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Bijamandal Temple : नागपंचमी से पहले फिर खुला बीजामंडल का इतिहास, ताले में बंद आस्था और अदालत में इंतजार

Bijamandal Dispute : विदिशा के ऐतिहासिक बीजामंडल को लेकर फिर बहस तेज हो गई है। हिंदू पक्ष ने दस्तावेज और ऐतिहासिक प्रमाण पेश किए हैं। पक्षकारों ने छठी सदी के विजय मंदिर होने का दावा किया है। पूजा के अधिकार को लेकर कोर्ट में सुनवाई जारी है। एएसआई संरक्षित स्मारक होने की वजह से यहां प्रवेश बंद है। आइए पढ़ते हैं पुष्पेंद्र पांडेय की विस्तृत रिपोर्ट।
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Jul 28, 2026
Vidisha Bijamandal Bijamandal Dispute Bijamandal Temple Nag Panchami
बीजामंडल मंदिर को लेकर अदालत में सुनवाई जारी है। (Photo: Patrika)

Bijamandal Temple : हर साल नागपंचमी आते ही मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी विदिशा में आस्था और दर्द का एक शांत ज्वार उमड़ पड़ता है। वर्ष में केवल इसी एक दिन श्रद्धालु बंद ताले के बाहर धूप-दीप जलाकर आंसुओं के साथ लौटने को मजबूर होते हैं।

17 अगस्त को नागपंचमी के आते ही प्राचीन बीजामंडल (विजय मंदिर) को लेकर बहस एक बार फिर तेज होगी। धार की प्रसिद्ध भोजशाला में जिस तरह पुरातात्विक सर्वेक्षण और कानूनी प्रक्रिया के जरिए ऐतिहासिक सत्य उजागर हुआ, ठीक उसी तर्ज पर बीजामंडल में भी नियमित पूजा के अधिकार की मांग तेज हो चली है।

क्या है हिंदू पक्ष का दावा?

हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मूल रूप से छठी शताब्दी का भव्य भिल्लस्वामी सूर्य मंदिर है, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की संरक्षित सूची में होने के कारण आज भी ताले में जकड़ा है। याचिकाकर्ता शुभम वर्मा व सहयोगियों द्वारा अदालत में ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं, जहां एएसआइ सहित सभी पक्षों को नोटिस तामील हो चुके हैं। अब एएसआइ की ओर से जवाब का इंतजार है। अदालत के फैसले पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं।

नागपंचमी की सीलन और ताले के पार सिसकती आस्था

सावन की ठंडी बयार जब विदिशा की गलियों को छूती है, तो नागपंचमी का दिन श्रद्धालुओं के लिए केवल त्यौहार नहीं, बल्कि एक गहरी कसक लेकर आता है। बीजामंडल परिसर के भारी-भरकम लोहे के तालों के बाहर हर साल हजारों भक्त जुटते हैं। नम आंखों से बंद दरवाजे पर ही बेलपत्र और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। 365 दिनों में केवल इस एक दिन मिलने वाली यह प्रतीकात्मक अनुमति किसी मरहम की तरह लगती तो है, पर दिल का जख्म भर नहीं पाती। भक्तों का यही दर्द सवाल बनकर गूंजता है कि अपने ही आराध्य के दरबार में आस्था कब तक ताले के बाहर खड़े रहकर न्याय की भीख मांगेगी?

धार की भोजशाला से बीजामंडल की कानूनी तुलना

हाल के दिनों में धार की ऐतिहासिक भोजशाला में हुए वैज्ञानिक सर्वेक्षण और अदालती घटनाक्रम ने विदिशा के लोगों की उम्मीदों को नई पंख दिए हैं। धार की भोजशाला की भांति ही विदिशा का बीजामंडल भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है और लंबे समय से ऐतिहासिक पहचान के विवाद से जूझ रहा है। स्थानीय जनमानस और याचिकाकर्ताओं का मानना है कि जिस प्रकार भोजशाला में पुरातात्विक तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सत्य की परतें खुल रही हैं, ठीक उसी निष्पक्षता से बीजामंडल की वास्तविकता भी देश के सामने आनी चाहिए।

