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Chemo Technique : कैंसर से जंग में नई उम्मीद; क्या हैं HIPEC और PIPAC? जानें क्या होता है हॉट कीमो और कीमो स्प्रे

Chemo Techniques: क्या पेट का एडवांस कैंसर सच में लाइलाज है? जानें HIPEC और PIPAC जैसी आधुनिक मेडिकल तकनीकों के बारे में, जो बगैर किसी साइड-इफेक्ट्स के जीवनदान दे रही है।

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Jun 16, 2026
HIPEC PIPAC Laparoscope Liquid solution Chemotheraphy
कैंसर का एडवांस ट्रीटमेंट! ( Photo: AI Generated)

Chemo Technique: कैंसर जब शरीर के किसी एक हिस्से से निकलकर पेट की अंदरूनी झिल्ली (Peritoneum) तक फैल जाता है, तो इसे मेडिकल भाषा में पेरिटोनियल कार्सिनोमैटोसिस कहा जाता है। ओवेरियन कैंसर, कोलन कैंसर, अपेंडिक्स और पेट (Stomach) के कैंसर के एडवांस स्टेज में अक्सर ऐसा देखा जाता है।

कुछ समय पहले तक इस स्थिति को लाइलाज या आखिरी स्टेज मान लिया जाता था, क्योंकि नसों के जरिए दी जाने वाली पारंपरिक कीमोथेरेपी (IV Chemotherapy) पेट की इस झिल्ली तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती। लेकिन मेडिकल साइंस ने अब इस चुनौती का तोड़ निकाल लिया है। आज HIPEC और PIPAC जैसी आधुनिक लोकल कीमोथेरेपी तकनीकें एडवांस स्टेज के मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. निखिल मेहता से विस्तार से समझते हैं कि ये दोनों एडवांस प्रोसीजर्स क्या हैं, कैसे काम करते हैं और मरीज के लिए कौन सा बेहतर है।

HIPEC: क्या है 'हॉट कीमोथेरेपी' और यह कैसे काम करती है?

HIPEC का पूरा नाम Hyperthermic Intraperitoneal Chemotherapy है। इसे आम भाषा में 'हॉट कीमो' भी कहा जाता है। यह तकनीक उन मरीजों के लिए है जिनका कैंसर सर्जरी के जरिए निकाला जा सकता है। इसका काम करने का तरीका दो चरणों में पूरा होता है।

  • साइटोरेडक्टिव सर्जरी (CRS): सबसे पहले सर्जन एक बड़ा ऑपरेशन करके पेट के अंदर दिख रहे सभी बड़े ट्यूमर और प्रभावित अंगों को काटकर बाहर निकाल देते हैं।
  • गर्म कीमो का सर्कुलेशन: इसके तुरंत बाद जब मरीज ऑपरेशन थिएटर में ही होता है, तब एक विशेष मशीन के जरिए कीमोथेरेपी के लिक्विड सॉल्यूशन को गर्म किया जाता है। इस गर्म लिक्विड को पेट के अंदर लगभग 60 से 90 मिनट तक घुमाया जाता है।
  • तापमान (Heat) का फायदा: गर्म तापमान के कारण कैंसर कोशिकाएं (Cells) कमजोर हो जाती हैं। गर्मी की वजह से पेट के टिश्यूज कीमोथेरेपी की दवा को ज्यादा गहराई और बेहतर तरीके से सोख पाते हैं, जिससे छिपे हुए माइक्रोस्कोपिक कैंसर सेल्स भी नष्ट हो जाते हैं।

PIPAC: क्या है 'कीमो स्प्रे' तकनीक?

