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दशकों बाद लौटी परंपरा… अब नक्सलियों को नहीं, देवताओं को चढ़ता है फसल का पहला पहला अंश

Sukma: बस्तर में नक्सलियों के आर्थिक नेटवर्क के कमजोर होने से आदिवासियों को ‘लाल टैक्स’ से राहत मिली है। पहले जहां मवेशी और जमीन के आधार पर वसूली होती थी, अब ग्रामीण अपनी कमाई का उपयोग खुद के विकास में कर पा रहे हैं।

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Apr 01, 2026
लाल आतंक का 'आर्थिक सूर्यास्त' (photo source- Patrika)

देवेंद्र गोस्वामी/छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के जगरगुंडा में जब किसान के घर धान की नई फसल आती है, तो परंपरा के अनुसार पहला अंश देवी-देवताओं के लिए निकाला जाता है। लेकिन सुकमा के धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में दशकों तक यह परंपरा खौफ के साये में बदली हुई थी। यहां ग्रामीण अपनी फसल का पहला हिस्सा भगवान के लिए नहीं, बल्कि नक्सलियों के 'पीएलजीए' कैडर्स के लिए अलग रखते थे।

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नक्सलियों का आर्थिक नेटवर्क ध्वस्त

आज जब नक्सल साम्राज्य अपने अंत की ओर है, तो जगरगुंडा और चिंतलनार जैसे इलाकों के मासूम आदिवासियों ने चैन की सांस ली है। उनकी मेहनत की कमाई पर अब 'लाल आतंक' का पहरा खत्म हो गया है। आज जगरगुंडा और सुकमा के सुदूर इलाकों में सड़कों का जाल बिछने और सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित होने से नक्सलियों का यह आर्थिक नेटवर्क ध्वस्त हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि अब वे अपनी मेहनत की कमाई का उपयोग अपने बच्चों की शिक्षा और घर की जरूरतों के लिए कर पा रहे हैं। बस्तर का आदिवासी अब लेवी (वसूली) के बोझ से आजाद होकर विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहा है।

वसूली का चक्र: मानसून से पहले का 'टारगेट'

सरेंडर कर चुके नक्सली सेमरु ने संगठन के आर्थिक तंत्र का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए बताया कि नक्सलियों की एरिया कमेटी के पास वसूली का एक कड़ा वार्षिक कैलेंडर होता था। मानसून के दौरान जंगलों में आवाजाही मुश्किल हो जाती है, इसलिए जनवरी से जून के बीच वसूली का मुख्य टारगेट पूरा किया जाता था। इस दौरान नक्सली गांव-गांव घूमकर अनाज, पैसा और अन्य संसाधनों का भंडार भरते थे ताकि बारिश के महीनों में संगठन का खर्च निर्बाध रूप से चलता रहे।

दहशत का टैक्स: समझाइश से शुरू होकर मौत की धमकी तक

चिंतलनार के ग्रामीण सुंदर कांजे बताते हैं कि नक्सलियों ने वसूली के लिए एक व्यवस्थित लेकिन क्रूर तंत्र बना रखा था। गांव वाले खुद ही डर के मारे तय टैक्स और अनाज इकट्ठा करते थे। जब एरिया कमांडर गांव पहुंचता, तो उसे सारा सामान सौंप दिया जाता था। यदि कोई परिवार हिस्सा देने में असमर्थ होता या विरोध करता, तो उसे पहले संगठनात्मक समझाइश दी जाती थी। यदि फिर भी बात नहीं बनती, तो उसे जन अदालत और गंभीर परिणामों की धमकी देकर डराया जाता था। दहशत इतनी थी कि ग्रामीण अपनी जरूरतों को मारकर नक्सलियों का पेट भरते थे।

Sukma News: घर-घर सर्वे और गुप्त जांच

वसूली के बाद भी नक्सलियों को ग्रामीणों पर भरोसा नहीं होता था। चिंतलनार के ही आकाश पोरस ने बताया कि संगठन अपने जनमिलिशिया सदस्यों को घर-घर सर्वे के लिए भेजता था। वे बारीकी से जांचते थे कि किस ग्रामीण के पास कितने मवेशी हैं, कितनी जमीन है और फसल कितनी हुई है। हर घर का विस्तृत ब्योरा रजिस्टर में दर्ज होता था ताकि कोई भी टैक्स चोरी न कर सके।

करोड़ों का काला कारोबार

दरभा डिवीजन के एक पूर्व नक्सली के अनुसार, अवैध वसूली का यह खेल छोटा-मोटा नहीं था। हर डिवीजन में सालाना वसूली का आंकड़ा एक करोड़ रुपए के पार चला जाता था। केवल तेंदूपत्ता ठेकेदारों से ही साल भर में एक करोड़ तक की उगाही हो जाती थी। इसके अलावा सड़क, पुल और विकास कार्यों के ठेकेदारों से कमीशन लेना संगठन की आय का सबसे बड़ा जरिया था।

नक्सलियों के 'अघोषित टैक्स' की सूची

ट्रैक्टर मालिक 15,000 सालाना
बड़ी दुकानें 5,000 सालाना
छोटी दुकानें 3,000 सालाना
आम घर 200 से 300 सालाना
सरकारी कर्मचारी 1,000 से 1,500 सालाना
तेंदूपत्ता ठेकेदार 40 से 50 प्रति मानक बोरा
विकास कार्य/ठेकेदार कुल लागत का 5 से 10 प्रतिशत
महुआ प्रति घर 'एक पैली'
संगम शुल्क 15 प्रति व्यक्ति (न्यूनतम)
साप्ताहिक बाजार ₹100 से ₹200 प्रति दुकानदार

Updated on:
01 Apr 2026 02:57 pm
Published on:
01 Apr 2026 02:55 pm
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