Vitamin D Dose: आज के समय में सेहत को लेकर जितनी जागरूकता बढ़ी है, उतनी ही एक नई समस्या ने जन्म लिया है 'सेल्फ मेडिकेशन' यानी खुद ही डॉक्टर बन जाना। जरा सी थकान, बदन दर्द या सुस्ती महसूस हुई नहीं कि लोग इंटरनेट या सोशल मीडिया की सलाह पर विटामिंस की गोलियां लेने लगते हैं। खासकर विटामिन D और कैल्शियम को तो लोग बेहद आम, सुरक्षित और सेहत के लिए एक 'चमत्कारी टॉनिक' मान लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हड्डियों को फौलाद बनाने की चाहत में बिना सोचे-समझे और लंबे समय तक खाया गया विटामिन D आपके दिल की नसों को 'पत्थर' बना सकता है? मेडिकल साइंस में इसे एक गंभीर और साइलेंट खतरा माना गया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि क्यों विटामिन D की अधिकता आपके दिल और धमनियों के लिए काल बन सकती है।
आम तौर पर हम विटामिन D को सिर्फ हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखते हैं। यह सच है कि विटामिन D हमारे शरीर की आंतों को भोजन से कैल्शियम सोखने में मदद करता है। इसके बिना शरीर कैल्शियम का इस्तेमाल नहीं कर सकता। लेकिन जब शरीर में विटामिन D की मात्रा जरूरत से ज्यादा (Toxicity) हो जाती है, तो यह पूरा सिस्टम फायदे की जगह जानलेवा नुकसान पहुंचाने लगता है। दरअसल, विटामिन D एक 'फैट सॉल्युबल' (Fat-Soluble) विटामिन है। इसका मतलब है कि यह विटामिन B या C की तरह पानी में घुलकर यूरिन के रास्ते शरीर से बाहर नहीं निकल पाता, बल्कि यह हमारे शरीर के फैट (वसा) और लिवर में जमा होता रहता है। इसलिए, जब कोई व्यक्ति डॉक्टर की सलाह के महीनों तक इसके हाई-डोज सप्लीमेंट्स लेता रहता है, तो इससे शरीर में विषाक्तता (Toxicity) पैदा हो जाती है।
आम तौर पर शरीर में विटामिन D और कैल्शियम का नॉर्मल लेवल कितना होना चाहिए, और यह किस स्तर पर पहुंचकर 'टॉक्सिक' या खतरनाक बन जाता है?
एक डॉक्टर के तौर पर मैं हमेशा अपने मरीजों को समझाता हूं कि हमारे शरीर की हड्डियों और इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए विटामिन डी और कैल्शियम की सही मात्रा होना बेहद जरूरी है। लेकिन, 'अति हर चीज की बुरी होती है', और यह बात विटामिंस पर भी लागू होती है।
विटामिन D एक 'फैट सॉल्युबल' विटामिन है, इसका हमारे शरीर में जमा होने से क्या दिक्कत आती है? यह यूरिन के रास्ते बाहर क्यों नहीं निकल पाता?
विटामिन डी मुख्य रूप से एक फैट-सॉल्युबल (वसा में घुलनशील) विटामिन है, जो पानी में नहीं घुलता। हमारी किडनी शरीर से केवल पानी और उसमें घुले तत्वों (वॉटर-सॉल्युबल विटामिन्स) को ही यूरिन के जरिए बाहर निकाल पाती है, फैट-सॉल्युबल तत्वों को नहीं। इसके अलावा, विटामिन डी शरीर में जाकर एक प्रोटीन बाइंडिंग एजेंट के साथ जुड़ जाता है। इस कारण इसका मॉलिक्यूल (अणु) बहुत बड़ा हो जाता है, जिसे किडनी के फ़िल्टर्स छानकर शरीर से बाहर नहीं कर पाते।
दूसरा कारण यह है कि फैट-सॉल्युबल होने की वजह से अतिरिक्त विटामिन डी लिवर की तुलना में शरीर के फैट टिश्यूज (वसा) में जाकर जमा (Accumulate) हो जाता है। यह हफ़्तों से लेकर कई महीनों तक शरीर में बना रहता है। इसलिए, यदि इसे लगातार ज़्यादा मात्रा में लिया जाए, तो इसका स्तर बढ़ता चला जाता है और यह टॉक्सिसिटी (Hypervitaminosis D) का कारण बनता है। चूंकि यह यूरिन के रास्ते बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए शरीर में इसका स्तर तभी कम होगा जब बॉडी इसे धीरे-धीरे खुद एब्जॉर्ब (खपत) करेगी। इसके अलावा इसे कम करने का और कोई दूसरा शॉर्टकट तरीका नहीं है।
अगर दिल की मुख्य नस (Aorta) कैल्शियम की वजह से सख्त हो जाए, तो इससे ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक का खतरा कितना बढ़ जाता है?
