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Monsoon: मानसून से पहले समुद्र तट पर क्यों लग जाती है सीपियों की भीड़? जानिए प्रकृति में क्या है इसकी भूमिका?

Monsoon and Sea Shells: समुद्री तटों पर मानसून से ठीक पहले सीपियां जमा होने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है? यह बदलाव किन वजहों से होता है? क्या है विज्ञान? प्रकृति के अस्तित्व में इनका क्या महत्व है? इन सवालों को विस्तार से समझाती रिपोर्ट।
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Jun 24, 2026
shells on beach before monsoon nature mystery of sea shells
समुद्री तट पर सीपियों के इकट्ठा होने का क्या है विज्ञान? (Photo: AI)

Monsoon and Sea Shell: हर साल जून या जुलाई में पाकिस्तान, श्रीलंका, भारत, फिलीपिंस के समुद्र तटों पर कभी-कभार भीड़ बढ़ जाती है। हालांकि यह भीड़ सिर्फ सैलानियों की नहीं होती, बल्कि लाखों की संख्या में समुद्री सीपियां (शंख और खोल) समुद्र तट पर आकर जमा हो जाती हैं। ये सीपियां इतनी अधिक मात्रा में होती हैं कि पूरा समुद्र तट इनसे ढक जाता है और ज्यों-ज्यों रात गहराने लगती समुद्री हवाओं के चलते आपस में टकराने से इसमें से प्यारी धुन सुनाई देने लगती है। यह मनोहारी दृश्य और प्रकृति का संगीत लोगों को अपनी लय में बांध देता है। हालांकि जिन लोगों को समुद्र विज्ञान का नहीं पता, ऐसे लोग सोचते हैं कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हुई। इस साल जून में भी ऐसा ही हुआ।

पिछले कुछ दिनों से इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर और स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों को यह लगता है कि कहीं यह ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन का असर के चलते तो नहीं है या फिर यह प्रकृति का कोई चमत्कार तो नहीं है? आइए इस प्राकृतिक घटना के पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं।

समुद्री तट पर सीपियों का आना कोई नई घटना नहीं

यह कोई नई घटना नहीं है। वर्ष 2009 में कराची के क्लिफ्टन बीच पर रातोंरात बड़ी संख्या में सफेद और पीली समुद्री सीपियां बड़ी संख्या में आकर इकट्ठा हो गईं। ऐसी ही घटना की रिपोर्ट 2016 में सामने आई। डॉन की रिपोर्ट में बताया गया कि समुद्री लहरों की गतिविधि के कारण खासतौर पर वेनस क्लैम (Venus clams), जिन्हें स्थानीय भाषा में “बर्गर” कहा जाता है, उथले समुद्री इलाकों से निकलकर किनारे तक आ जाते हैं। वहां वे मर जाते हैं और पीछे खाली खोल छोड़ जाते हैं। दरअसल, यह घटना मानसून के आगमन से जुड़ी हुई है। इसकी दूसरी वजहों में समुद्री धाराएं, ज्वार-भाटा, प्रजनन चक्र और मौसम में बदलाव आना है।

समुद्री प्रदूषण बढ़ने से सीपियों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी

पर्यावरण के जानकार मानते हैं कि समुद्र पर सीपियों का आगम का समय जून और जुलाई का महीना होता है और यह उनका नियमित समय मानते हैं। हालांकि एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बढ़ता समुद्री प्रदूषण कुछ वर्षों में समुद्री जीवों की मृत्यु दर बढ़ा सकता है, जिससे कुछ वर्षों में किनारे पर अधिक संख्या में सीपियां जमा हो सकती हैं। पाकिस्तान में इस घटना को स्थानीय लोग 'आओकर' कहते हैं। कराची के कई तटीय क्षेत्रों जैसे इब्राहिम हैदरी और अन्य समुद्र तटों पर भी ऐसी सीपियां दिखाई देती हैं। यह घटना तब होती है जब घटती है जब समुद्र के गहरे हिस्सों का पानी ऊपर की ओर आता है।

क्या कहता है समुद्र विज्ञान?

