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Emotional Shopping: Wardrobe तो फुल हो गया, पर मन खाली ही रह गया, समझिए इमोशनल शॉपिंग का मनोविज्ञान

What is emotional Buying: क्या आप भी तनाव या उदासी में शॉपिंग करने निकल पड़ते हैं? कहीं यह 'रिटेल थेरेपी' किसी बड़ी मानसिक समस्या का संकेत तो नहीं? वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. लोवेश सैनी से इस बारे में विस्तार से समझिए।

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May 02, 2026

Emotional Shopping : 'रिटेल थेरेपी' (Retail therapy) अब सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। अक्सर हम मजाक-मजाक में एक-दूसरे को शॉपिंग करने की सलाह देते हुए इसे बोल देते हैं। हम जब भी उदास होते हैं, तनाव में होते हैं या बोरियत महसूस करते हैं, तो अक्सर हमारा हाथ अपने फोन की ओर जाता है और कुछ ही मिनटों में ई-कॉमर्स (E-commerce) ऐप्स पर स्क्रॉल करने लगते हैं। इसे ही मनोवैज्ञानिक 'इमोशनल शॉपिंग' या 'कंपल्सिव बाइंग' (Compulsive buying) कहते हैं।

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What is Emotional Shopping: क्या है इमोशनल शॉपिंग?

इमोशनल शॉपिंग का अर्थ अपनी जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को प्रबंधित करने के लिए खरीदारी करना है। जब व्यक्ति खुशी, दुख, क्रोध, अकेलापन या अत्यधिक तनाव महसूस करता है, तो वह इन भावनाओं से बचने या इन्हें दबाने के लिए सामान खरीदने लगता है।

Reason behind Psychological Approach : मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, जब हम कोई नई चीज़ खरीदते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में 'डोपामाइन' (Dopamine) हॉर्मोन रिलीज होता है। इसे 'फील-गुड' हॉर्मोन (Feel Good Hormon) भी कहा जाता है। यह हमें तत्काल खुशी और नियंत्रणका अहसास कराता है, लेकिन समस्या यह है कि यह खुशी बहुत कम समय के लिए होती है।

इमोशनल शॉपिंग के मुख्य ट्रिगर्स

लोग अक्सर निम्नलिखित स्थितियों में भावनात्मक रूप से खरीदारी करते हैं:

  • तनाव और चिंता: ऑफिस का काम या निजी जीवन का तनाव व्यक्ति को खरीदारी की ओर धकेलता है ताकि वह कुछ समय के लिए दुनिया को भूल सके।
  • अकेलापन: खालीपन को भरने के लिए लोग अक्सर ऑनलाइन शॉपिंग का सहारा लेते हैं।
  • बोरियत: जब करने को कुछ नहीं होता, तो ब्राउजिंग करना एक मनोरंजन बन जाता है।
  • सोशल मीडिया का दबाव (FOMO): दूसरों की लाइफस्टाइल देखकर 'छूट जाने का डर' (Fear of Missing Out) हमें वह चीजें खरीदने पर मजबूर करता है जिनकी हमें जरूरत नहीं है।

डिजिटलाइजेशन ( Digitalisation) और आसान खरीदारी

डिजिटल क्रांति ने इमोशनल शॉपिंग को और अधिक आसान और घातक बना दिया है। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं:

  • वन-क्लिक चेकआउट : अब भुगतान करना इतना आसान है कि सोचने का समय ही नहीं मिलता।
  • टारगेटेड विज्ञापन: आप जो सोचते या सर्च करते हैं, वही विज्ञापन आपके सोशल मीडिया फीड पर दिखने लगते हैं।
  • आधी रात की सेल: अक्सर लोग रात के समय ज्यादा भावुक और अकेले होते हैं, और ई-कॉमर्स कंपनियां इसी समय 'फ्लैश सेल' का सहारा लेती हैं।

कैसे पहचानें कि आप इमोशनल शॉपर हैं?

