Super El Nino 2026: सुपर अल नीनो सिर्फ एक मौसम नहीं है, बल्कि भारत और दुनिया के भविष्य पर मंडरा रहे क्लाइमेट खतरे का बड़ा संकेत है। प्रशांत महासागर का लगातार बढ़ता तापमान भारत समेत दुनिया भर के मौसम पर प्रतिकूल असर डाल रहा है, क्लाइमेट चेंज के कारण अल नीनो पहले से ज्यादा खतरनाक होने और बार-बार आने की आहट को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इसे सुपर अलनीनो कहा है
Super El Nino 2026: पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है। हर साल रिकॉर्ड बन रहे हैं और टूट रहे हैं। कहीं महीनों सूखा पड़ रहा है, तो कहीं कुछ देर की बारिश ही शहरों को डूबो रही है। अब वैज्ञानिक जिस खतरे को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित नजर आ रहे हैं उसका नाम है 'सुपर अल नीनो।' समुद्र में उठने वाली वो गर्म लहरें जो भारत के मानसून, खेती, पानी और इंसानी जिंदगी तक सब कुछ बदल सकती है। दुनिया भर पर इसका खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिक बार-बार चेता रहे हैं। आखिर यह कितना खतरनाक है और क्यों इसे प्रकृति के लिए चेतावनी माना जा रहा है… पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट
देश भर के दर्जनों शहरों में तापमान 45 डिग्री के पार बना हुआ है। इस बीच मानसून को लेकर मौसम एक्सपर्ट ने चेतावनी जारी की है और इस बार के मानसून की तुलना 2002 के मानसून से कर रहे हैं। दरअसल मौसम विभाग पहले ही अलर्ट कर चुका है कि इस बार अल नीनो (Super El Nino 2026) का खतरा हमारे मानसून पर मंडरा रहा है। उनका मानना है कि इससे मानसून कमजोर पड़ सकता है और गर्मी ज्यादा बढ़ सकती है।
स्काईमेट एजेंसी के महेश पलावत के मुताबिक 2002 में आए El Nino से इस बार के मौसम की तुलना की जा रही है। उस साल मानसूनी बारिश केवल 81 फीसदी हुई थी। हालांकि इस साल इतनी कम बारिश नहीं होगी लेकिन कम होगी। 2002 में भी मानसून समय से पहले केरल पहुंचा था। लेकिन आगे इसकी प्रोग्रेस काफी धीमी हो गई थी। वह 79 दिन में पूरे भारत को कवर कर सका था। जबकि सामान्य तौर पर वह 38 दिन में ही पूरे भारत में पहुंच जाता है। 2019 से पहले यह 45 दिन में अपनी जर्नी पूरी करता था। 2020 से इसमें 7 दिन की कमी देखी गई। 2002 में 15 अगस्त को मानसून पूरे भारत में सक्रिय हो पाया था।
पलावत के मुताबिक जून में तो मानसूनी बारिश ठीक रहने की संभावना है। लेकिन जुलाई, अगस्त और सितंबर में कम बारिश के आसार लग रहे हैं। बताया जा रहा है कि अक्टूबर 2026 से फरवरी 2027 तक सुपर अल नीनो की स्थिति सबसे ज्यादा दिख सकती है। माना जा रहा है कि यदि सुपर अलनीनो आता है तो यह अब तक का सबसे शक्तिशाली अलनीनो हो सकता है।
NOAA के मुताबिक यह Super El Nino इस बार 2026 से विकसित होने फरवरी 2027 तक उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों तक जारी रहने की संभावना है।
मौसम एक्सपर्ट और क्लाइमेट इमरजेंसी इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर पीटर डिकार्टन के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से धरती का तापमान 2024 के रिकॉर्ड तापमान को छूने के बेहद करीब पहुंच चुका है। अप्रैल 2026 में जारी IMD के मानसून पूर्वानुमान के मुताबिक मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत करीब 92 प्रतिशत रहने की संभावना है। इसे सामान्य से कम माना गया है। पूर्वानुमान में यह भी बताया गया कि कम वर्षा वाले मानसून यानी LPA के 90 पर्सेंट से कम करीब 35 फीसदी रहने की संभावना है।
ऐसे में IMD का कहना है कि यदि मानसून के मुख्य सीजन में यदि Super El Nino सक्रिय हुआ तो भारत में सूखा पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
मई से ही अल नीनो की शुरुआत हो चुकी है। पूर्वानुमान डराने वाले आगामी अलनीनो के अक्टूबर में 65 फीसदी तक आशंका दिखाई दे रही है। यह इतिहास के सबसे मजबूत अलनीनो में से एक बन सकता है।
