
अगर किसी बैंक में दो अरब से ज्यादा की पूंजी जमा हो, तो उसकी सुरक्षा के लिए कितने पहरेदार चाहिए? भिलाई में एक ऐसा बैंक है, जहां न कैश जमा होता है, न सोना-चांदी और न कोई लॉकर है। यहां जमा होती है श्रद्धालुओं के हाथों से लिखी गई एक ही अमूल्य पूंजी-‘सीताराम’।
सेक्टर-2 स्थित रामभद्र सेवा मंडल के अनुसार, पिछले 43 वर्षों में इस अभियान के जरिए दो अरब से अधिक बार ‘सीताराम’ नाम लिखा जा चुका है। इन नामों को पुस्तिकाओं में संकलित कर अयोध्या स्थित श्री सीताराम नाम बैंक में जमा कराया जाता है।
इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1983 में आचार्य प्रेम नारायण शर्मा ने की थी। मंडल से जुड़े श्रद्धालुओं को निर्धारित पुस्तिकाएं दी जाती हैं। इनमें वे नियमित रूप से ‘सीताराम’ लिखते हैं। भरी हुई पुस्तिकाएं एकत्र की जाती हैं और फिर अयोध्या भेजी जाती हैं।
यहां ‘जमा’ होने वाली पूंजी का कोई बाजार मूल्य नहीं है। न उस पर ब्याज मिलता है और न शेयर बाजार की तरह उसका भाव बदलता है। फिर भी श्रद्धालुओं के लिए हर लिखा हुआ नाम आस्था और साधना की पूंजी है। दो अरब नाम… 43 साल… और आज भी जारी है रामनाम लेखन का सिलसिला।
रामभद्र सेवा मंडल के अनुसार, रामनाम लेखन को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं देखा जाता। नियमित रूप से नाम लिखने से मन को एकाग्र करने, अनुशासन विकसित करने और नई पीढ़ी को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जोडऩे का प्रयास किया जाता है। यानी यहां एक छोटी-सी गतिविधि- कागज पर नाम लिखना] सामूहिक आस्था के बड़े अभियान में बदल गई है।
रामनाम लेखन इस मंडल की गतिविधियों का सिर्फ एक हिस्सा है। यहां हर मंगलवार सुंदरकांड, अमावस्या पर भिक्षु भोज और पूर्णिमा पर यज्ञ का आयोजन किया जाता है। मंडल के अनुसार, अब तक करीब 910 यज्ञ कराए जा चुके हैं। जनसहयोग से 13 अनाथ कन्याओं के विवाह भी कराए गए हैं। प्रत्येक अमावस्या पर करीब 750 लोगों के लिए भिक्षु भोज कराया जाता है।
इसके अलावा नैतिक शिक्षा, वेद-उपनिषद पाठ, अखंड रामायण, कर्मकांड और ज्योतिष की कक्षाएं भी संचालित की जाती हैं।
मंडल से जुड़ी एक घटना वर्ष 1998 की है। उस समय दुर्ग जिला भीषण सूखे की स्थिति से गुजर रहा था। मंडल के अनुसार, तत्कालीन सांसद स्वर्गीय ताराचंद साहू ने लोकमंगल की भावना से वरुण यज्ञ कराने की जिम्मेदारी मंडल को सौंपी थी। मंडल का दावा है कि यज्ञ के तीन दिन बाद बारिश हुई।
आज संपत्ति का मतलब आमतौर पर बैंक बैलेंस, जमीन, सोना या निवेश से लगाया जाता है। लेकिन भिलाई में 43 साल से चल रही यह परंपरा संपत्ति की एक अलग तस्वीर सामने रखती है। यहां दो अरब से ज्यादा ‘सीताराम’ नाम कागज पर दर्ज हैं। हर नाम के पीछे किसी व्यक्ति का समय, विश्वास और साधना जुड़ी है। पैसे की चोरी हो सकती है, सोना किसी तिजोरी से निकल सकता है। लेकिन हजारों-लाखों लोगों के हाथों से लिखे इन नामों की असली कीमत न चुराई जा सकती है, न बाजार में खरीदी-बेची जा सकती है। यही इस ‘बैंक’ की सबसे बड़ी खासियत है- यहां जमा पूंजी कागज पर दिखाई देती है, लेकिन उसकी कीमत आस्था में है।