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Vladimir Lenin की मूर्ति पर बंगाल में हमला, जानिए लेनिन का भारत से कितना गहरा रहा है नाता

Vladimir Lenin Statue : पश्चिम बंगाल में विधानसभा 2026 के नतीजे सामने आने के बाद राज्य में हिंसक घटनाओं में इजाफा दर्ज किया जा रहा है। मुर्शिदाबाद के जियागंज में रूसी क्रांति के नायक लेनिन की प्रतिमा गिरा दी गई। आइए जानते हैं कि लेनिन का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय क्रांतिकारियों के बारे में क्या विचार था।

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May 08, 2026
पश्चिम बंगाल में लेनिन की मूर्ति तोड़ते युवक

Vladimir Lenin statue destroyed: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के 4 मई को नतीजे आने के बाद हिंसा भड़क उठी है। राज्य में 15 वर्षों से राज कर रही तृणमूल कांग्रेस पार्टी को नतीजों से काफी झटका लगा है। ममता बनर्जी समेत पार्टी के नेता और समर्थक गहरे सदमे में हैं। वहीं दूसरी ओर बीजेपी के नेता और उनके समर्थकों भारी बहुमत पाकर भारी उत्साह में हैं। शायद इसी उत्साह में आकर सत्ता पक्ष की पार्टी के समर्थकों ने मुर्शिदाबाद के जियागंज में रूसी क्रांति के महानायक ब्लादीमिर लेनिन (Vladimir Lenin Statue Vandalised in West Bengal) की मूर्ति तोड़ दी है। समर्थक यह भी कह रहे हैं कि भारत में लेनिन की मूर्ति का क्या काम? आइए जानते हैं कि लेनिन और रूस का भारत से कितना गहरा रिश्ता था।

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ब्रिटिश शासन भारतीय जनता को निचोड़ रहा है: लेनिन

लेनिन ने सबसे पहले भारत में 1899–1900 में आए भयावह अकाल के समय टिप्पणी की थी। क्या कहा ​था? उन्होंने भारत में भीषण अकाल के चलते मर रहे लोगों को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों को साम्राज्यवादी शोषण का परिणाम माना था। उन्होंने भारत की गरीबी, भूख और ब्रिटिश शासन की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत में अकाल प्राकृतिक कम और औपनिवेशिक लूट का परिणाम अधिक हैं। भारत की भूख और अकाल केवल मौसम की समस्या नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी शोषण की उपज हैं। आगे चलकर उन्होंने भारत के बारे में यह कहा था कि दुनिया में कहीं भी इतनी गरीबी और भूखमरी नहीं है जितनी भारत में है।

लेनिन ने बंगाल विभाजन को बताया था साजिश

Partition of Bengal : वर्ष 1905 में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन (Lord Curzon) ने बंगाल का विभाजन किया। विभाजन के पीछे कर्जन ने तर्क दिया कि यह प्रशासनिक सुविधा के लिए किया जा रहा है। हालांकि उस दौरान के साहित्य से यह पता चलता है कि यह बंटवारा व्यापक रूप से हिंदू-मुस्लिम की आबादी के बीच फूट डालने के उद्देश्य से की गई थी। इस विभाजन के बाद अंग्रेजी सरकार का विरोध तेज हो गया। ब्लादिमीर लेनिन ने इसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद की 'फूट डालो और राज करो' नीति का हिस्सा माना। लेनिन ने भारत में हो रहे आंदोलनों को इस बात का संकेत माना कि एशिया की जनता अब साम्राज्यवाद के खिलाफ जाग रही है। लेनिन ने विशेष रूप से इस बात को महत्वपूर्ण माना कि भारत में राष्ट्रीय आंदोलन केवल अभिजात वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनता में फैलने लगा। लेनिन ने ब्रिटिश शासन के बारे में लिखा कि अंग्रेज़ पूंजीपति भारत को लूटकर अपने उद्योग और साम्राज्य को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जनता के प्रतिरोध का बढ़ना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए खतरे का संकेत है।

बंबई कपड़ा मजदूरों की हड़ताल का लेनिन ने किया था समर्थन

Bombay Textile Strike of 1908 : तात्कालीन बंबई अब मुंबई में जुलाई 1908 में कपड़ा मिल के मजदूरों ने व्यापक हड़ताल किया था। इस हड़ताल में करीब 70 हजार मिल मजदूरों ने भाग लिया था। नतीजे के तौर पर कई दिनों तक मिलें बंद रहीं। इस हड़ताल भारत के श्रमिक आंदोलन और स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में दर्ज की गई।

