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Subhash Resignation Story : नेहरू नहीं गांधीजी के चलते सुभाष बोस ने दिया था अध्यक्ष पद से इस्तीफा, दूसरी बार कब पड़ी कांग्रेस पार्टी में फूट?

Subhash Bose resignation Story: महात्मा गांधी, पट्टाभि सीतारामय्या की हार को बर्दाश्त नहीं कर पाए। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस के पास कांग्रेस से इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। कांग्रेस के अंदर यह पहली दरार थी। कांग्रेस में संसदीय पद के नेता पद को लेकर दूसरी बार 1969 में भी फूट पड़ी। यहां पढ़िए पूरी कहानी।

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Jan 29, 2026
Subhash Chandra Bose

Subhas Bose Congress resignation Story : सुभाष बोस पहली बार 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में पार्टी के अध्यक्ष चुने गए और अगले साल यानी 1939 को मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी किनारे त्रिपुरी में हुए कांग्रेस अधिवेशन में वह दोबारा जीते। 29 जनवरी 1939 को हुए अध्यक्ष पद के चुनाव में नेताजी सुभाष चंद्र बोस (1580 वोट) ने पट्टाभि सीतारमय्या (1377 वोट) को हरा दिया।

1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए गांधीजी की पहली पसंद कौन थे?

1939 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए गांधीजी की पहली पसंद अबुल कलाम आजाद थे। गांधीजी का मानना ​​था कि कांग्रेस प्रमुख के रूप में एक मुस्लिम के होने से देश में सांप्रदायिक स्थिति में सुधार हो सकता है। दरअसल, अबुल कलाम आजाद की उम्मीदवारी की घोषणा बारडोली में आयोजित कार्य समिति की बैठक में की गई थी। आजाद ने वहां कोई आपत्ति नहीं जताई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। वे सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे, क्योंकि दोनों ही कलकत्ता से थे और सुभाष की लोकप्रियता से वह अच्छी तरह से वाकिफ थे।

पट्टाभि सीतारामय्या को उम्मीदवार बनाने से पहले क्यों नहीं ली गई अनुमति?

अबुल कलाम के नाम वापस लेने के बाद महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा, 'मौलाना साहब कांटों का ताज नहीं पहनना चाहते। अगर आप दोबारा कोशिश करना चाहते हैं तो जरूर करें। अगर आप नहीं करेंगे या वे (सुभाष) नहीं सुनेंगे, तो पट्टाभी (सीतारमय्या) ही एकमात्र विकल्प प्रतीत होते हैं।' जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे, इसलिए सीतारमय्या अनिच्छा से उम्मीदवार बने। उनके अनुसार उनसे यह भी नहीं पूछा गया कि क्या वे उम्मीदवार बनना चाहते हैं?

रवींद्रनाथ टैगोर ने सुभाष चंद्र बोस का समर्थन क्यों किया?

सुभाष की दूसरी बार अध्यक्ष बनने की इच्छा को रवींद्रनाथ टैगोर का समर्थन प्राप्त था। टैगोर ने सुभाष बोस को 'आधुनिकतावादी' व्यक्ति बताकर समर्थन देने की घोषणा दी थी। रवींद्रनाथ के विचार में कांग्रेस के उच्च कमान में केवल दो ही लोग वास्तविक तौर पर आधुनिकतावादी थे। एक सुभाष चंद्र बोस और दूसरा जवाहरलाल नेहरू। टैगोर ने गांधीजी को पत्र लिखकर सुभाष को दूसरा कार्यकाल दिए जाने की सिफारिश भी की। इसके जवाब में गांधीजी ने टैगोर को लिखा कि उनकी व्यक्तिगत राय में सुभाष को अध्यक्ष के कार्यभार से मुक्त होना आवश्यक था।

सुभाष बोस के खिलाफ कांग्रेस प्रतिवाद, नेहरू ने क्यों नहीं किए हस्ताक्षर?

