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CG Naxalism: नक्सलवाद के अंत की डेडलाइन आज, सुभ्रांशु चौधरी से नक्सलमुक्त बस्तर पर खास बातचीत, भविष्य को लेकर कहा

CG Naxalism: जंगल के अधिकार, माइनिंग से मिलने वाला लाभ, मातृभाषा में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा, ये वे मूल मुद्दे हैं जिन पर अब गंभीरता से काम करना होगा। अगर इन सवालों को नजरअंदाज किया गया, तो असंतोष फिर से जन्म ले सकता है।

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Mar 31, 2026
नक्सल मामलों के जानकार सुभ्रांशु चौधरी (Photo Patrika)

CG Naxalism: बस्तर में नक्सलवाद के अंत की तय समय-सीमा 31 मार्च करीब आते ही एक नए दौर की शुरुआत की उम्मीदें और चुनौतियां साथ-साथ दिखाई दे रही हैं। लंबे समय तक हिंसा, भय और संघर्ष से जूझते इस क्षेत्र में अब हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। नक्सल मामलों के जानकार सुभ्रांशु चौधरी का मानना है कि यह बदलाव केवल सैन्य कार्रवाई का परिणाम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के भीतर आए बड़े मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का नतीजा है।

उनके अनुसार, 2015 के बाद स्थानीय लोगों ने हिंसा से बाहर निकलने का मन बनाया और धीरे-धीरे यह बदलाव निर्णायक साबित हुआ। हालांकि उनका यह भी कहना है कि नक्सलवाद का कमजोर होना अंत नहीं, बल्कि एक नई चुनौती की शुरुआत है। जंगल के अधिकार, माइनिंग से मिलने वाला लाभ, मातृभाषा में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा, ये वे मूल मुद्दे हैं जिन पर अब गंभीरता से काम करना होगा। अगर इन सवालों को नजरअंदाज किया गया, तो असंतोष फिर से जन्म ले सकता है। ऐसे में बस्तर के भविष्य के लिए सबसे जरूरी है- संवाद, विश्वास और संवेदनशील विकास की दिशा में ठोस कदम। बातचीत के प्रमुख अंश…

सवाल: 31 मार्च के बाद बस्तर में क्या बदलाव दिखेगा?

जवाब: जो बड़ा इलाका नक्सलियों के कब्जे में था, वहां आजादी जैसा माहौल है। अब सवाल उसके बाद का है- जैसे 26 जनवरी 1950 में संविधान के साथ देश आगे बढ़ा, वैसे ही बस्तर के लिए भी स्पष्ट दिशा तय करने की जरूरत है। बस्तर में कोई जमींदारी वैसी नहीं थी जैसी बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश में थी, जहां से नक्सल आंदोलन की शुरुआत हुई थी। बस्तर में यह लड़ाई मूलत: जंगल के अधिकार को लेकर रही है। तो सबसे बड़े सवाल यह हैं कि क्या वन विभाग के रवैये में बदलाव आएगा? माइनिंग का फायदा स्थानीयों तक पहुंचेगा?

सवाल: 31 मार्च की समयसीमा कैसे बनी और इसके पीछे क्या प्रक्रिया रही?

जवाब: समय-सीमा कैसे तय हुई, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन पिछले दो सालों की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। इसकी शुरुआत 16 जनवरी 2024 से हुई, जब नक्सली नेतृत्व की ओर से एक पत्र लिखा गया कि अब रणनीति बदलनी चाहिए और हथियार छोड़ने पर विचार करना चाहिए। हालांकि केंद्रीय समिति ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन यहीं से बदलाव की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे संगठन में विभाजन हुआ, कुछ लोगों ने आत्मसमर्पण किया और अंतत: यह स्थिति बनी कि आंदोलन कमजोर होता गया।

सवाल: हिड़मा और आदिवासी नेतृत्व की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: हिड़मा आदिवासी मुद्दों- जंगल, स्वायत्तता और पेसा जैसे विषयों पर बातचीत चाहता था। हालांकि सरकार ने चर्चा नहीं की। केवल तीन मांगें मानी गईं- बाहर आने पर केस नहीं होगा, दोबारा पुलिस में नहीं डाला जाएगा और एक संगठन को वैधता दी जाएगी। हिड़मा इन शर्तों से संतुष्ट नहीं हुआ और वापस संघर्ष में चला गया।

सवाल: इस लड़ाई में असली जीत किसकी रही?

जवाब: सैन्य रूप से यह जीत सरकार की है, लेकिन असल में यह जीत बस्तर के लोगों की है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि 80 प्रतिशत सफलता लोगों से मिली जानकारी के कारण हुई और केवल 20 प्रतिशत तकनीक और संसाधनों से। 2015 के बाद आदिवासियों ने खुद तय किया कि उन्हें इस हिंसा से बाहर निकलना है। यही इस संघर्ष का टर्निंग प्वाइंट रहा।

सवाल: क्या 31 मार्च के बाद फिर से पुराने हालात बनने का खतरा है?

जवाब: यह चिंता बिल्कुल वास्तविक है। आदिवासियों को डर है कि वन विभाग फिर से "जमींदार" की तरह व्यवहार करेगा। बस्तर की अर्थव्यवस्था जंगल पर आधारित है, खेती कम है। इसके अलावा माइनिंग को लेकर भी असंतोष है- 60 सालों में स्थानीय लोगों को बहुत कम लाभ मिला है। अगर यही स्थिति जारी रही तो असंतोष फिर से बढ़ सकता है।

सवाल: क्या नक्सली आंदोलन फिर से लौट सकता है?

जवाब: जंगल में सशस्त्र आंदोलन के रूप में इसकी वापसी की संभावना कम है। लेकिन कुछ लोग शहरों में सक्रिय हो सकते हैं। हर समाज में छोटे स्तर के उग्र समूह होते हैं, लेकिन वे तभी मजबूत होते हैं जब जनता उनके साथ जुड़ती है। अगर मूल समस्याएं हल नहीं हुईं, तो किसी नए रूप में आंदोलन फिर उभर सकता है।

सवाल: आगे के लिए सबसे जरूरी कदम क्या होने चाहिए?

जवाब: सबसे जरूरी है संवाद। माइनिंग को न्यायपूर्ण बनाना होगा। मातृभाषा में शिक्षा देना जरूरी है। स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा बनाना होगा। तकनीक के जरिए भाषा की बाधा खत्म की जा सकती है।

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