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40 साल पहले ठुकराई खोज ने पलट दी विज्ञान की बाजी, ‘वुल्फ प्राइज’ पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक ने देश को लेकर जताई चिंता

Wolf Prize 2025 Winner Scientist Exclusive Interview: वुल्फ पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक हैं पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जैनेंद्र के. जैन, patrika से की खास बातें, भारत में रिसर्च, एआई और युवाओं के भविष्य पर की खुलकर बात
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Jun 27, 2026
Wolf Prize 2025 Winner Scientist in Indore
Wolf Prize 2025 Winner Scientist in Indore: वुल्फ प्राइज जीतने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक पहुंचे इंदौर। पत्रिका से खास बातचीत। (फोटो सोर्स: patrika)

Wolf Prize Winner Scientist Exclusive Interview: हर बड़ी खोज की शुरुआत तालियों से नहीं, बल्कि सवालों से होती है। भारतीय मूल के वैज्ञानिक, पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जैनेंद्र के. जैन ने जब 40 साल पहले क्वांटम भौतिकी का अपना नया सिद्धांत दुनिया के सामने रखा, तब कई वैज्ञानिकों ने उसे स्वीकारने से इनकार कर दिया। शोधपत्र पर सवाल उठे, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में तीखी आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कुछ वर्षों बाद जब प्रयोगों ने उनके सिद्धांत को सही साबित किया, तो वही खोज क्वांटम भौतिकी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाने लगी। उसी योगदान के लिए उन्हें वुल्फ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे भारतीय मूल के पहले भौतिक वैज्ञानिक हैं। निजी यात्रा पर इंदौर आए प्रोफेसर जैन ने पत्रिका से खास बातचीत में अपनी वैज्ञानिक यात्रा, भारत में रिसर्च की स्थिति, एआई और युवाओं के भविष्य पर खुलकर बात की।

प्रश्न : आपकी 'कंपोजिट फर्मियन' रिसर्च आखिर है क्या? आम लोग इसे कैसे समझें?

उत्तर : मान लीजिए किसी एक व्यक्ति को समझना आसान है, लेकिन लाखों लोग एक साथ कैसे व्यवहार करेंगे, यह समझना मुश्किल होता है। इलेक्ट्रॉन भी कुछ ऐसे ही होते हैं। जब उन्हें विशेष परिस्थितियों में बहुत तेज चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो वे सामान्य तरीके से व्यवहार नहीं करते। मैंने (wolf prize winner scientist jainendra jain) बताया कि ऐसी स्थिति में इलेक्ट्रॉन एक नए रूप में व्यवहार करने लगते हैं, जिसे हमने कंपोजिट फर्मियन कहा। इस विचार ने एक ऐसी वैज्ञानिक पहेली सुलझाई, जिसे दुनिया कई वर्षों से समझ नहीं पा रही थी।

प्रश्न : क्या आपने कोई नया कण खोज लिया था?

उत्तर : यह प्रकृति में अलग से मौजूद नया कण नहीं है। यह विशेष परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉन का बदला हुआ रूप है। इस अवधारणा से वैज्ञानिकों के लिए कई जटिल प्रयोगों को समझना आसान हो गया।

प्रश्न : शुरुआत में आपके सिद्धांत का काफी विरोध हुआ था। उस समय क्या महसूस हुआ?

उत्तर : बिल्कुल। मेरा (wolf prize winner Jainendra k jain) शोधपत्र प्रकाशित होने से पहले ही कई वैज्ञानिकों ने उस पर संदेह जताया। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी मुझसे लगातार कठिन सवाल पूछे जाते थे। उस समय मैं युवा वैज्ञानिक था, इसलिए यह दौर आसान नहीं था। कई बार निराशा भी हुई, लेकिन मुझे अपने वैज्ञानिक तर्कों पर भरोसा था।

प्रश्न : आखिर लोगों ने आपके सिद्धांत को कब स्वीकार किया?

