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Womb Transplant : कैसे इस तकनीक से महिलाओं को मां बनने का मिल रहा है सुख?

Womb transplant: यदि महिला बच्चा पैदा करना चाहती है और सामान्य प्रक्रिया से उसे बच्चे ना हो तब क्या वह जिंदगी भर संतान सुख से वंचित रहे? इन परिस्थितियों में बच्चे की चाहत पूरी करने की कई प्रक्रिया हो सकती है, उनमें से एक है— वूम्ब ट्रांसप्लांट। वूम्ब ट्रांसप्लांट यानी गर्भाशय प्रत्यारोपण) क्या है और यह कैसे काम करता है? जानिए इस क्रांतिकारी मेडिकल तकनीक की पूरी प्रक्रिया, जोखिम और सरोगेसी से अंतर। इस बारे में बता रही हैं डॉ. मेघा एस. शास्त्री।

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May 16, 2026
गर्भाशय प्रत्यारोपण खुद के गर्भ में संतान पालने का एक बेहतरीन विकल्प है। (Photo: AI Generated)

Womb Transplant : मातृत्व (Motherhood) को दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास माना जाता है। लेकिन कई महिलाओं के लिए यह अहसास एक अधूरा सपना बनकर रह जाता है। बांझपन (Infertility) या निःसंतानता एक ऐसी समस्या है, जो न केवल किसी महिला को शारीरिक रूप से प्रभावित करती है, बल्कि उसे मानसिक और सामाजिक रूप से भी तोड़ देती है।

आज से कुछ समय पहले तक अगर किसी महिला के पास गर्भाशय (Uterus/बच्चेदानी) नहीं होता था या उसका गर्भाशय किसी बीमारी के कारण निकाल दिया जाता था, तब उसके पास मां बनने का कोई रास्ता नहीं बचता था। ऐसी स्थिति में केवल सरोगेसी (Surrogacy) या बच्चा गोद लेना (Adoption) ही एकमात्र विकल्प था। लेकिन चिकित्सा विज्ञान ने कभी हार नहीं मानी। वूम्ब ट्रांसप्लांट (Womb Transplant) यानी गर्भाशय प्रत्यारोपण की ऐसी नई तकनीक खोज निकाली, जिनमें महिलाओं की गोद भरने का काम किया जाता है, जो कभी मां बनने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। आइए विस्तार से समझते हैं कि वूम्ब ट्रांसप्लांट क्या है, इसका इतिहास क्या है, इसकी प्रक्रिया क्या है, इसकी क्या चुनौतियां हैं और इसका भविष्य कितना उज्ज्वल है।

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वूम्ब ट्रांसप्लांट (गर्भाशय प्रत्यारोपण) क्या है?

वूम्ब ट्रांसप्लांट एक अत्यंत जटिल सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें एक स्वस्थ महिला (डोनर) के गर्भाशय को ऑपरेशन के जरिए निकालकर, दूसरी महिला (रिसीवर) के शरीर में प्रत्यारोपित (implanted) किया जाता है जिसका गर्भाशय अनुपस्थित है या पूरी तरह से खराब हो चुका है। यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि यह ट्रांसप्लांट शरीर के अन्य अंगों (जैसे किडनी, लिवर या हार्ट ट्रांसप्लांट) की तरह स्थायी (Permanent) नहीं होता है। वूम्ब ट्रांसप्लांट को चिकित्सा की भाषा में इफिमिरल ट्रांसप्लांट (Ephemeral Transplant) या अस्थायी प्रत्यारोपण कहा जाता है। इसका उद्देश्य केवल महिला को गर्भधारण करने और एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने में मदद करना होता है। एक या दो सफल डिलीवरी के बाद, इस गर्भाशय को दोबारा सर्जरी करके महिला के शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है ताकि उसे जीवनभर हैवी इम्यूनोसप्रेसेन्ट (प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली) दवाएं न लेनी पड़ें।

यह तकनीक किन महिलाओं के लिए एक वरदान है?