ब्रिटिश सरकार ने बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 6 साल के कारावास की सजा सुनाई। अंग्रेज सरकार ने बाल गंगाधर तिलक को छह साल की सजा देकर बर्मा की माण्डले जेल भेज दिया था। इसके विरोध में मजदूरों ने हड़ताल किया था। लेनिन ने उसे औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जागृति का संकेत बताया। उन्होंने माना कि भारत के मजदूर और किसान भविष्य में साम्राज्यवाद के खिलाफ बड़ी ताकत बनेंगे। लेनिन ने लिखा था,'अंग्रेज गीदड़ों ने एक लोकतंत्रवादी को सजा देकर घृणित काम किया है।' 1911 में ब्रिटिश सरकार को भारी विरोध के कारण बंग-भंग रद्द करना पड़ा। इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की बड़ी जीत माना गया।

भारत में ब्रिटिश शासन की चंगेज खान से की तुलना

लेनिन ने 1908 में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एक लेख में लिखा, 'ब्रिटिश शासन भारत को 'निचोड़' रहा है और जनता को ऐसी हालत में पहुंचा दिया गया है जहां मामूली सूखा भी करोड़ों लोगों को भूख के कगार पर ला देता है।' लेनिन ने भारत में ब्रिटिश शासन को 'लूट और दमन' की व्यवस्था बताया। उन्होंने लिखा कि भारत में ब्रिटिश राज के कारण भारी गरीबी और अकाल की नौबत पैदा हुई है।

'जालियांवाला बाग नरसंहार औपनिवेशिक क्रूरता का नमूना'

सन 1919 में अंग्रेजों ने जलियांवाला में नरसंहार किया तब लेनिन ने इसे ब्रिटिश साम्राज्यवादी क्रूरता का उदाहरण कह इस बर्बरता की कड़ी निंदा की। उन्होंने यह कहा कि ब्रिटिश के उदारवादी नेता भारत पहुंचकर 'चंगेज खां' जैसे शासक बन जाते हैं।जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद लेनिन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की कठोर आलोचना की। उन्होंने इसे औपनिवेशिक क्रूरता का उदाहरण बताया।

लेनिन ने भारतीय क्रांतिकारियों को लिए दिया था यह संदेश

मई 1920 में लेनिन ने काबुल स्थित इंडियन रिवोल्यूशनरी एसोसिएशन (Indian Revolutionary Association) को एक संदेश भेजा था। यह भारत की आज़ादी के बारे उनका सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी मानी जाती है। उन्होंने कहा, 'मैं यह सुनकर प्रसन्न हूं कि आत्मनिर्णय और उत्पीड़ित राष्ट्रों की मुक्ति के सिद्धांतों को भारत के प्रगतिशील लोगों ने अपनाया है, जो स्वतंत्रता के लिए वीरतापूर्ण संघर्ष कर रहे हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि रूस के मजदूर भारत के मजदूरों और किसानों के जागरण को बड़ी रुचि से देख रहे हैं।' उन्होंने यह नारा भी दिया- 'स्वतंत्र एशिया अमर रहे!'(Long live a free Asia!)

लेनिन ने महात्मा गांधी को भारत में जन आंदोलन की प्रेरणा बताया

सन् 1920 में लेनिन ने महात्मा गांधी और स्वतंत्रता संग्राम के बारे में लिखा, 'गांधी भारत में जन आंदोलन के एक प्रेरक और नेता हैं। भारत को जल्द से जल्द ब्रिटिश सत्ता से आजादी मिले।' लेनिन ने भारत की आजादी के संग्राम से जुड़े कई प्रमुख क्रांतिकारियों से मुलाकात भी की थी। लेनिन से मुलाकात के लिए वर्ष 1919-20 में राजा महेंद्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्ला भोपाली, मनवेंद्रनाथ राय व अन्य भारतीय क्रांतिकारियों से मास्को पहुंचे थे। लेनिन ने इन क्रांतिकारियों से मुलाकात के दौरान भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अपना समर्थन दिया। इन्हीं लोगों ने 1915 में काबुल में भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई थी। लेनिन ने मनवेंद्रनाथ राय (एम. एन. रॉय) को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में शामिल किया। मनवेंद्रनाथ राय ने आगे चलकर रूस के ताशकंद में भारत की पहली कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी।

भगत सिंह अपनी फांसी के दिन पढ़ रहे थे लेनिन की आत्मकथा

भारत की आज़ादी के अनेक महानायक लेनिन और रूस की क्रांति से प्रभावित थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, शहीदे आजम भगत सिंह, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, बाल गंगाधर तिलक, महाप्राण निराला, कथा सम्राट प्रेमचंद आदि ऐसे लोग थे जो लेनिन के विचारों से प्रभावित थे। रवींद्रनाथ को एक शिक्षा अधिवेशन में लेनिन ने मास्को बुलाया था। वे वहां गए और लौटकर 'रुसिया चिट्ठी' नाम से एक किताब भी लिखी थी।