PIPAC का पूरा नाम Pressurized Intraperitoneal Aerosol Chemotherapyहै। यह एक बेहद आधुनिक और कम चीर-फाड़ वाली (Minimally Invasive) तकनीक है। यह उन मरीजों के लिए रामबाण है जिनका कैंसर बहुत ज्यादा फैल चुका है और जिनकी बड़ी सर्जरी नहीं की जा सकती।

  • काम करने का तरीका (Procedure): इसमें कोई बड़ा चीरा नहीं लगाया जाता। डॉक्टर पेट में छोटे-छोटे छेद करके दूरबीन (Laparoscope) अंदर डालते हैं। इसके बाद एक खास माइक्रो-पंप के जरिए कीमोथेरेपी की दवा को "गैस के गुबार या धुंध" (Aerosol/Mist) के रूप में पेट के अंदर प्रेशर के साथ छिड़का (Spray) जाता है।
  • दबाव (Pressure) का फायदा: जैसे हम बंद कमरे में परफ्यूम स्प्रे करते हैं और वह हर कोने में फैल जाता है, वैसे ही यह कीमो स्प्रे पेट के हर हिस्से में समान रूप से पहुंच जाता है। प्रेशर के कारण दवा ट्यूमर के अंदर गहराई तक समा जाती है। इसमें दवा की मात्रा बहुत कम लगती है, इसलिए मरीज को पारंपरिक कीमोथेरेपी की तरह बाल झड़ना या भयंकर कमजोरी जैसे साइड इफेक्ट्स नहीं झेलने पड़ते।

डॉ. निखिल मेहता के साथ पत्रिका की खास बातचीत

जब कैंसर पेट की झिल्ली (Peritoneum) तक फैल जाता है, तो उसे पारंपरिक IV कीमोथेरेपी से ठीक करना मुश्किल क्यों होता है? वहां तक दवा क्यों नहीं पहुंच पाती?

हाइपैक (HIPEC) कैंसर चिकित्सा की एक आधुनिक तकनीक है, जो मुख्य रूप से पेट की अंदरूनी परत यानी पेरिटोनियल कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाती है। यह तकनीक ओवेरियन (अंडाशय), कोलन (आंत), अपेंडिक्स, प्राइमरी मेसोथेलियोमा और स्यूडोमिक्सोमा पेरिटोनाइ जैसे जटिल कैंसर में बेहद प्रभावी है। इस पूरी प्रक्रिया को ( CRS + HIPEC) यानी साइटोरिडक्टिव सर्जरी विद हाइपैक कहा जाता है। इसमें इलाज दो चरणों में पूरा होता है।

  • सर्जरी (CRS): सबसे पहले सर्जन पेट के अंदर फैले मुख्य ट्यूमर और कैंसर ग्रस्त हिस्से को ऑपरेशन करके निकाल देते हैं।
  • हाइपैक (HIPEC): इसके तुरंत बाद, ऑपरेशन थिएटर में ही कीमोथेरेपी दवाओं को 42°C से 43°C तापमान पर गर्म किया जाता है। इस गर्म लिक्विड से पेट के अंदरूनी हिस्से की अच्छी तरह सफाई की जाती है, जिससे छिपी हुई सूक्ष्म कैंसर कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं।
  • सबसे बड़ा फायदा: इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यदि ऊपर बताए गए कैंसर चौथी स्टेज (Stage 4) में भी पहुंच चुके हों, तो इस तकनीक से सफल इलाज संभव है। यह एडवांस स्टेज के मरीजों की उम्र और जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने में मददगार है।

HIPEC और PIPAC ने पेरिटोनियल कैंसर के इलाज के नजरिए को कैसे बदला है? क्या हम इसे एक 'गेम-चेंजर' तकनीक कह सकते हैं?