दरअसल, जब शरीर में विटामिन डी का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह कैल्शियम के साथ मिलकर हमारी धमनियों (Arteries) जैसे एओर्टा (Aorta) और अन्य छोटी रक्त वाहिकाओं में जमा होने लगता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह धमनियों की स्टिफनेस (Stiffness) बढ़ा देता है, यानी उन्हें सख्त और कड़ा बना देता है। इस सख्ती के कारण धमनियों का प्राकृतिक लचीलापन (Elasticity) खत्म हो जाता है, जो सामान्य तौर पर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने के लिए बेहद जरूरी होता है।
जब धमनियां सख्त हो जाती है, तो ब्लड प्रेशर अनियंत्रित होकर लगातार बढ़ने लगता है। यही बढ़ा हुआ हाई ब्लड प्रेशर आगे चलकर हार्ट अटैक (Heart Attack) का मुख्य कारण बनता है। हालांकि, विटामिन डी का बढ़ा हुआ स्तर सीधे तौर पर हार्ट अटैक नहीं लाता, लेकिन इसकी टॉक्सिसिटी के कारण होने वाली धमनियों की सख्ती और हाई ब्लड प्रेशर जैसे कारक, इनडायरेक्ट तरीके (अप्रत्यक्ष रूप) से मरीज़ में हार्ट अटैक का खतरा बहुत ज़्यादा बढ़ा देते हैं।
क्या यह सच है कि खून में बढ़ा हुआ कैल्शियम दिल के 'इलेक्ट्रिकल सिस्टम' को बिगाड़कर अचानक कार्डियक अरेस्ट (Sudden Cardiac Arrest) का कारण बन सकता है?
यह बिल्कुल सच है, क्योंकि शरीर में विटामिन डी का स्तर अत्यधिक बढ़ने से (जो कैल्शियम के साथ बाइंड होता है) इलेक्ट्रोलाइट इम्बैलेंस (असंतुलन) हो जाता है। इस असंतुलन के कारण दिल की धड़कनों की रफ्तार और लय बिगड़ जाती है, जिसे मेडिकल में एरिथमिया (Arrhythmias) कहा जाता है। कई बार इसकी वजह से सबसे खतरनाक एरिथमिया वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया (VT) हो जाता है। इसमें दिल के निचले हिस्से (Ventricles) सामान्य से कई गुना ज्यादा तेजी से पंप करने लगते हैं। इस अत्यधिक बढ़ी हुई गतिविधि को दिल बर्दाश्त नहीं कर पाता और मरीज को अचानक हार्ट अरेस्ट (Cardiac Arrest) आ जाता है।
इसके अलावा, विटामिन डी की अधिकता दिल के क्यूटी इंटरवल (QT Interval) को भी प्रभावित करती है, जो अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत का एक बड़ा कारण बन जाती है। यही वजह है कि विटामिन डी टॉक्सिसिटी को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। साथ ही, विटामिन डी की अधिकता से शॉर्ट क्यूटी इंटरवल (Short QT Interval) की स्थिति पैदा हो सकती है। इसके अलावा विटामिन डी के कारण जब शरीर में कैल्शियम का अत्यधिक अवशोषण (Absorption) और असंतुलन होता है, तो मरीजों में हार्ट ब्लॉक्स (Heart Blocks) की समस्या भी शुरू हो जाती है। जहां एक तरफ वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया में दिल की धड़कनें बहुत तेज हो जाती हैं, वहीं हार्ट ब्लॉक होने पर धड़कनें अचानक सामान्य से बिल्कुल कम हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में मरीज के दिल की रफ्तार अचानक इतनी धीमी पड़ जाती है कि वह तुरंत बेहोश हो जाता है। मरीजों को हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही इसकी सही और सीमित खुराक (Optimal Dose) लेनी चाहिए, क्योंकि बिना सोचे-समझे भारी मात्रा में सप्लीमेंट्स लेने से हाई ब्लड प्रेशर, सडन कार्डियक डेथ और दिल की गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
विटामिन D टॉक्सिसिटी या नसों में कैल्शियम जमने के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?
हाइपरविटामिनोसिस (विटामिन डी टॉक्सिसिटी) और धमनियों में कैल्शियम जमने के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है। इसके मुख्य लक्षणों में शामिल हैं।
आजकल लोग सोशल मीडिया या पड़ोसियों के कहने पर थकान होने पर खुद ही हाई डोज सप्लीमेंट की गोलियां खाने लगते हैं। ऐसे 'सेल्फ-मेडिकेशन' करने वालों को आप क्या चेतावनी देना चाहेंगे?