चालुक्य और परमार काल की अलौकिक धरोहर

बीजामंडल केवल पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि भारत की महान स्थापत्य कला और सांस्कृतिक वैभव का जीवित प्रमाण है। हिंदू पक्ष और इतिहासकारों के अनुसार, चालुक्य वंश के राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति ने यहां भगवान भिल्लस्वामी (सूर्यदेव) का आलौकिक मंदिर बनवाया था। बाद में परमार राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार कराकर इसे और विशाल रूप दिया, जिसके बाद यह विजय मंदिर और कालांतर में बीजामंडल कहलाया। प्राचीन विवरणों के मुताबिक, यह मंदिर देश के सबसे ऊंचे और भव्य देवालयों में शामिल था। इसका नक्काशीदार शिखर कई मील दूर से ही दिखाई देता था। ढलती शाम और उगते सूरज की किरणें जब इसके पत्थरों को छूती थीं, तो पूरा क्षेत्र एक अलौकिक ऊर्जा से भर उठता था।

कई आक्रमणों और बदलावों का दावा

इतिहास की त्रासदी यह रही कि इस धाम को कई बार आक्रांताओं की क्रूरता सहनी पड़ी। 1233-34 ईस्वी में इल्तुतमिश ने मंदिर में भारी लूटपाट और तोड़फोड़ की। यद्यपि स्थानीय समाज ने इसे फिर से खड़ा किया, लेकिन 1290 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी, 15वीं सदी में मांडू के महमूद खिलजी और 1532 ईस्वी में गुजरात के बहादुर शाह ने बार-बार इसे निशाना बनाया। विध्वंस की सबसे दर्दनाक पराकाष्ठा 1662 ईस्वी में देखने को मिली, जब मुगल शासक औरंगजेब ने तोपों से इसके गगनचुंबी शिखर को उड़ा दिया। संरचना में जबरन बदलाव कर इसे इस्लामी स्वरूप देने का प्रयास किया गया। हालांकि, इतिहासकार इन दावों पर अलग-अलग मत रखते हैं, लेकिन मंदिर के प्राचीन अवशेष और नींव आज भी अपने बीते वैभव की दास्तान बयां करते हैं।

आजादी के बाद शुरू हुआ आंदोलन

आधुनिक दौर का विवाद वर्ष 1922 में वेत्रवती (बेतवा) नदी में आई भीषण बाढ़ से शुरू हुआ। बाढ़ में जब स्थानीय ईदगाह डूब गई, तो प्रशासन ने मानवीय आधार पर बीजामंडल परिसर में कुछ समय के लिए नमाज की अस्थाई अनुमति दी। लेकिन धीरे-धीरे यह अस्थाई छूट विवाद का स्थायी कारण बन गई। स्वतंत्रता के बाद 1948 से 1964 के बीच हिंदू समाज ने अपने धार्मिक अधिकार के लिए अभूतपूर्व आंदोलन और सत्याग्रह चलाया। देशभर से आए श्रद्धालुओं ने गिरफ्तारियां दीं और यातनाएं सहीं। जनाक्रोश को देखते हुए सरकार ने अलग ईदगाह की व्यवस्था तो कर दी, परंतु मंदिर में नियमित पूजा का अधिकार फिर भी बहाल नहीं किया।

सरकारी अभिलेख की भूल और पर्यटन योजना पर सवाल

याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख आपत्ति यह है कि सरकारी दस्तावेजों में ऐतिहासिक बीजामंडल को मंदिर की जगह मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है। उनका कहना है कि प्रामाणिक पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इस राजस्व रिकॉर्ड को सुधारा जाना चाहिए। इसी बीच एएसआइ द्वारा इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की चर्चाएं भी गर्म हैं। इस पर हिंदू पक्ष का स्पष्ट कहना है कि जब तक इसके मूल ऐतिहासिक स्वरूप और इतिहास को सही तरीके से स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को सही सत्य कैसे बताया जा सकेगा?

अदालत के चौखट पर न्याय की आस

वर्तमान में यह संवेदनशील मामला न्यायालय के विचाराधीन है। याचिकाकर्ता शुभम वर्मा के मुताबिक, मंदिर के पक्ष में सभी ऐतिहासिक पुस्तकें, पुरातात्विक दस्तावेज और नक्शे अदालत में जमा कराए जा चुके हैं। कोर्ट ने एएसआइ सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिए हैं, जो तामील भी हो चुके हैं। एएसआइ ने अपना विस्तृत जवाब पेश करने के लिए समय मांगा है। लोगों को विश्वास है कि न्यायपालिका के माध्यम से सदियों से ताले में बंद सत्य बाहर आएगा और आस्था को उसका सम्मान मिलेगा।

Updated on:
28 Jul 2026 01:22 pm
Published on:
28 Jul 2026 01:20 pm