उत्तर : करीब तीन-चार साल बाद अलग-अलग प्रयोगों से ऐसे प्रमाण मिलने लगे, जिन्होंने मेरे सिद्धांत का समर्थन किया। विज्ञान में किसी व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि प्रयोग और प्रमाण अंतिम फैसला करते हैं। धीरे-धीरे वही सिद्धांत (wolf prize winner professor) पूरी दुनिया में स्वीकार कर लिया गया। यदि आपके पास मजबूत तर्क और प्रमाण हैं, तो शुरुआती असहमति से घबराना नहीं चाहिए। विज्ञान में धैर्य बहुत जरूरी है। सही काम को पहचान मिलने में समय लग सकता है, लेकिन मिलती जरूर है।

प्रश्न : भविष्य में आपकी खोज किस तकनीक में काम आ सकती है?

उत्तर : वैज्ञानिक शोध इस सोच के साथ नहीं किया जाता कि इसका उपयोग कहां होगा। हमारा उद्देश्य प्रकृति को बेहतर तरीके से समझना होता है। बाद में तकनीक और उद्योग उसके उपयोग खोज लेते हैं। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि इसका सबसे बड़ा उपयोग किस क्षेत्र में होगा। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि 'कंपोजिट फर्मियन' (wolf prize winner Jainendra k jain) की सेमी कंडक्टर स्टेज से बना नया पार्टिकल 'मायोराना' क्वांटम तकनीक में उपयोगी हो सकता है लेकिन अभी यह प्रमाणित नहीं है।

प्रश्न : भारत में रिसर्च की स्थिति को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर : हमारे यहां अच्छी गुणवत्ता का शोध हो रहा है, लेकिन शोध करने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। मैं क्वांटम मैटर के क्षेत्र में काम करता हूं। भारत में इस विषय पर मुश्किल से 100 लोग काम कर रहे हैं, जबकि अमेरिका और चीन में करीब 10-10 हजार और जर्मनी में लगभग पांच हजार शोधकर्ता इस क्षेत्र में हैं। हमें रिसर्च करने वाले लोगों की संख्या बढ़ानी होगी।

प्रश्न : आखिर भारत में रिसर्च कल्चर क्यों नहीं बन पा रहा?

उत्तर : हमारे यहां प्रतिभा की कमी नहीं है। साइंस ओलंपियाड और फिजिक्स-मैथ्स प्रतियोगिताओं में भारतीय विद्यार्थी शानदार प्रदर्शन करते हैं, लेकिन बाद में अधिकतर छात्र इंजीनियरिंग या दूसरे करियर चुन लेते हैं। बहुत कम विद्यार्थी शोध को अपना करियर बनाते हैं। हमें ऐसी सोच विकसित करनी होगी, जहां रिसर्च भी उतना ही आकर्षक करियर बने। रिसर्च के लिए बेहतर लैब, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और अधिक निवेश की जरूरत है। जितनी अच्छी सुविधाएं होंगी, उतने अधिक युवा रिसर्च की ओर आएंगे और देश विज्ञान में तेजी से आगे बढ़ेगा।

प्रश्न : एआइ आज रिसर्च को कैसे बदल रहा है?

उत्तर : एआइ शोध का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी है। पहले कोडिंग सीखने, गणितीय तकनीकें समझने और जटिल गणनाएं करने में महीनों या सालों लग जाते थे। अब एआइ कई काम घंटों में कर देता है। यहां तक कि गणित की नई थ्योरम बनाने में भी मदद कर रहा है। आने वाले समय में हर वैज्ञानिक के लिए एआइ की समझ जरूरी होगी।

प्रश्न : आज के विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं के लिए आपका संदेश?

उत्तर : रिसर्च में कोई शॉर्टकट नहीं होता। जिज्ञासा बनाए रखिए, कठिन सवाल पूछने से मत डरिए और लगातार सीखते रहिए। आलोचना से घबराइए मत, क्योंकि वह वैज्ञानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर आपका काम ईमानदारी, मेहनत और प्रमाणों पर आधारित है, तो देर-सबेर दुनिया उसे जरूर स्वीकार करेगी।

Published on:
27 Jun 2026 01:16 pm