अगर आप नीचे दिए गए व्यवहारों को खुद में देखते हैं, तो आप इस स्थिति का शिकार हो सकते हैं:

  • तनाव होने पर सबसे पहले शॉपिंग ऐप खोलना।
  • सामान खरीदने के तुरंत बाद पछतावा (Buyer's Remorse) होना।
  • ऐसी चीजें खरीदना जिनका आप कभी इस्तेमाल नहीं करते।
  • बजट से बाहर जाकर खर्च करना और क्रेडिट कार्ड का कर्ज बढ़ना।
  • खरीदारी की बात को परिवार या दोस्तों से छुपाना।

पत्रिका की खास बातचीत डॉ. लोवेश सैनी के साथ

'इमोशनल शॉपिंग' क्या है और यह हमारी सामान्य खरीदारी से किस प्रकार अलग है?
इस सवाल के जवाब में उन्होने बताया , सामान्य खरीदारी वह है जो हम किसी ज़रूरत या योजना के तहत करते हैं। इसके विपरीत, इमोशनल शॉपिंग भावनाओं के आवेग (Shopping in Impulsion) में आकर की जाती है। जब हमारी जरूरत नहीं, बल्कि मूड यह तय करने लगे कि हमें खरीदना क्या है, तो उसे इमोशनल शॉपिंग कहते हैं। इसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं को शांत करने के लिए खरीदारी का सहारा लेता है।

कौन सी भावनाएं (जैसे तनाव, अकेलापन या बोरियत) हैं, जो किसी व्यक्ति को खरीदारी के लिए सबसे ज्यादा उकसाती हैं?

उन्होने बताया , इमोशनल शॉपिंग के पीछे मुख्य रूप से तनाव (Stress), अकेलापन (Loneliness) और बोरियत (Boredom) जैसी भावनाएं होती हैं। जब हम तनाव में होते हैं, तो खरीदारी से मिलने वाला 'डोपामाइन' हमें तात्कालिक राहत देता है। अकेलापन महसूस होने पर व्यक्ति वस्तुओं के जरिए उस खालीपन को भरने की कोशिश करता है, जबकि बोरियत होने पर शॉपिंग एक 'मनोरंजन' या 'उत्साह' का जरिया बन जाता है। इसके अलावा, उदासी, क्रोध या कम आत्मविश्वास भी इसके ट्रिगर्स हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से कहें तो, व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खोने पर खरीदारी के जरिए अपने जीवन में 'कंट्रोल' वापस पाने का भ्रम पाल लेता है।

कौन सा हार्मोन है, जो हमें खरीदारी के लिए उकसाता है? क्या यह लत (Addiction) बन सकती है?

उन्होने बताया, इसके पीछे मुख्य रूप से 'डोपामाइन' (Dopamine) हार्मोन काम करता है। हम जब कुछ नया खरीदते हैं, तो मस्तिष्क में डोपामाइन रिलीज होता है, जिससे हमें तुरंत खुशी और 'रिवॉर्ड' का अहसास होता है। तनाव, अकेलापन या बोरियत महसूस होने पर लोग इसी खुशी को पाने के लिए शॉपिंग करते हैं। बार-बार ऐसा करने से यह एक 'लत' की तरह बन जाता है।

एक व्यक्ति को कब समझ लेना चाहिए कि यह आदत अब एक मानसिक समस्या बन गई है?

उन्होने बताया, इसके कुछ स्पष्ट संकेत हैं:

  • बिना ज़रूरत के लगातार चीजें खरीदना।
  • खरीदारी के बारे में अपनों से झूठ बोलना या खर्च छुपाना।
  • आमदनी से ज्यादा खर्च करना और कर्ज में डूब जाना।
  • खरीदारी के बाद भारी पछतावा या ग्लानि (Guilt) महसूस करना।

क्या इमोशनल शॉपिंग एंग्जायटी या डिप्रेशन का शुरुआती लक्षण हो सकता है?