वूम्ब ट्रांसप्लांट हर प्रकार के बांझपन का इलाज नहीं है। यह विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए विकसित किया गया है जो Uterine Factor Infertility (UFI) यानी गर्भाशय-जनित बांझपन से पीड़ित हैं। दुनिया भर में लगभग 3% से 5% महिलाएं बच्चा नहीं होने की समस्या का सामना करती हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

MRKH सिंड्रोम (Mayer-Rokitansky-Küster-Hauser Syndrome)

यह एक दुर्लभ जन्मजात (Congenital) बीमारी है। इस स्थिति में लड़कियां बाहरी रूप से पूरी तरह सामान्य और स्वस्थ विकसित होती हैं, लेकिन उनके शरीर के अंदर गर्भाशय (Uterus) और योनि मार्ग (Vagina) या तो पूरी तरह से अनुपस्थित होते हैं या अत्यंत अविकसित होते हैं। ऐसी महिलाओं के अंडाशय (Ovaries) सामान्य रूप से काम करते हैं और अंडे भी बनते हैं, लेकिन गर्भाशय न होने के कारण वे कभी गर्भवती नहीं हो पातीं।

हिस्टेरेक्टॉमी (Hysterectomy) या गर्भाशय का निकाला जाना

कई बार कम उम्र में ही कुछ गंभीर चिकित्सीय कारणों से महिलाओं का गर्भाशय ऑपरेशन करके निकालना पड़ता है। इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं:

  • गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर (Cervical Cancer) या गर्भाशय का कैंसर।
  • प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) होना, जिसके कारण जान बचाने के लिए गर्भाशय निकालना पड़े।
  • फाइब्रॉएड (Fibroids) या एंडोमेट्रियोसिस की बेहद गंभीर स्थिति।
  • एशरमैन सिंड्रोम (Asherman's Syndrome) इस स्थिति में किसी पुराने इन्फेक्शन, गर्भपात (Miscarriage) या बार-बार कराई गई डीएंडसी (D&C) के कारण गर्भाशय के अंदरूनी हिस्से में गहरे घाव या स्कार टिश्यूज (Scar tissues) बन जाते हैं। इससे गर्भाशय की दीवारें आपस में चिपक जाती हैं और वह भ्रूण को संभालने में असमर्थ हो जाता है।

वूम्ब ट्रांसप्लांट का विकास और इतिहास

गर्भाशय प्रत्यारोपण का सफर रातों-रात तय नहीं हुआ है। इसके पीछे दशकों की रिसर्च और जानवरों पर किए गए अनगिनत प्रयोग शामिल हैं।

  • पहला प्रयास (साल 2000): सऊदी अरब में दुनिया का पहला मानव गर्भाशय प्रत्यारोपण का प्रयास किया गया था। हालांकि, तकनीकी दिक्कतों और ब्लड क्लॉटिंग (खून का थक्का जमने) के कारण 99 दिनों के बाद उस गर्भाशय को निकालना पड़ा था।
  • दूसरा प्रयास (साल 2011): तुर्की में एक मृत डोनर से गर्भाशय लेकर ट्रांसप्लांट किया गया। महिला गर्भवती भी हुई, लेकिन दुर्भाग्यवश गर्भपात हो गया।
  • पहली ऐतिहासिक सफलता (साल 2014): स्वीडन के गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मैट्स ब्रैनस्ट्रॉम (Mats Brännström) के नेतृत्व में दुनिया का पहला सफल वूम्ब ट्रांसप्लांट हुआ, जिसके बाद एक स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ। डोनर महिला की एक 61 वर्षीय पारिवारिक मित्र थी।
  • भारत में सफलता (साल 2017): भारत के पुणे शहर में स्थित गैलेक्सी केयर हॉस्पिटल में डॉक्टरों की एक टीम ने देश का पहला सफल वूम्ब ट्रांसप्लांट किया। यहां एक मां ने अपनी 26 वर्षीय बेटी को अपना गर्भाशय दान किया था, जिसने बाद में एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

Step-by-Step Process: वूम्ब ट्रांसप्लांट प्रोसेस

वूम्ब ट्रांसप्लांट कोई एक दिन की सर्जरी नहीं है, बल्कि यह एक लंबी, जटिल और योजनाबद्ध प्रक्रिया है जो कई महीनों या सालों तक चलती है। इसे मुख्य रूप से पांच बड़े चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

  • पहला 1: डोनर और रिसीवर का चयन और कड़े टेस्टसबसे पहले यह तय किया जाता है कि गर्भाशय कौन दान करेगा। डोनर दो प्रकार के हो सकते हैं:

जीवित डोनर (Living Donor): आमतौर पर मां, बहन, मौसी या कोई करीबी रिश्तेदार। डोनर की सामान्यत उम्र 30 से 60 वर्ष के बीच होनी चाहिए, जिसने खुद के बच्चे पैदा कर लिए हों और उसका मेनोपॉज (मासिक धर्म बंद होना) हो चुका हो या होने वाला हो।