अक्टूबर से फरवरी तक की अवधि में समुद्र की सतह के तापमान में 3.6 डिग्री फॉरेनहाइट और 2 डिग्री सेल्शियस की स्थिति हो सकती है। इसे ही Super El Nino कहा जा रहा है। कुछ एक्सपर्ट्स ने इसे राक्षस तक कहा है। अगर ऐसा हुआ तो देश भर के ज्यादातर हिस्सों में कहीं भीषण बारिश, कहीं भीषण गर्मी, कहीं भीषण सूखा यानी जो भी होगा वो एक्सट्रीम लेवल पर नजर आएगा। संभावना यह भी है कि अल नीनो जुलाई तक आ जाए और ये चरण फरवरी 2027 तक यानी लगभग एक साल।
NOAA ने कहा था Super El Nino करीब है। 0.5 डिग्री ज्यादा हो जाता है। वैश्विक जलवायु पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। हालिया अलनीनो मई 2023-मार्च 2024 तक चला। और 2024 के अब तक का सबसे गर्म वर्ष बनने में आंशिक रूप से जिम्मेदार रहा। क्लाइमेट ब्रिफ के 21 अप्रैल 2026 को प्रकाशित जलवायु आंकलन के मुताबिक अगर आगामी अल नीनो शक्तिशाली या सुपर शक्तिशाली होता है, तो 2027 पिछले रिकॉर्ड तोड़ सकता है। यह भी संभावना है कि आने वाला अल नीनो खुद ही अपना रिकॉर्ड तोडे़गा।
अलबानी विश्वविद्यालय वायुमंडलीय और पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर पाल राउंडी ने 5 मई को एक्स पर पोस्ट शेयर की थी इस पोस्ट में लिखा है कि 1870 के दशक के बाद अल नीनो (Super El Nino) की संभावना को लेकर विश्वास अब बढ़ता जा रहा है।
अल नीनो पृथ्वी के सबसे प्रभावशाली मौसमी चक्रों में से एक माना जाता है। यह चक्र तब बनता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है। सामान्य तौर पर अल नीनो हर 2 से 7 साल में आता है, लेकिन जब समुद्र का तापमान सामान्य से कई गुना ज्यादा बढ़ जाए और उसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर गंभीर रूप से दिखने लगे, तब इसे 'Super El Nino' कहा जाता है।
16वीं 17वीं शताब्दी में दिया नाम 'अल नीनो'
पेरू और इक्वाडोर (दक्षिण अमेरिका) के मछुआरों ने सबसे पहले इस घटना को नोटिस किया था। उन्होंने देखा कि हर कुछ वर्षों में क्रिसमस के समय प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता था, जिससे मछलियां गायब हो जाती थीं। क्रिसमस के आसपास होने के कारण, पेरू के मछुआरों ने इसे स्पेनिश में 'अल नीनो' नाम दिया, जिसका अर्थ होता है 'छोटा बच्चा' या 'बाल ईसा' (The Christ Child) होता है।
1893- 19वीं सदी के अंत तक मौसम वैज्ञानिकों जैसे चार्ल्सटॉड ने पहली बार महसूस किया कि भारत के सूखे और ऑस्ट्रेलिया के मौसम में कुछ संबंध है।
20वीं सदी की शुरुआत में 1920 के दशक में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग प्रमुख गिल्बर्ट वॉकर ने साउदर्न ऑसिलेशन की खोज की, जो वायुमंडलीय दबाव में बदलाव को दर्शाता है।
1969 में वैज्ञानिक जैकब बर्कनीज ने साबित किया कि समुद्र का गर्म होना अल नीनो और वायुमंडलीय दबाव का कम होना साउदर्न ऑसिलेशन दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए इसे सामूहिक रूप से ENSO यानी (El Nino-Southern Oscillation) कहा जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह सिर्फ समुद्र में होने वाला बदलाव भर नहीं है, बल्कि पूरी पृथ्वी के climate system को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है। भारत में इसका सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा असर नजर आता है। क्योंकि इसका सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। अल नीनो के दौरान मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे सूखा, फसलों का नुकसान और पानी संकट जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के ऊपर Trade Winds (यानी पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली हवाएं) चलती हैं। ये हवाएं गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं। इसके कारण दक्षिण अमेरिका के पास समुद्र का ठंडा पानी ऊपर आता रहता है। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तब गर्म पानी वापस पूर्वी प्रशांत सागर की ओर फैलने लगता है। इसके कारण इस ओर की समुद्री सतह का तापमान तेजी से बढ़ जाता है। यही गर्मी (Super El Nino) वातावरण में जाकर बारिश, हवा और तापमान के पैटर्न को बदल देती है।