उन्होने बताया, कोई व्यक्ति जब अपने आवेग पर नियंत्रण नहीं रख पाता, तो यह अक्सर चिंता (एंग्जायटी) या अवसाद (डिप्रेशन) का शुरुआती संकेत होता है। व्यक्ति अपने मानसिक दर्द को दबाने के लिए शॉपिंग का इस्तेमाल एक 'कोपिंग मैकेनिज्म' (coping mechanism) के रूप में करने लगता है।

क्या '24 या 48 घंटे रुकने' की तकनीक (Wait Rule) वास्तव में काम करती है?

उन्होने बताया, यह बहुत प्रभावी है। शॉपिंग का आवेग एक समुद्र की लहर की तरह होता है, वह उठता है और फिर शांत हो जाता है। अगर हम उस आवेग के समय खुद को थोड़ा 'डिले' (Delay) कर दें या दिमाग को कहीं और डाइवर्ट कर दें, तो सोचने-समझने की शक्ति वापस आ जाती है और हम गलत निर्णय लेने से बच जाते हैं।

सोशल मीडिया और 'सेल' (FOMO) हमारी निर्णय लेने की क्षमता को कैसे प्रभावित करते हैं?

उन्होने बताया, सोशल मीडिया पर 'टारगेटेड विज्ञापन' और 'लिमिटेड पीरियड ऑफर' हमें FOMO (Fear of Missing Out) यानी कुछ छूट जाने का डर पैदा करते हैं। इससे व्यक्ति के मन में घबराहट होती है कि अगर अभी नहीं खरीदा तो मौका हाथ से निकल जाएगा। यह डर हमारी तार्किक सोच को भी खत्म कर देता है।

अगर कोई व्यक्ति तनाव में खरीदारी की ओर भागता है, तो उसके पास इसके अन्य स्वस्थ विकल्प क्या हो सकते हैं?

उन्होने बताया, तनाव में खरीदारी के विकल्प के रूप में व्यक्ति को स्वस्थ कोपिंग मैकेनिज्म ( Healthy coping mechanism) अपनाने चाहिए। सबसे प्रभावी तरीका है शारीरिक गतिविधि, जैसे टहलना, योग या एक्सरसाइज करना, जिससे प्राकृतिक रूप से 'एंडोर्फिन' रिलीज होता है। माइंडफुलनेस और मेडिटेशन (meditation) मन को शांत करने और आवेग पर नियंत्रण पाने में मदद करते हैं। अपनी भावनाओं को डायरी में लिखना (Journaling) या किसी विश्वसनीय मित्र से बात करना मन का बोझ हल्का करता है। इसके अलावा, रचनात्मक कार्यों जैसे पेंटिंग, संगीत या कुकिंग में मन लगाना बेहतर विकल्प है। ये तरीके न केवल तनाव कम करते हैं, बल्कि आर्थिक नुकसान और बाद में होने वाले पछतावे से भी बचाते हैं।

किस स्तर पर डॉक्टर या काउंसलर की मदद लेनी चाहिए?

उन्होने बताया, जब चीजें आपके नियंत्रण से बाहर हो जाएं, कर्ज बढ़ने लगे और आपके रिश्तों (जैसे पति-पत्नी या माता-पिता के साथ) में तनाव आने लगे, तो प्रोफेशनल मदद लेनी चाहिए।

डॉक्टर्स इस समस्या का इलाज कैसे करते हैं?

उन्होने बताया, इसमें दो तरह के उपचार होते हैं:

  • थैरेपी: जैसे 'साइकोथैरेपी' के सेशन्स (45-50 मिनट), जो साप्ताहिक या पाक्षिक हो सकते हैं।
  • दवाइयां: यदि समस्या गंभीर है या आवेग बहुत ज्यादा है, तो हम लक्षणों के अनुसार एंटी-एंग्जायटी, एंटी-डिप्रेसेंट या 'मूड स्टेबलाइजर्स' (Mood Stabilizers) देते हैं।
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