Mamata Banerjee TMC Lost: ममता बनर्जी ने 2011 के विधानसभा चुनाव में वामपंथी सरकार को सत्ता से बेदखल किया था। राज्य की मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता ने वामपंथी सरकार के 34 वर्षों के शासन की ऑडिटिंग कराई थी। उन्हें एक भी घपला और घोटाला नहीं मिला। राज्य में ममता की जमीन खिसकती रही, लेकिन क्या ममता ने अपनी राजनीति, रणनीति की ऑडिटिंग कराई? पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Mamata Banerjee Lost Election: पश्चिम बंगाल में तृणमूल को विधानसभा की 294 सीटों में से सिर्फ 81 ही सीटों पर जीत मिली। ममता बनर्जी भी भवानीपुर सीट से 15 हजार से ज्यादा के मतों के अंतर से हार गईं। पश्चिम बंगाल में 34 वर्ष वामपंथी सरकार को ममता बनर्जी ने वर्ष 2011 में कांग्रेस के साथ मिलकर उखाड़ फेंका था। वर्ष 2026 के चुनाव में बीजेपी ने ममता सरकार को उखाड़ फेंका। बंगाल में वामपंथ सरकार के समय महिलाओं की सुरक्षा और नेताओं के स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले नहीं सुने गए। ममता बनर्जी जब पहली बार सीएम बनीं तब उन्होंने वामपंथ सरकार के 34 वर्ष के शासनकाल की ऑडिटिंग करवाई थी, उनके हाथ एक भी मामला नहीं आया। वहीं ममता के शासन में उनकी सरकार के कई मंत्रियों और नेताओं के नाम भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त पाए गए।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने खुद को 'मां, माटी और मानुष' की पार्टी के रूप में स्थापित किया और लगातार कई चुनावों में सफलता हासिल की। हालांकि, समय-समय पर हुए कुछ चुनावों विशेषकर लोकसभा, पंचायत या नगर निकाय स्तर पर हुए इलेक्शन में टीएमसी को झटके भी लगे हैं, लेकिन टीएमसी सत्ता के मद में चूर रही और कभी भी अपनी हार की ऑडिटिंग ढंग से नहीं कराई। आइए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरे देश की नजर थी, उसमें तृणमूल के हार की वजहों को समझने की कोशिश करते हैं।
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के साथ मिलकर वर्ष 2011 में विधानसभा चुनावी जंग में भाग लिया। विधानसभा की कुल 294 सीटों पर चुनाव लड़ा और 227 सीटें अपनी झोली में करने में सफलता हासिल की। इस चुनाव में गठबंधन का वोट शेयर लगभग 39% था। वर्ष 2006 विधानसभा चुनाव में 294 में वाम मोर्चा को 235 सीटें मिली। माकपा को अकेले 176, सीपीआई को 23, फॉरवर्ड ब्लॉक को 21 और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को 20 सीटें मिली थीं। यह वाम मोर्चा की पश्चिम बंगाल राज्य में लगातार 7वीं जीत थी, लेकिन 2011 में वामपंथी दल सिर्फ 62 सीटों पर ही सिमट गई। दरअसल, ममता बनर्जी ने सिंगूर और नंदीग्राम में टाटा मोटर्स के नैनो कार की फैक्ट्री लगाने के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया और वामपंथी पार्टियों की मजदूरों और सर्वहारा की राजनीति का पर्दाफाश कर दिया। नतीजा यह हुआ कि वामपंथी पार्टी के हाथ से सत्ता छिटक गई।
तृणमूल कांग्रेस ने 2011 का चुनाव जीतने के बाद राज्य के विकास के लिए कई काम किए। उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता पश्चिम बंगाल में बढ़ती चली गई। इसका नतीजा यह हुआ तृणमूल ने वर्ष 2016 में अकेले चुनाव लड़ा और 211 सीटें जीतीं। पार्टी के वोट शेयर में 5.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुआ। इस बार पार्टी की झोली में लगभग 44.9% वोट गिरे। यह पार्टी की राज्य में मजबूत पकड़ को दर्शाता है। तृणमूल ने अगले विधानसभा चुनाव यानी 2021 में 213 सीटें जीतीं। इस बार वोट प्रतिशत पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले 3 फीसदी यानी 47.9% का इजाफा हुआ। हालांकि, राज्य में विपक्षी पार्टी बीजेपी भी अपना जनाधार मजबूत करने में पूरे जोरशोर से लगी रही और 2016 में उसे जहां सिर्फ 10% वोट मिला था, वह 2021 में बढ़कर 38% तक पहुंच गया।