अबुल कलाम के चुनाव से हटने के बाद सुभाष बोस ने 21 जनवरी को एक बयान जारी किया। इसके जवाब में कार्य समिति ने सुभाष की उम्मीदवारी के विरुद्ध एक प्रतिवाद जारी किया। 'नेहरू और बोस' पुस्तक में रुद्रंगशु मुखर्जी लिखते हैं कि वल्लभभाई पटेल ने जवाहरलाल को यह बताया था कि संयुक्त बयान गांधीजी के आग्रह पर जारी किया गया था। जवाहरलाल ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने में अपनी असमर्थता का तार भेजा। नेहरू ने यह स्वीकार किया था कि अगर वह सुभाष बोस के खिलाफ प्रतिवाद पर हस्ताक्षर कर देते थे तो इससे सैद्धांतिक प्रश्न उठते। गांधी ने पटेल से जवाहरलाल के हस्ताक्षर करने से इनकार करने पर अपनी निराशा व्यक्त की और पटेल ने यह बात जवाहरलाल को बता दी। जवाहरलाल ने इसके बाद 26 जनवरी को इस बारे में एक सार्वजनिक बयान जारी करने का निर्णय लिया।

सुभाष बोस ने भी प्रेस को दिए गए बयान में कहा था कि यह मुद्दा व्यक्तिगत नहीं बल्कि नीतियों और कार्यक्रमों से जुड़ा है। सुभाष के अनुसार, 'भारत में साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के लगातार तेज होने से नए विचार, विचारधाराएं, समस्याएं और कार्यक्रम सामने आए हैं। परिणामस्वरूप, लोग इस राय की ओर झुक रहे हैं कि अन्य स्वतंत्र देशों की तरह भारत में भी पार्टी के अध्यक्ष का चुनाव निश्चित समस्याओं और कार्यक्रमों के आधार पर लड़ा जाना चाहिए ताकि चुनाव से मुद्दों को स्पष्ट करने में मदद मिल सके।' सुभाष बोस के इस बयान के खिलाफ वललभभाई पटेल और कार्य समिति के छह अन्य सदस्यों ने मिलकर संयुक्त बयान जारी किया। बयान में स्पष्ट किया गया कि जब कांग्रेस द्वारा स्वयं निर्धारित नहीं किए जाते, तो कार्य समिति द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।

सुभाष बोस ने कांग्रेस समिति पर लगाया था पक्षपात का आरोप

सुभाष ने 25 जनवरी को पटेल और कार्य समिति के अन्य सदस्यों के इस बयान का जवाब देते हुए कहा कि उनके विचार में कार्य समिति के सदस्यों का अपने दो साथियों के चुनाव लड़ने के दौरान पक्षपात करना अनुचित था। उन्होंने यह भी बताया था कि सीतारामय्या की उम्मीदवारी पर कार्य समिति में चर्चा नहीं हुई थी। उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी अपनी उम्मीदवारी पर कार्य समिति ने सहमति नहीं दी थी, क्योंकि समिति का चुना हुआ उम्मीदवार आजाद था। सुभाष ने स्वीकार किया कि वे उम्मीदवार नहीं बनना चाहते थे, लेकिन कई प्रांतों के मित्रों और समर्थकों के दबाव में ऐसा करने को मजबूर हुए थे।

क्यों बोले सुभाष बोस - कांग्रेस अध्यक्ष संवैधानिक सम्राट नहीं

सुभाष की अधिक महत्वपूर्ण आपत्तियां अध्यक्ष के पद से संबंधित थीं। उन्होंने तर्क दिया कि 'कांग्रेस अध्यक्ष की तुलना संवैधानिक सम्राट से करना सरासर गलत है'।

1939 कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव: सुभाष बोस को मिले 1580 वोट

पटेल, राजेंद्र प्रसाद और स्वयं सीतारामय्या ने भी बयान दिए। इन सभी बयानों में संघवाद के मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार के साथ किसी भी तरह के समझौते की संभावना को नकार दिया गया। सुभाष ने चुनाव से पहले चार बयान जारी किए लेकिन इनमें से किसी में भी वे इस आरोप को साबित नहीं कर सके कि उनके द्वारा "दक्षिणपंथी" कहे जाने वाले कुछ कांग्रेस नेता संघवाद के मुद्दे पर अंग्रेजों के साथ समझौता करने की कोशिश कर रहे थे। इसी माहौल में 29 जनवरी को पार्टी अध्यक्ष के लिए चुनाव हुए। नतीजों से पता चला कि सुभाष को 1580 वोट मिले, जबकि सीतारामय्या को 1377 वोट। सुभाष को मिले अधिकांश वोट बंगाल, मैसूर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मद्रास से मिले थे।