हाइपैक (HIPEC) तकनीक को कैंसर इलाज के लिए एक बड़ा 'गेम चेंजर' माना जा सकता है। आमतौर पर दी जाने वाली पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में यह तकनीक मरीजों के लिए कहीं अधिक प्रभावी और फायदेमंद साबित हो रही है। इस आधुनिक विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सीधे तौर पर कैंसर कोशिकाओं (Cells) को लक्षित करके उन पर सटीक हमला करती है। जहां सामान्य कीमोथेरेपी एडवांस स्टेज के कैंसर में एक सीमा के बाद बेअसर होने लगती है, वहीं हाइपैक तकनीक मरीजों को 15 से 20 प्रतिशत तक अतिरिक्त सर्वाइवल बेनिफिट (जीवन प्रत्याशा लाभ) देती है। यह तकनीक कैंसर से पीड़ित मरीजों को न सिर्फ जीवन जीने की नई उम्मीद देती है, बल्कि उनकी उम्र को भी उन सालों तक बढ़ा सकती है जो सामान्य कीमोथेरेपी से संभव नहीं है। एडवांस स्टेज के पेरिटोनियल कैंसर से लड़ रहे मरीजों के लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है।

भारत में आमतौर पर मरीजों को इन एडवांस तकनीकों के बारे में बहुत देरी से पता चलता है। आपके पास आने वाले कितने प्रतिशत मरीज सही समय पर पहुंच पाते हैं?

कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में हाइपैक (HIPEC) और पाइपैक (PIPAC) तकनीकें एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई हैं। भारत में ज्यादातर ओवेरियन कैंसर (अंडाशय का कैंसर) और पेट की झिल्ली (पेरिटोनियल कैंसर) के मरीज डॉक्टरों के पास तीसरी या चौथी स्टेज (Stage 3 or 4) में ही पहुंच पाते हैं। ऐसी गंभीर और एडवांस स्थिति में ये दोनों आधुनिक पद्धतियां मरीजों के लिए बहुत अधिक कामयाब और जीवन रक्षक साबित हो रही हैं। इतनी कारगर होने के बावजूद आज भी देश में इन तकनीकों का लाभ हर जरूरतमंद मरीज तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिसके दो मुख्य कारण हैं।

  • जागरूकता की भारी कमी: आम जनता और मरीजों को इस आधुनिक इलाज पद्धति के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है।
  • विशेषज्ञ सर्जन का अभाव: भारत में इस जटिल तकनीक को सफलतापूर्वक अंजाम देने वाले कैंसर सर्जन (Onco-Surgeons) की संख्या बेहद सीमित है। चूंकि इसके लिए एक विशेष ट्रेनिंग और सुपर-स्पेशलिटी की आवश्यकता होती है, इसलिए यह तकनीक हर अस्पताल या छोटे शहरों में उपलब्ध नहीं है।

अक्सर लोग सोचते हैं कि PIPAC से कैंसर जड़ से खत्म हो सकता है। क्या आप स्पष्ट कर सकते हैं कि PIPAC का मुख्य उद्देश्य 'क्यूरेटिव' (पूरी तरह ठीक करना) है या 'पैलिएटिव' (लाइफ क्वालिटी सुधारना और समय बढ़ाना)?

पाइपैक (PIPAC) का मुख्य और प्राथमिक उद्देश्य 'पैलिएटिव' (Palliative यानी कैंसर के लक्षणों को नियंत्रित करना, जीवन की गुणवत्ता सुधारना और मरीज की उम्र बढ़ाना) होता है, न कि 'क्यूरेटिव' (Curative यानी कैंसर को जड़ से खत्म करना)।

पाइपैक तकनीक का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कैंसर पेट की झिल्ली (Peritoneum) में बहुत ज्यादा फैल चुका होता है और ऐसा चौथी स्टेज (Stage 4) पर होता है। ऐसी स्थिति में कैंसर को सर्जरी के जरिए शरीर से पूरी तरह बाहर निकालना संभव नहीं होता। इसका मुख्य काम ट्यूमर के बढ़ने की रफ्तार को धीमा करना, पेट में पानी भरने (Ascites) जैसी दर्दनाक समस्याओं को कम करना और मरीज को एक आरामदायक व लंबा जीवन देना है। यह पारंपरिक कीमोथेरेपी के मुकाबले ज्यादा प्रभावी ढंग से मरीज की लाइफ क्वालिटी को बेहतर बनाती है।

क्या इन दोनों प्रोसीजर्स के साथ नॉर्मल (Systemic) कीमोथेरेपी को भी कंबाइन किया जाता है? यह कॉम्बिनेशन कैसे काम करता है?