इसे इतिहास का सबसे खतरनाक अलनीनो (Super El Nino) कहा जाता है। इसके असर से भारत चीन और ब्राजील में भीषण अकाल पड़ा था। इस वैश्विक अकाल में 5 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे। जो उस समय वर्ल्ड पॉपुलेशन का 3 फीसदी था।
इस अल नीनो को भी अब तक के सबसे ताकतवर El Nino में गिना जाता है। इस दौरान समुद्र का तापमान सामान्य से 2.5 डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक बढ़ गया था। इसके असर से इंडोनेशिया में भयंकर जंगल की आग, पेरू और इक्वाडोर में बाढ़, हजारों मौतें, दुनिया भर में फसल संकट जैसी आपदाएं झेलनी पड़ीं।
यह ऐसा दौर था जब पृथ्वी ने रिकॉर्ड global temperature दर्ज किया। भारत में भीषण Heatwave आईं। कई देशों में पानी संकट बढ़ा।
इस बार भी वैज्ञानिकों ने इसे सबसे मजबूत (Super El Nino) माना। इसके कारण दुनियाभर में तापमान और मौसम के पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
Super El Nino के प्रभाव से भारत में मानसून कमजोर हो सकता है। और भारत पूरी तरह से मानसून पर ही डिपेंड देश है। इससे यहां कम बारिश होगी। कम बारिश होने का मतलब है यहां धान, दाल, गन्ना जैसी फसलें इससे प्रभावित होंगी। जल स्रोत खाली हो सकते हैं। जल संकट से बिजली उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा।
भीषण गर्मी और हीट जन-जीवन को प्रभावित कर सकती है। El Nino वर्षों में भारत में Heatwave ज्यादा खतरनाक हो जाती हैं। कई वैज्ञानिक studies में पाया गया कि अल नीनो के दौरान भारत में तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है।
भारत में मानसून ही तय करता है कि इस बार पेयजल की स्थिति कैसी रहने वाली है। लेकिन कमतर मानसून कम बारिश होने के कारण भूमिगत जल का स्तर और नीचे चला जाएगा। नदियां-तालाब जैसे जलस्रोत सूखने की स्थिति बनेगी। यानी-
Super El Nino का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर खाद्य उत्पादन और महंगाई पर भी पड़ता है। क्योंकि जब बारिश कम होती है, तो खेती प्रभावित होती है, उत्पादन घटता है, खाने की चीजें महंगी हो जाती हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, दालें, गेहूं, चावल, सब्जियां इसके कारण सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। इसका असर आपकी थाली पर पड़ता है।
पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी पांडे कहते हैं, Climate Change के कारण समुद्र लगातार गर्म हो रहे हैं। यही हम वैज्ञानिकों के डर है की वजह है, क्योंकि इसी वजह से भविष्य में ज्यादा शक्तिशाली Super El Nino देखने को मिल सकते हैं।
वहीं 2014 में Nature Climate Change journal में प्रकाशित research में भी कहा गया था कि warming climate extreme El Nino events की frequency बढ़ा सकता है।
इसका सीधा अर्थ है धरती पर ज्यादा खतरनाक Heatwave, ज्यादा अस्थिर मानसून, ज्यादा extreme weather की घटनाएं होना। Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) की reports भी warming oceans को climate instability की बड़ी वजह मानती हैं।
वैज्ञानिक डॉ. सुभाष सी. पांडे के मुताबिक भारत ने Heat Action Plans, जल संरक्षण अभियान और climate adaptation strategies शुरू की हैं। लेकिन आने वाले समय के लिए (Super El Nino) और तैयारी की जरूरत है।
डॉ. सुभाष बताते हैं कि जल संरक्षण, हरियाली बढ़ाना, climate-resilient farming, carbon emissions कम करना, बच्चों और बुजुर्गों के लिए heat safety systems की दिशा में काम करना जरूरी और अहम है। भारत सरकार का National Action Plan on Climate Change और NDMA Heatwave Guidelines इसी दिशा में बनाए गए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बार-बार बढ़ती extreme weather events यह संकेत हैं कि पृथ्वी का climate balance बिगड़ रहा है। Super El Nino इस बात की चेतावनी हो सकता है कि अगर इंसानों ने carbon emissions और environmental destruction नहीं रोका, तो भविष्य में मौसम और ज्यादा खतरनाक हो सकता है।