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मां और पिता के लिए आज भी अलग-अलग नियम? UNFPA सर्वे में सामने आई भारत समेत दुनिया की दोहरी सोच

UNFPA Survey Report 2026: भारतीय समाज के साथ ही दुनिया भर में महिलाओं की बराबरी की बात की जाती है, लेकिन UNFPA का सर्वे में मिले चौंकाने वाले संकेत। सर्वे में शामिल हुए दुनिया के 73 देशों के एक लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए सर्वे में ज्यादातर प्रतिभागियों ने कामकाजी मांओं को पुरुषों की तुलना में कम पसंद किया, वहीं बच्चे न चाहने और तलाक पर भी महिलाओं के प्रति उनका नजरिया अलग-अलग दिखा
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Jul 15, 2026
UNFPA Report 2026 Gender Equality
UNFPA Report 2026 Gender Equality: photo AI Generated

UNFPA Survey Report 2026: हम आधुनिक दौर में जी रहे हैं और बरसों से महिलाओं की बराबरी को लेकर काम कर रहे हैं, सफल महिलाओं के उदाहरण बताते हमें गर्व होता है कि बात अब बराबरी पर आ चुकी है। वो जमीन से आसमान छूने लगी हैं, एक सिपाही बनकर देश की सीमाओं तक पहुंच रही है और हम गर्व से बराबरी की बात सोच रहे हैं। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि एक छत, एक बच्चा, एक ही नौकरी, लेकिन अगर फुल टाइम जॉब करने वाले पिता हों तो, सामाजिक प्रतिक्रिया अलग होती है और मां हो तो अलग। यही नहीं संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की Demographic Future Survey रिपोर्ट संकेत देती है कि परिवार, बच्चों से जुड़े कई फैसलों पर दुनिया की सोच आज भी महिलाओं के प्रति समान नहीं है। सर्वे में छोटे बच्चों के साथ फुल-टाइम जॉब करने वाली महिलाएं, बच्चे न चाहने वाली महिलाएं और छोटे बच्चों के रहते तलाक लेने वाली महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम पसंद की गईं। जबकि एक पुरुष को इन सभी स्वरूपों में सामाजिक स्वीकार्यता ज्यादा मिली।

patrika.com पर पढ़ें 'बदलती दुनिया, बदलता परिवार' और भाग-4 में जानें, भारत समेत दुनिया भर के कई देशों में बराबरी की बात करने वाली युवा पीढ़ी की सोच आज भी ज्यादा नहीं बदली, कुछ मामलों में लैंगिक असमानता आज भी यक्ष प्रश्न बनकर खड़ी है।

कामकाजी मां पर ज्यादा सवाल

जब युवक-युवतियों से पूछा गया कि यदि तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चों की परवरिश करते हुए कोई महिला या पुरुष फुल-टाइम नौकरी करे, तो वे इसे कितना स्वीकार या अस्वीकार करते हैं? इस सवाल पर इन प्रतिभागियों ने जो जवाब दिए वो स्पष्ट संकेत देते हैं कि वे फुल टाइम जॉब करने वाली महिलाओं को कम स्वीकृति देते हैं। जबकि पुरुषों को एक फुल टाइम जॉब करने वाले व्यक्ति के रूप में ज्यादा स्वीकृति मिली। यही अंतर वैश्विक स्तर पर भी दिखाई देता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी तीव्रता अलग-अलग है। कहीं ज्यादा तो, कहीं कम।

बच्चे की चाह नहीं रखने वाली महिलाओं को जज करते हैं लोग

सर्वे रिपोर्ट में एक और दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। सर्वे टीम ने जब इन लाखों युवक-युवतियों से सवाल पूछा कि यदि कोई महिला कभी बच्चे न पैदा करने का फैसला करे, तो लोग उसे कितना स्वीकार करते हैं। 18 से 39 साल के इन एक लाख से ज्यादा प्रतिभागियों ने समान आयु वर्ग की महिलाओं की तुलना में, एक महिला के इस निर्णय को स्वीकार ही नहीं किया। यह बड़ा इशारा है कि युवा पीढ़ी में जो बराबरी की बात करती है उसकी सोच में इस मुद्दे पर लैंगिक अंतर अब भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है।

तलाक पर भी अलग नजरिया

रिपोर्ट में छोटे बच्चों के रहते तलाक लेने वाली महिलाओं को लेकर भी इन युवक-युवतियों से रायशुमारी की गई। इस मामले पर राय देने वाले पुरुषों में ऐसी महिलाओं को लेकर अस्वीकृति ज्यादा नजर आई जबकि, पुरुषों में यह कम थी। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ यह इस मामले पर महिला और पुरुष के बीच इस अस्वीकृति का अंतर कुछ कम होता दिखाई देता है।

UNFPA Survey 2026 Info graphic: hindi transformation by AI

रिश्तों में बराबरी की चाह, लेकिन सोच से कहीं दूर

सीरीज के दूसरे भाग में हमने जाना था कि युवा भरोसेमंद और बराबरी वाले रिश्ते चाहते हैं। लेकिन यह आंकड़े बताते हैं कि सामाजिक सोच हर स्तर पर उतनी तेजी से नहीं बदली है। कुछ पारिवारिक भूमिकाओं में महिलाओं और पुरुषों के लिए अपेक्षाएं अब भी अलग-अलग हैं।

इस स्वीकृति और अस्वीकृति के बीच जनसंख्या पर इसका क्या असर?