एडवांस स्टेज के कैंसर के इलाज में इन प्रोसीजर्स (विशेषकर PIPAC) के साथ नॉर्मल यानी सिस्टेमिक (Systemic) कीमोथेरेपी को कंबाइन किया जाता है। जब इन दोनों एप्रोचेस को एक साथ मिलाकर इलाज किया जाता है, तो इसके परिणाम काफी बेहतर होते हैं।

इसे एक 'कंबाइंड अप्रोच' (Combined Approach) कहा जाता है। इसमें मरीज को दो अलग-अलग तरीकों से कीमोथेरेपी दी जाती है ताकि कैंसर कोशिकाओं पर चौतरफा हमला किया जा सके। इन दोनों कीमोथेरेपी को देने का एक निश्चित चक्र (Cycle) होता है, जो इस प्रकार काम करता है।

  • पाइपैक (PIPAC) कीमोथेरेपी: यह प्रक्रिया हर दो-दो हफ्ते (2 Weeks) के अंतराल में की जाती है, जिसमें प्रेशर स्प्रे के जरिए सीधे पेट के अंदरूनी हिस्से को टारगेट किया जाता है।
  • नॉर्मल (सिस्टेमिक) कीमोथेरेपी: यह पारंपरिक कीमोथेरेपी आमतौर पर हर तीन-तीन हफ्ते (3 Weeks) के अंतराल पर नस (IV Line) या दवाओं के जरिए पूरे शरीर में दी जाती है।

जब इन दोनों पद्धतियों के मिश्रण (Club करके) से इलाज चलता है, तो कैंसर के रोगी को 'एक्स्ट्रा बेनिफिट' मिलता है।

  • चौतरफा हमला: नॉर्मल कीमोथेरेपी खून के जरिए पूरे शरीर में फैले कैंसर सेल्स पर काम करती है, जबकि पाइपैक सीधे पेट की झिल्ली में छिपे मुख्य ट्यूमर पर दबाव के साथ असर करती है।
  • फास्ट रिस्पॉन्स: इस दोहरे वार के कारण मरीज की बॉडी इलाज को लेकर बहुत जल्दी रिस्पॉन्ड (जल्दी सुधार) करती है। जो ट्यूमर पहले बेअसर लग रहे थे, वे तेजी से सिकुड़ने लगते हैं।

भारत में इन दोनों प्रोसीजर्स का अनुमानित खर्च क्या है? क्या ये आम तौर पर हेल्थ इंश्योरेंस या सरकारी योजनाओं के दायरे में आते हैं?

भारत के प्रमुख महानगरों (जैसे मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई और जयपुर) के बड़े कैंसर अस्पतालों में यह तकनीक उपलब्ध है।

  • HIPEC का खर्च: चूंकि इसमें एक बड़ी सर्जरी (CRS) और आईसीयू का खर्च शामिल होता है, इसलिए इसका कुल खर्च लगभग ₹5 लाख से ₹8 लाख (अस्पताल और मरीज की स्थिति के आधार पर) तक जा सकता है।
  • PIPAC का खर्च: प्रति साइकिल इसका खर्च लगभग ₹1.5 लाख से ₹2.5 लाख के बीच आता है। आजकल कई बड़ी प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां कुछ शर्तों के साथ इन एडवांस प्रोसीजर्स को कवर करने लगी हैं। लेकिन अभी यह सरकारी योजनाएं (जैसे आयुष्मान भारत या राज्य सरकार की विशेष योजनाएं) में कवर नहीं होता।
Updated on:
15 Jun 2026 06:47 pm
Published on:
16 Jun 2026 10:30 am