
Chemo Technique: कैंसर जब शरीर के किसी एक हिस्से से निकलकर पेट की अंदरूनी झिल्ली (Peritoneum) तक फैल जाता है, तो इसे मेडिकल भाषा में पेरिटोनियल कार्सिनोमैटोसिस कहा जाता है। ओवेरियन कैंसर, कोलन कैंसर, अपेंडिक्स और पेट (Stomach) के कैंसर के एडवांस स्टेज में अक्सर ऐसा देखा जाता है।
कुछ समय पहले तक इस स्थिति को लाइलाज या आखिरी स्टेज मान लिया जाता था, क्योंकि नसों के जरिए दी जाने वाली पारंपरिक कीमोथेरेपी (IV Chemotherapy) पेट की इस झिल्ली तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती। लेकिन मेडिकल साइंस ने अब इस चुनौती का तोड़ निकाल लिया है। आज HIPEC और PIPAC जैसी आधुनिक लोकल कीमोथेरेपी तकनीकें एडवांस स्टेज के मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. निखिल मेहता से विस्तार से समझते हैं कि ये दोनों एडवांस प्रोसीजर्स क्या हैं, कैसे काम करते हैं और मरीज के लिए कौन सा बेहतर है।
HIPEC का पूरा नाम Hyperthermic Intraperitoneal Chemotherapy है। इसे आम भाषा में 'हॉट कीमो' भी कहा जाता है। यह तकनीक उन मरीजों के लिए है जिनका कैंसर सर्जरी के जरिए निकाला जा सकता है। इसका काम करने का तरीका दो चरणों में पूरा होता है।
PIPAC का पूरा नाम Pressurized Intraperitoneal Aerosol Chemotherapyहै। यह एक बेहद आधुनिक और कम चीर-फाड़ वाली (Minimally Invasive) तकनीक है। यह उन मरीजों के लिए रामबाण है जिनका कैंसर बहुत ज्यादा फैल चुका है और जिनकी बड़ी सर्जरी नहीं की जा सकती।
जब कैंसर पेट की झिल्ली (Peritoneum) तक फैल जाता है, तो उसे पारंपरिक IV कीमोथेरेपी से ठीक करना मुश्किल क्यों होता है? वहां तक दवा क्यों नहीं पहुंच पाती?
हाइपैक (HIPEC) कैंसर चिकित्सा की एक आधुनिक तकनीक है, जो मुख्य रूप से पेट की अंदरूनी परत यानी पेरिटोनियल कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाती है। यह तकनीक ओवेरियन (अंडाशय), कोलन (आंत), अपेंडिक्स, प्राइमरी मेसोथेलियोमा और स्यूडोमिक्सोमा पेरिटोनाइ जैसे जटिल कैंसर में बेहद प्रभावी है। इस पूरी प्रक्रिया को ( CRS + HIPEC) यानी साइटोरिडक्टिव सर्जरी विद हाइपैक कहा जाता है। इसमें इलाज दो चरणों में पूरा होता है।
HIPEC और PIPAC ने पेरिटोनियल कैंसर के इलाज के नजरिए को कैसे बदला है? क्या हम इसे एक 'गेम-चेंजर' तकनीक कह सकते हैं?
हाइपैक (HIPEC) तकनीक को कैंसर इलाज के लिए एक बड़ा 'गेम चेंजर' माना जा सकता है। आमतौर पर दी जाने वाली पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में यह तकनीक मरीजों के लिए कहीं अधिक प्रभावी और फायदेमंद साबित हो रही है। इस आधुनिक विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सीधे तौर पर कैंसर कोशिकाओं (Cells) को लक्षित करके उन पर सटीक हमला करती है। जहां सामान्य कीमोथेरेपी एडवांस स्टेज के कैंसर में एक सीमा के बाद बेअसर होने लगती है, वहीं हाइपैक तकनीक मरीजों को 15 से 20 प्रतिशत तक अतिरिक्त सर्वाइवल बेनिफिट (जीवन प्रत्याशा लाभ) देती है। यह तकनीक कैंसर से पीड़ित मरीजों को न सिर्फ जीवन जीने की नई उम्मीद देती है, बल्कि उनकी उम्र को भी उन सालों तक बढ़ा सकती है जो सामान्य कीमोथेरेपी से संभव नहीं है। एडवांस स्टेज के पेरिटोनियल कैंसर से लड़ रहे मरीजों के लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है।
भारत में आमतौर पर मरीजों को इन एडवांस तकनीकों के बारे में बहुत देरी से पता चलता है। आपके पास आने वाले कितने प्रतिशत मरीज सही समय पर पहुंच पाते हैं?
