बच्चे का व्यवहार बदल रहा है, तो देर न करें। (AI Graphic)

परिणाम आने के बाद नहीं परीक्षा की तैयारी करते हुए ही सपोर्ट जरूरी

डॉ. राजपूत का मानना है कि आत्महत्या रोकने की शुरुआत परीक्षा के परिणाम आने के बाद नहीं, बल्कि तैयारी के दौरान ही होनी चाहिए। वे कहते हैं कि बच्चों को शुरू से समझाना चाहिए कि परीक्षा जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। सफलता और असफलता दोनों सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं में दोबारा अवसर भी उपलब्ध होते हैं। उनके मुताबिक स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में नियमित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, काउंसलिंग, मोटिवेशनल कार्यक्रम और जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिएं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम को भी छात्रों में तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक पहल बताया।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

मनोचिकित्सकों के अनुसार छात्र आत्महत्या के पीछे केवल परीक्षा का दबाव जिम्मेदार नहीं होता। पारिवारिक अपेक्षाएं, सामाजिक तुलना, आर्थिक परिस्थितियां, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और भावनात्मक अकेलापन भी इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय शोध भी करते हैं समर्थन

आत्महत्याओं की घटनाओं पर जिम्मेदार संवाद की जरूरत केवल विशेषज्ञों की राय नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शोध और भारतीय अध्ययनों में भी यह समर्थन दिखता है। कई शोध बताते हैं कि सनसनीखेज या महिमामंडन वाली प्रस्तुति कुछ संवेदनशील लोगों में जोखिम बढ़ा सकती है। जबकि समाधान और मदद पर केंद्रित संवाद सकारात्मक प्रभाव दिखा सकते हैं।

Indian studies on mental health: AI Infographic

क्या कहती हैं दुनिया भर की रिसर्च

1- दर इफेक्ट (1974): अमेरिकी समाजशास्त्री डेविड फिलिप्स ने पहली बार बताया था कि आत्महत्या के व्यापक और सनसनीखेज मीडिया कवरेज के बाद कुछ समय के लिए आत्महत्याओं की संख्या बढ़ सकती है। इसकी को बाद में Werther Effect कहा गया।

suicide case Study after actor sushant rajpoot death: (AI Infographic)

2- सुसाइड कंटिजन पर कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप में हुए कई अध्ययनों में पाया गया कि चर्चिच आत्महत्याओं की विस्तृत या महिमामंडिच रिपोर्टिंग के बाद संवेदनशील लोगों में इसका जोखिम बढ़ सकता है। यही कारण था कि WHO ने मीडिया रिपोर्टिंग के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए।

Students Suicide Prevention: AI Infographic

    3- Papageno Effect शोध कहता है कि जब मीडिया ऐसे लोगों की कहानियां दिखाता है जिन्होंने संकट में मदद ली और उससे बाहर निकले, तो आत्महत्या का जोखिम कम हो सकता है। इसे शोधकर्ताओं ने Papageno Effect कहा।

    गौरतलब है कि NCRB के मुताबिक 2022 में भारत में 13,044 स्टूडेंट्स ने आत्महत्या की थी। यानी औसतन हर दिन करीब 36 स्टूडेंट्स ने अपनी जान गंवाई। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर यह रिकॉर्ड नहीं मिलता कि इनमें कितने स्टूडेंट्स NEET, JEE, UPSC या किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे या फिर किस कक्षा के स्टूडेंट थे।

    कहना होगा कि स्टूडेंट्स आत्महत्या केवल परीक्षा में असफल होने का नतीजा नहीं है, बल्कि मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और संवाद की कमी का गंभीर संकेत है। न्याय की मांग जरूरी है, लेकिन उतना ही आवश्यक है सार्वजनिक संवाद, समय पर मेंटल हेल्थ हेल्प, परिवार का बिना शर्तों का साथ। एक्सपर्ट और शोध स्पष्ट संदेश देते हैं कि आत्महत्या का महिमामंडन नहीं, बल्कि उम्मीद की किरण, सहारा और समाधान ही जिंदगी बचा सकता है। आखिरकार किसी भी परीक्षा से कहीं ज्यादा कीमती है एक स्टूडेंट की जिंदगी। तो संकल्प लें और बच्चों को सुनने का, उन्हें समझने का, उन पर रिजल्ट का प्रेशर बनाने के बजाय परीक्षा की बेहतर तैयारी करवाने में मदद कर उनका बोझ कम करने का।