UNFPA की पूरी रिपोर्ट का मूल सार यही दर्शाता है कि परिवार और बच्चों से जुड़े फैसले अकेले आर्थिक कारणों से नहीं होते। इनके पीछे सामाजिक अपेक्षाएं, लैंगिक भूमिकाएं और रिश्तों को लेकर समाज की सोच भी लोगों के निर्णयों को प्रभावित कर सकती है। UNFPA की सर्वे रिपोर्ट इन कारणों का प्रत्यक्ष कारण और परिणाम संबंध स्थापित नहीं करती, लेकिन यह जरूर दिखाती है कि पारिवारिक भूमिकाओं पर लोगों के दृष्टिकोण में आज भी अंतर साफ दिखाई देता है।

भारत के लिए बड़ी चुनौती!

भारत में भी महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी बढ़ी है। ऐसे में परिवार और काम के बीच संतुलन, बच्चों की देखभाल की साझा जिम्मेदारी और महिलाओं के करियर को लेकर सामाजिक सोच जैसे मुद्दे आगे और महत्वपूर्ण हो सकते हैं। UNFPA का सर्वे यह स्पष्ट तौर पर संकेत देता है कि समान अवसरों की चर्चा के साथ-साथ सामाजिक नजरिए में बदलाव भी उतना ही अहम है।

UNFPA की Demographic Futures Survey रिपोर्ट बताती है कि बदलती दुनिया में परिवार की तस्वीर भी बदल रही है। इसके विपरीत सामाजिक सोच उस तेजी से नहीं बदल पा रही, जितना कि उसे बदलने की जरूरत है। छोटे बच्चों की परवरिश, बच्चे पैदा करने का फैसला और विवाह जैसे मुद्दों पर महिलाओं और पुरुषों के प्रति युवाओं का नजरिया अलग-अलग नजर आता है। यही अंतर भविष्य में परिवार, रिश्तों और जनसंख्या से जुड़े फैसलों की चर्चा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सर्वे रिपोर्ट फैक्ट फाइल

  • रिपोर्ट में 53.7 फीसदी युवाओं ने छोटे बच्चों के साथ जहां फुल टाइम काम करने वाले पिता को स्वीकृति दी, वहीं फुल टाइम जॉब करने वाली महीलाओं को केवल 41.2 फीसदी लोगों ने ही स्वीकार किया।
  • छोटे बच्चों के रहत तलाक की स्थिति का सबसे ज्यादा विरोध दिखा है।
  • बच्चे पैदा न करने वाले मामले में भी समाज बंटा हुआ नजर आया। इस मुद्दे पर रायशुमारी में करीब एक तिहाई युवा ऐसे थे, जिन्होंने इसका विरोध किया, तो समर्थन करने वाले भी इतने ही लोग नजर आए।
  • बिना शादी के बच्चे पैदा करने की स्थिति को भी युवाओं ने कम स्वीकार किया।
  • जबकि बिना शादी के रिलेशनशिप यानी लिव इन रिलेशनशिप का युवाओं ने कुछ हद तक समर्थन किया।

घर और देखभाल की जिम्मेदारियों का असमान बंटवारा

UN Women की कार्यकारी निदेशक डॉ. सीमा सानी बहौस बिना वेतन वाले देखभाल के कार्य को लेकर अक्सर अपने भाषणों में स्पष्ट रूप से कहती आई हैं, कि देखभाल का काम करना हमारे समाज के साथ ही हमारी समृद्धि की भी रीढ़ है। इसके बिना न समाज का काम चल सकता है न ही अर्थव्यवस्था का। लेकिन देखभाल का यह कार्य लैंगिक समानता का मुद्दा भी है। क्योंकि महिलाएं और लड़कियां आज भी पुरुषों की तुलना में ढाई गुना ज्यादा समय इसी काम को देती हैं।

Dr Sima Sani Bahous UN Women Executive Director: डॉ. सीमा सानी बाहौस अक्सर लैंगिक असमानता पर बात करती हैं। उन्होंने देखभाल के काम को भी लैंगिंक समानता का मुद्दा माना है। (Photo: Courtesy-UN Women)

उनका मानना है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच घर और देखभाल की जिम्मेदारियों में समान बंटवारा नहीं किया जाता। ऐसे में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी कम हो जाती है। बिना वेतन वाला देखभाल का यह काम आज भी कम ही आंका जाता है। जो महिलाओं पर बड़ा बोझ बन जाता है, क्योंकि यही असमानता शिक्षा, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा में महिलाओं के लिए अवसरों को प्रभावित करती है।

दुनिया में आज भी करोड़ों महिलाएं श्रम बाजार से बाहर

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) के मुताबिक दुनिया में आज भी करोड़ों महिलाएं श्रम बाजार से बाहर हैं। इसका बड़ा कारण है, उन पर बिना वेतन वाले कार्यों की जिम्मेदारी। इसीलिए देखभाल की अर्थव्यवस्था में निवेश और सहायक नीतियां बेहद जरूरी हैं।

International Labour Organization: (Photo Source ILO)

बिना वेतन वाले देखभाल के काम महिलाओं के हिस्से ज्यादा

ILO की एक रिपोर्ट Care Work And Care Jobs में भी सामने आया है कि दुनिया के किसी भी देश में पुरुष और महिलाएं बिना वेतन वाले देखभाल कार्य को बराबर-बराबर साझा नहीं करते हैं। महिलाओं का हिस्सा या योगदान ही इसमें सबसे ज्यादा है।

UNFPA का नजरिया

UNFPA: photo ANI

लोगों में प्रजनन संबंधी निर्णय केवल व्यक्तिगत इच्छा का परिणाम नहीं है। बल्कि सामाजिक मानदंड, लैंगिक भूमिकाएं और उपलब्ध अवसर भी उन्हें प्रभावित करते हैं।

Published on:
15 Jul 2026 07:00 am