बिना ब्लड टेस्ट कराए खुद से कोई भी सप्लीमेंट या दवा लेना बेहद खतरनाक हो सकता है। विशेषकर विटामिन डी के मामलों में, ब्लड टेस्ट के जरिए शरीर में इसके मौजूदा स्तर को जानना सबसे जरूरी है। बिना जांच के इसकी हैवी डोज लेने से शरीर में गंभीर विपरीत लक्षण उभर सकते हैं, जो मरीज को किसी दिन 'सडन कार्डियक डेथ' (अचानक दिल की धड़कन रुकने से मृत्यु) जैसी जानलेवा स्थिति में धकेल सकते हैं। इसलिए, किसी भी संशय की स्थिति में लैब्स में जाकर रूटीन ब्लड टेस्ट (विटामिन डी और कैल्शियम प्रोफाइल) जरूर करवाएं। कभी भी सिर्फ किसी परिचित के कहने पर सप्लीमेंट्स शुरू न करें, पहले डेफिशिएंसी (कमी) की पुष्टि करें, फिर डॉक्टर की सलाह से इसका कोर्स तय करें।
डॉक्टरी परामर्श के बिना दवा लेने पर अक्सर लोग इसकी सही डोज (मात्रा) नहीं जान पाते। सामान्य तौर पर, एक वयस्क को प्रतिदिन केवल 600 से 800 IU (इंटरनेशनल यूनिट) विटामिन डी की आवश्यकता होती है। यदि शरीर में विटामिन डी की भारी कमी हो, तो डॉक्टर 60,000 IU की वीकली डोज (हफ्ते में एक बार) कुल 8 हफ्तों के लिए प्रिसक्राइब करते हैं, जिसके बाद टू-वीकली (हर 15 दिन में एक बार) मेंटेनेंस डोज दी जाती है। गंभीर कमी वाले कुछ विशेष मामलों में डॉक्टर शुरुआती 4 हफ्तों के लिए हफ्ते में दो बार भी दवा दे सकते हैं। मुख्य बात यह है कि विटामिन डी का स्तर शरीर में हमेशा संतुलित (ऑप्टिमल) रहना चाहिए ताकि न तो इसकी कमी हो और न ही टॉक्सिसिटी।
धूप और डाइट (जैसे दूध, मशरूम) से मिलने वाला विटामिन D और सप्लीमेंट वाली गोलियों में क्या फर्क है? क्या प्राकृतिक तरीकों से भी कभी ओवरडोज हो सकता है?
धूप, संतुलित डाइट, मशरूम और दूध जैसी प्राकृतिक चीजों से आमतौर पर हमारे शरीर को विटामिन डी की सामान्य और सुरक्षित मात्रा मिल जाती है। चूंकि हम बहुत ज्यादा देर तक तेज धूप में नहीं बैठ सकते और न ही अत्यधिक मात्रा में मशरूम या दूध का सेवन कर सकते हैं, इसलिए इन प्राकृतिक माध्यमों से शरीर में विटामिन डी की टॉक्सिसिटी (विषाक्तता) होना लगभग असंभव (Unlikely) है जब तक कि कोई किसी चीज का अस्वाभाविक रूप से अत्यधिक सेवन न करे।
यही कारण है कि प्राकृतिक स्रोतों से कभी टॉक्सिसिटी नहीं होती। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति आउटडोर स्पोर्ट्स खेलता है, जैसे लंबे समय तक टेनिस या फुटबॉल खेल रहा है, तो उसकी त्वचा (Skin) धूप की मदद से शरीर के लिए आवश्यक और अनुकूलतम (Optimal) मात्रा में खुद ही विटामिन डी का निर्माण कर लेती है। इसके बाद शरीर को अतिरिक्त मात्रा की जरूरत नहीं होती और वैसे भी हम धूप में एक सीमित समय से ज्यादा नहीं रुक सकते।
प्राकृतिक स्रोतों की तुलना में दवाओं या सप्लीमेंट्स से टॉक्सिसिटी होने की संभावना इसलिए ज्यादा होती है, क्योंकि जो गोलियां या सप्लीमेंट्स हम खाते हैं, वे शरीर पर तुरंत असर (Fast Act) करती हैं। वे सीधे हमारे सिस्टम में जाकर लिवर के जरिए मेटाबोलाइज होती हैं और सीधे ब्लडस्ट्रीम (रक्तप्रवाह) में मिल जाती हैं। यही वजह है कि बिना डॉक्टरी जांच और जरूरत के अत्यधिक सप्लीमेंट्स लेना शरीर को नुकसान पहुंचाता है, जबकि प्राकृतिक रूप से मिलने वाला विटामिन डी पूरी तरह सुरक्षित रहता है।