कैंसर चिकित्सा के क्षेत्र में हाइपैक (HIPEC) और पाइपैक (PIPAC) तकनीकें एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई हैं। भारत में ज्यादातर ओवेरियन कैंसर (अंडाशय का कैंसर) और पेट की झिल्ली (पेरिटोनियल कैंसर) के मरीज डॉक्टरों के पास तीसरी या चौथी स्टेज (Stage 3 or 4) में ही पहुंच पाते हैं। ऐसी गंभीर और एडवांस स्थिति में ये दोनों आधुनिक पद्धतियां मरीजों के लिए बहुत अधिक कामयाब और जीवन रक्षक साबित हो रही हैं। इतनी कारगर होने के बावजूद आज भी देश में इन तकनीकों का लाभ हर जरूरतमंद मरीज तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिसके दो मुख्य कारण हैं।
अक्सर लोग सोचते हैं कि PIPAC से कैंसर जड़ से खत्म हो सकता है। क्या आप स्पष्ट कर सकते हैं कि PIPAC का मुख्य उद्देश्य 'क्यूरेटिव' (पूरी तरह ठीक करना) है या 'पैलिएटिव' (लाइफ क्वालिटी सुधारना और समय बढ़ाना)?
पाइपैक (PIPAC) का मुख्य और प्राथमिक उद्देश्य 'पैलिएटिव' (Palliative यानी कैंसर के लक्षणों को नियंत्रित करना, जीवन की गुणवत्ता सुधारना और मरीज की उम्र बढ़ाना) होता है, न कि 'क्यूरेटिव' (Curative यानी कैंसर को जड़ से खत्म करना)।
पाइपैक तकनीक का इस्तेमाल तब किया जाता है जब कैंसर पेट की झिल्ली (Peritoneum) में बहुत ज्यादा फैल चुका होता है और ऐसा चौथी स्टेज (Stage 4) पर होता है। ऐसी स्थिति में कैंसर को सर्जरी के जरिए शरीर से पूरी तरह बाहर निकालना संभव नहीं होता। इसका मुख्य काम ट्यूमर के बढ़ने की रफ्तार को धीमा करना, पेट में पानी भरने (Ascites) जैसी दर्दनाक समस्याओं को कम करना और मरीज को एक आरामदायक व लंबा जीवन देना है। यह पारंपरिक कीमोथेरेपी के मुकाबले ज्यादा प्रभावी ढंग से मरीज की लाइफ क्वालिटी को बेहतर बनाती है।
क्या इन दोनों प्रोसीजर्स के साथ नॉर्मल (Systemic) कीमोथेरेपी को भी कंबाइन किया जाता है? यह कॉम्बिनेशन कैसे काम करता है?
एडवांस स्टेज के कैंसर के इलाज में इन प्रोसीजर्स (विशेषकर PIPAC) के साथ नॉर्मल यानी सिस्टेमिक (Systemic) कीमोथेरेपी को कंबाइन किया जाता है। जब इन दोनों एप्रोचेस को एक साथ मिलाकर इलाज किया जाता है, तो इसके परिणाम काफी बेहतर होते हैं।
इसे एक 'कंबाइंड अप्रोच' (Combined Approach) कहा जाता है। इसमें मरीज को दो अलग-अलग तरीकों से कीमोथेरेपी दी जाती है ताकि कैंसर कोशिकाओं पर चौतरफा हमला किया जा सके। इन दोनों कीमोथेरेपी को देने का एक निश्चित चक्र (Cycle) होता है, जो इस प्रकार काम करता है।
जब इन दोनों पद्धतियों के मिश्रण (Club करके) से इलाज चलता है, तो कैंसर के रोगी को 'एक्स्ट्रा बेनिफिट' मिलता है।
भारत में इन दोनों प्रोसीजर्स का अनुमानित खर्च क्या है? क्या ये आम तौर पर हेल्थ इंश्योरेंस या सरकारी योजनाओं के दायरे में आते हैं?
भारत के प्रमुख महानगरों (जैसे मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई और जयपुर) के बड़े कैंसर अस्पतालों में यह तकनीक उपलब्ध है।