अरब सागर पर किए गए वैज्ञानिक शोध इस घटना के बारे में स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि जब जून के आसपास दक्षिण-पश्चिम मानसून शुरू होता है, तो तेज हवाएं समुद्र की सतह के गर्म पानी को तट से दूर धकेलती हैं। इसके चलते समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर आने लगता है। इस प्रक्रिया को अपवेलिंग (Upwelling) कहा जाता है।

तल पर ठंडा पानी फैलते ही मरने लगते हैं समुद्री जीव

जर्नल ऑफ सी रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, यह ठंडा गहरा पानी बहुत कम ऑक्सीजन वाला होता है। जब यह समुद्र तल पर फैलता है, तो क्लैम और अन्य ऐसे समुद्री जीवों के लिए घातक साबित होता है जो तेजी से दूसरी जगह नहीं जा सकते। उनकी मृत्यु के बाद उनके खाली खोल तेज मानसूनी लहरों द्वारा समुद्र तट तक पहुंच जाते हैं।

कराची में जून से नवंबर तक बनी रहती है ये स्थितियां

डीप-सी रिसर्च में प्रकाशित अरब सागर के महाद्वीपीय शेल्फ पर किए गए एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि कराची के समुद्र के पास ठंडा और कम ऑक्सीजन वाला पानी जून से दिखाई देना शुरू हो जाता है और नवंबर तक बना रह सकता है। यही वह समय है जब लोग तट पर सबसे ज्यादा सीपियां देखते हैं।

जीवों की संख्या जब चरम पर होती है तभी घटती यह घटना

एक अन्य अध्ययन में बताया गया कि मानसून का समय वही होता है जब कराची के आसपास के तटीय इलाकों में समुद्री जीवों (जैसे क्लैम और अन्य शेलफिश) की संख्या सबसे अधिक होती है। यानी जब इन जीवों की संख्या अपने चरम पर होती है, तभी समुद्र की परिस्थितियां उनके लिए सबसे कठिन हो जाती हैं। इसी वजह से समुद्र तटों पर इतनी बड़ी मात्रा में सीपियां पहुंचती हैं।

दो कौ​ड़ी की सीपियां कितने काम की

समुद्री सीपियों (Sea shells) के खाली खोल को कौड़ी भी कहा जाता था। प्राचीन समय में जब मुद्रा का चलन नहीं था तब इन कौड़ियों से ही कारोबार होता था। इसी कौड़ी पर कहावतें भी बनीं। मिसाल के लिए दो कौड़ी का,फूटी कौड़ी भी न होना, कौड़ियों के भाव मिलना, कौड़ी-कौड़ी जोड़ना, कौड़ी आए तो गुलगुले पकाएं और दूर की कौड़ी। आज के समय में इनका क्या काम? दरअसल, प्रकृति में हर छोटी से छोटी वस्तु और हर बड़ी से बड़ी वस्तु होने के पीछे एक तर्क काम करता है। आइए समझते हैं कि कौड़ी यानी सीपियों का प्रकृति में क्या भूमिका है।

सीपियां समुद्री जीवों के पोषण के लिए जरूरी

प्रकृति के लिए छोटे जीवों खासकर मोलस्क (Mollusks) जैसे घोंघे और सीप की भूमिका बेहद अहम है। इनका मुख्य काम जीवों को शिकारियों के हमले से बचाना और समुद्री वातावरण से पूरी सुरक्षा देना होता है। इस ब्रह्मांड में किसी भी जीव का जीवन रहते हुए प्रकृति उसे उपयोगी बनाए रखती है और जीवन के बाद भी। घोंघे जब मर जाते हैं तो उनके खोल समुद्र तल पर जमा होती जाती हैं और यह टूटकर और बिखकर भी जरूरी खनिज में तब्दील हो जाती हैं। ये खत्म होने के बाद रेत और कैल्शियम जैसे खनिज बनाती हैं और इनसे समुद्र की पारिस्थितिकी तंत्र यानी जलीय जीव-जंतु को पोषण मुहैया कराती हैं। सीपियों में कई छोटे समुद्री अपना घरौंदा बनाते हैं। इन छोटे जीवों के लिए बड़े समुद्री जीवों से हमले से बचने के ये काम आते हैं। इनके टूटने से बनी रेत समुद्र तट का निर्माण होता है, जिससे तटों का संतुलन बना रहता है। इन सीपियों से समुद्र के क्षेत्र के पर्यावरण का भी पता चलता है।

INCOIS ने जारी की थी एडवाइजरी

भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) ने अप्रैल में एक समुद्री हीटवेव एडवाइजरी जारी की थी। इसमें बताया गया था कि अरब सागर के कुछ हिस्सों, जिनमें भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के तट तथा ओमान की ओर के क्षेत्र शामिल हैं। समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण हाई अलर्ट पर हैं।

Published on:
24 Jun 2026 05:09 pm