सुभाष चन्द्र बोस की जीत को बर्दाश्त नहीं कर पाए गांधीजी

सुभाष बोस की जीत पर गांधीजी ने अपनी विनम्रता खो दी और उन्होंने एक सार्वजनिक बयान में सीतारामय्या की हार पर कहा, 'सीताराम्मया की हार, मेरी हार है।'

नेहरू भी सुभाष के विचारों से नहीं हुए सहमत

वहीं नेहरू ने सुभाष बोस से ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम देने के अपने सुझाव को विशेष रूप से विस्तार से बताने का अनुरोध किया था। 'आप वास्तव में इस बारे में कैसे आगे बढ़ना चाहते हैं और उसके बाद आप क्या करेंगे?' जवाहरलाल ने स्वीकार किया कि उन्हें यह विचार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।

सुभाष, गांधीजी से नहीं चाहते थे टकराव, बीमारी की हालत में पहुंचे थे वर्धा

जवाहरलाल के गांधी को लिखे पत्र से स्पष्ट है कि सुभाष की जीत के तुरंत बाद गांधी ने कार्य समिति के इस्तीफे का प्रस्ताव रखा था। 8 फरवरी 1939 को पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को लिखा था कि "हमारे लिए बोस के साथ काम करना असंभव था और वे वास्तव में चाहते थे कि उन्हें पूरी स्वतंत्रता दी जाए।" गांधी के कहने पर जवाहरलाल और शरत बोस को छोड़कर पटेल और कार्य समिति के करीब 13 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। सुभाष ने टकराव से बचने की पूरी कोशिश की थी। वह गांधीजी से बातचीत करने बीमारी की हालत में वर्धा पहुंचे थे। हालांकि, 15 फरवरी को हुई बातचीत से कोई हल नहीं निकला।

नेहरू ने अलग से दिया था इस्तीफा

कार्य समिति के सदस्यों के इस्तीफे पर जवाहरलाल की प्रतिक्रिया अनोखी और अस्पष्ट थी। वे न तो इस्तीफा देने वालों का पक्ष ले सके और न ही सुभाष से सहमत हो सके, इसलिए उन्होंने सामूहिक इस्तीफे में शामिल होने के बजाय अकेले ही इस्तीफा दे दिया। इस तरह वे न तो गांधी और उनके समूह को और न ही सुभाष को खुश कर पाए।

कांग्रेस मंच से सुभाष बोस पर क्यों किए गए तीखे राजनीतिक हमले?

सुभाष वामपंथियों का पूर्ण समर्थन हासिल करने में असफल रहे, जिनका प्रतिनिधित्व करने का उन्होंने दावा किया था। वहीं दूसरी ओर गांधी के समर्थकों ने स्वाभाविक रूप से सुभाष के प्रस्ताव के पक्ष में जोरदार भाषण दिए। पंत प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने वाले राजगोपालाचारी ने कहा, 'दो नावें हैं। एक पुरानी नाव है, जिसे महात्मा गांधी चला रहे हैं। दूसरे के पास एक नई नाव है। महात्मा गांधी एक अनुभवी नाविक हैं जो आपको सुरक्षित रूप से ले जा सकते हैं। यदि आप दूसरी नाव में जाते हैं, जो मुझे पता है कि लीक हो रही है, तो सब डूब जाएंगे, और नर्मदा नदी वास्तव में गहरी है। नया नाविक कहता है, "यदि आप मेरी नाव में नहीं आते हैं, तो कम से कम मेरी नाव को अपनी नाव से बांध दें।" यह भी असंभव है। हम एक लीक हो रही नाव को एक अच्छी नाव से नहीं बांध सकते, जिससे हम डूबने के खतरे में पड़ जाएं।' पंत का प्रस्ताव पारित हो गया और इससे सुभाष बोस मुश्किल हालात में पड़ गए।

कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए भी सुभाष बोस को इस्तीफा क्यों देना पड़ा?