भगत सिंह तो अपनी फांसी 23 मार्च 1931 के दिन जेल में लेनिन की आत्मकथा पढ़ रहे थे। उनसे जब जेल के संतरी ने फांसी घर के लिए चलने के लिए कहा तो भगत सिंह ने कहा था- 'रुकिए अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है…।' यह कहकर भगत सिंह ने किताब हवा में उछाल दी और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।

मास्को में गांधी, टैगोर,नेहरू और इंदिरा की मूर्तियां

रूस की राजधानी मास्को में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित पंडित नेहरू,गुरुदेव टैगोर और इंदिरा गांधी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। गांधी जी की मूर्ति मास्को में इंदिरा गांधी स्क्वायर पर लगी है। गांधी जी की प्रतिमा के बगल में ही इंदिरा गांधी की भी मूर्ति लगाई गई है। रवींद्रनाथ टैगोर और पंडित नेहरू की मूर्तियां रूस के फ्रेंडशिप पार्क में लगी हैं।

'बंगाल में मूर्तियां नहीं गिराई जातीं तो मुझे आश्चर्य होता'

राजनीतिक इतिहासकार प्रो. शम्शुल इस्लाम ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'पश्चिम बंगाल में आरएसएस और बीजेपी से जुड़े हुए लोग जो कर रहे हैं, उसे देखकर मुझे जरा सा भी आश्चर्य नहीं हो रहा है। अगर वह ऐसा नहीं कर रहे होते तो मुझे जरूर आश्चर्य होता। त्रिपुरा में सीपीएम की सरकार जब हारी थी, तब वहां लेनिन, रवींद्रनाथ, सुकांत भट्टाचार्य, भगत सिंह, मैक्सिम गोर्की और कार्ल मार्क्स की मूर्तियां क्रेन्स लाकर गिराई गई थीं। यह सब अब बंगाल में हो रहा है। बंगाल में धोखे से चुनाव जीतने के बाद दक्षिणपंथी ताकतें गुंडागर्दी मचा रही हैं। इन बातों से तो यह साफ है कि आप चुनाव, लोकतंत्र आदि बातों में कोई यकीन नहीं रखते हैं।'

उन्होंने कहा कि लेनिन एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन खुलकर किया था। उस समय यूरोप के किसी भी देश के प्रमुख ने भारत में चल रहे आजादी आंदोलन को समर्थन नहीं दिया था।

'गोलवरकर के तीन में एक दुश्मन कम्युनिस्ट थे'

ये लोग लेनिन की मूर्तियां क्यों गिरा रहे हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि माधव सदाशिवराव गोलवरकर ने अपने तीन दुश्मन गिनाए थे- 1. मुसलमान, 2. ईसाई और 3. कम्युनिस्ट। मुसलमान और ईसाइयों के साथ तो वह पहले से ही अपनी दुश्मनी निभा रहे थे। अब वह कम्युनिस्टों के खिलाफ भी खुलकर दुश्मनी निकालने में जुट गए हैं। उन्होंने बंगाल में वामपंथ की सरकार को नहीं हराया है। उन्होंने उस औरत को हराया है, जो उनसे यह बहस करती थी कि मैं तुमसे बड़ी हिंदू हूं। ममता बनर्जी अपने भाषणों में कहा करती थी कि मैं काली और दूर्गा की पूजा करती हूं।

'जय श्रीराम भी इनके बारे में क्या सोचते होंगे?'

उन्होंने कहा कि यह सबकुछ जय श्रीराम का नारा लगाकर किया जा रहा है। यह देश टूटने की कगार पर पहुंच गया है क्योंकि यहां जय श्रीराम का नारा डराने और धमकाने के लिए लगाए जा रहे हैं। बाबरी मस्जिद गिराया गया। लोगों को लिंचिंग करके मारा जा रहा है। आप गाय के नाम पर कत्ल कर रहे हैं। आप बस्तियों में जय श्रीराम का नारा लगाते हुए आग लगा रहे हैं। बंगाल का एक वीडियो अभी कुछ दिनों पहले सामने आया था, जिसमें स्कूल की बस में एक लफंगा घुसकर बच्चों से जबरदस्ती जय श्रीराम का नारा लगवा रहा था। भगवान श्रीराम भी इनके बारे में क्या सोचते होंगे?

आज ही मैंने एक वीडियो देखा, जिसमें यह दिख रहा है कि हिंदूत्ववादी लड़के एक बड़े म्यूजियम में घुसकर हंगामा कर रहे हैं। इस म्यूजियम में बंगाल पुर्नजागरण से जुड़े हिंदू सुधारकों से जुड़ी चीजें संगृहित की गई हैं। उनके तस्वीरों पर ये जय श्रीराम के नारे लगाकर तिलक लगा रहे हैं। आरएसएस के समर्थकों ने भारत और उसकी विविधताओं से भरी संस्कृति को मिटाने की दिशा में एक कदम बढ़ाना है। यह देश के लिए बहुत ही खराब समय है। वह लेनिन तो छोड़िए किसी को नहीं बख्श रहे हैं।

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