तृणमूल कांग्रेस ने वर्ष 2011 में विधानसभा का चुनाव जीतकर राज्य में सरकार बनाने के बाद वर्ष 2014 में पहला लोकसभा चुनाव अकेल ही लड़ा और मोदी लहर में भी कुल 42 सीटों में से 34 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की। ममता बनर्जी की पार्टी ने इस चुनाव में 39 फीसदी वोट हासिल किए। हालांकि, अगले लोकसभा चुनाव 2019 में तृणमूल को तगड़ा झटका लगा। इस बार वोट शेयर में 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, लेकिन 2014 के मुकाबले 2019 में सीटें काफी कम रह गई। इस बार वह मोदी लहर के आगे टिक नहीं पाईं। तृणमूल कांग्रेस के सांसद 34 से कम होकर सिर्फ 22 रह गए। बीजेपी ने 40 फीसदी वोट शेयर के साथ 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। बीजेपी ने 2014 में सिर्फ दो लोकसभा सीट जीतने में कामयाबी पाई थी। तृणमूल कांग्रेस की छवि कमजोर होती चली गई। इसके अलावा 2018 और 2023 में पंचायत चुनावों में तृणमूल ने बाजी मारी लेकिन इसमें हुई चुनावी हिंसा को लेकर बीजेपी ने ममता की पार्टी पर हिंसा और गुंडागर्दी के आरोप लगाए। चुनावी हिंसा की खबरों ने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की छवि को प्रभावित किया।
किसी भी नए राजनीतिक दल के लिए सत्ता की सीढ़ी चढ़ना जितना कठिन है, उससे कहीं ज्यादा खुद को सत्ता में बनाए रखना है। दरअसल, सत्ता में बैठी पार्टी को बदलते हुए वक्त और जनता की अपेक्षाओं को समझना और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना बहुत मुश्किल काम होता है। तृणमूल की नेता ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार द्वारा सिंगूर में टाटा को दी गई हजारों एकड़ खेती की जमीन को मुद्दा बनाया और राज्य के साथ पूरे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाबी हासिल की। ममता ने 'मां, माटी और मानुष' का नया नारा गढ़ा और टाटा मोटर्स को बंगाल से खदेड़कर दम लिया। लेकिन जनता वोट देती है तो उन्हें रोजी चाहिए, रोटी चाहिए, कपड़ा चाहिए और खुद की सुरक्षा का भरोसा चाहिए। ममता ने अपने शुरुआती वर्षों में विकास, कल्याणकारी योजनाओं और करिश्माई नेतृत्व के दम पर जनता का विश्वास जीता, लेकिन समय के साथ कई ऐसी परिस्थितियां बनीं, जिन्होंने पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित किया।
लोकतंत्र की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियों के अंदर लोकतंत्र की कमी देखी जाती है। इस मामले में टीएमसी फिट नजर आती है। टीएमसी में ममता का पूरा दबदबा बना हुआ था। एक व्यक्ति के दबदबे वाली पार्टी में संभावनाओं से भरे दूसरे लोगों का दम घुटने लगता है। असम में कांग्रेस से बाहर आए हिमंता बिस्वा शर्मा ने बीजेपी ज्वाइन किया। हिमंता ने राज्य में कांग्रेस पार्टी की कब्र खोद दी। ऐसा पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला। तृणमूल पार्टी के कई बड़े नेता समय-समय पर बीजेपी में शामिल होते चले गए। इसके सबसे बड़े उदाहरण रहे- मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी। दोनों राज्य में बीजेपी के बड़े चेहरे के तौर पर उभरकर आए। इस बात की पूरी संभावना है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के बतौर शुभेंदु अधिकारी का नाम ही सामने आए।