सुभाष बोस अपने खिलाफ राजगोपालाचारी के कठोर वक्तव्य और गांधीजी के सीतारामय्या की हार को अपनी हार मान लेने से आहत महसूस करने लगे। कांग्रेस की बैठक में हुई तब सुभाष बोस कांग्रेस के अध्यक्ष थे लेकिन उनके पास कोई कार्यसमिति नहीं थी। कोई और विकल्प न होने पर सुभाष ने सम्मानजनक कदम उठाया और अपना इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस को दिया गया सुभाष बोस ने संक्षिप्त बयान देते हुए लिखा था- 'उन्हें तैयारी के लिए बहुत कम समय मिला था।' उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर 'फॉरवर्ड ब्लॉक' की स्थापना की। 

गांधी और सुभाष के ​बीच मतभेद था, मनभेद नहीं

गांधी और सुभाष के बीच तमाम असहमतियों के बावजूद दोनों एक-दूसरे का बेहद सम्मान करते थे। सुभाष बोस ने गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी। वहीं गांधी उन्हें देशभक्तों के राजकुमार कहकर बुलाते थे।

गांधी और सुभाष चन्द्र बोस: किन मुद्दों पर दोनों नेताओं में थीं असहमतियां?

  • गांधीजी ने हमेशा अहिंसा (Non-violence) और सत्याग्रह पर जोर दिया। इसके विपरीत सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष जरूरी है। सुभाष बोस ने आगे चलकर आजाद हिंद फौज का गठन किया।
  • गांधीजी अंग्रेजों के साथ बातचीत करके अहिंसा के रास्ते आजादी चाहते थे, जबकि बोस द्वितीय विश्व युद्ध का फायदा उठाकर जर्मनी और जापान जैसी धुरी शक्तियों से मदद लेकर अंग्रेजों को सशस्त्र संघर्ष के रास्ते पर चलकर देश से तुरंत उखाड़ फेंकना चाहते थे।
  • गांधीजी ग्राम स्वराज्य और सादगी के समर्थक थे। वह स्वदेशी तरीके से चरखा और खादी उत्पादन के रास्ते देश को विकास के रास्ते आगे ले जाना चाहते थे लेकिन सुभाष चंद्र बोस एक मजबूत और औद्योगिक भारत (Industrialized India) के पक्षधर थे।

1939 में कांग्रेस पार्टी में पहली बड़ी फूट कैसे पड़ी?

कांग्रेस में 1939 में सुभाष बोस के पार्टी छोड़कर जाने और आजाद हिंद फौज संगठन बनाने से कांग्रेस में दरार पैदा हुई। कांग्रेस पार्टी में ज्यादातर बार निर्विवाद रूप से अध्यक्ष चुने गए। चुनाव महज औपचारिकता रही। दो बार पार्टी के शीर्ष पद पर बैठे लोगों के मत के खिलाफ चुनाव हुए और दोनों बार पार्टी में दरार पड़ी। पहली बार सुभाष बोस के दोबारा चुनाव जीतने पर पार्टी में दरार पड़ी थी जबकि दूसरी बार संसदीय दल के नेता पद के लिए हुए चुनाव के बाद पार्टी में फूट पड़ी थी।

इंदिरा गांधी से मतभेद होने पर दूसरी बार कांग्रेस में पड़ी थी फूट

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता के. कामराज समेत पार्टी के ज्यादातार नेता इंदिरा गांधी के पक्ष में थे लेकि मोरारजी देसाई पार्टी के अंदर चुनाव की मांग पर अड़े रहे। नेता पद के लिए चुनाव कराने की मोरारजी की मांग के बारे में इंदिरा गांधी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे डॉ. कर्ण सिंह ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि मोरारजी भाई की चुनाव कराने की मांग वाजिब थी। उन्होंने कहा, "यह लोकतांत्रिक मांग थी। इस चुनाव में मोरारजी हार गए, लेकिन उनके मन में प्रधानमंत्री पद हासिल करने की कसक बनी रही। उनके और मोरारजी के बीच मतभेद गहराते चले गए और 1969 में वह दक्षिणपंथियों मित्रों के साथ पार्टी से अलग होकर जनता पार्टी में शामिल हो गए। उन्होंने 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी समेत करीब 148 कांग्रेसी नेताओं को लोकसभा चुनाव में धूल चटाई। मोरारजी देश के प्रधानमंत्री बनने में भी कामयाब हुए।"

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