मृत डोनर (Deceased Donor): ऐसी महिला जिसे डॉक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया हो और उसके परिवार ने अंगदान की सहमति दी हो। इसके बाद दोनों महिलाओं के सैकड़ों मेडिकल, जेनेटिक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) टेस्ट किए जाते हैं। ब्लड ग्रुप और टिशू मैचिंग (HLA Typing) सबसे महत्वपूर्ण होती है ताकि रिजेक्शन के चांस कम से कम हों।

दूसरा 2: आईवीएफ (IVF In Vitro Fertilization) की प्रक्रिया

ट्रांसप्लांट सर्जरी शुरू करने से पहले ही, रिसीवर महिला के अंडाशय से अंडे (Eggs) निकाले जाते हैं और उसके पति के शुक्राणुओं (Sperms) के साथ लैब में फर्टिलाइज कराया जाता है। इसके बाद बनने वाले भ्रूणों (Embryos) को एडवांस कोल्ड स्टोरेज में फ्रीज (Freeze) कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ट्रांसप्लांट के बाद महिला के अंडाशय और नए गर्भाशय के बीच का प्राकृतिक कनेक्शन (फैलोपियन ट्यूब) काम नहीं करता है।

तीसरा 3: प्रत्यारोपण सर्जरी (The Transplant Surgery)

यह इस पूरी प्रक्रिया का सबसे कठिन हिस्सा है, जिसमें दो समानांतर ऑपरेशन चलते हैं:

डोनर की सर्जरी: डोनर के पेट से गर्भाशय को उसकी बेहद बारीक रक्त वाहिकाओं (Arteries and Veins) के साथ बहुत सावधानी से निकाला जाता है। इस सर्जरी में 8 से 10 घंटे लग सकते हैं।

रिसीवर की सर्जरी: जैसे ही गर्भाशय बाहर आता है, उसे रिसीवर महिला के पेल्विस (Pelvis) क्षेत्र में रखा जाता है। सर्जन्स माइक्रो-सर्जरी तकनीक का उपयोग करके डोनर के गर्भाशय की रक्त वाहिकाओं को रिसीवर की प्रमुख रक्त वाहिकाओं से जोड़ते हैं ताकि गर्भाशय में खून का दौरा (Blood Circulation) शुरू हो सके। इसके बाद गर्भाशय को योनि मार्ग और सहायक लिगामेंट्स से जोड़ा जाता है।

चौथा 4: रिकवरी और इम्यूनोसप्रेसेन्ट दवाएं

सर्जरी के बाद रिसीवर महिला को गहन निगरानी (ICU) में रखा जाता है। चूंकि यह गर्भाशय उसके शरीर का अपना हिस्सा नहीं है, इसलिए उसका इम्यून सिस्टम (Immunity) इसे एक बाहरी दुश्मन मानकर नष्ट करने की कोशिश कर सकता है। इसे रोकने के लिए महिला को इम्यूनोसप्रेसेन्ट (Immunosuppressant Drugs) दवाएं दी जाती हैं, जो उसके इम्यून सिस्टम को शांत रखती हैं। ये दवाएं तब तक खानी पड़ती हैं जब तक गर्भाशय शरीर के अंदर रहता है।

पांचवा 5: गर्भधारण और प्रसव (Pregnancy & Delivery)

ट्रांसप्लांट के लगभग 6 महीने से 1 साल बाद, जब डॉक्टर आश्वस्त हो जाते हैं कि गर्भाशय पूरी तरह सेट हो चुका है और महिला का मासिक धर्म (Periods) सामान्य रूप से शुरू हो गया है, तब प्रक्रिया का अगला भाग शुरू होता है।

फ्रीज किए गए भ्रूण (Embryo) को सीधे नए गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है। यदि गर्भधारण सफल रहता है, तो पूरी गर्भावस्था के दौरान हाई-रिस्क प्रेगनेंसी के रूप में महिला की बेहद कड़ी निगरानी की जाती है।

प्रसव (Delivery) प्रत्यारोपित गर्भाशय और उसकी नाजुक रक्त वाहिकाओं पर अत्यधिक दबाव से बचने के लिए, इसमें कभी भी नॉर्मल डिलीवरी नहीं कराई जाती। बच्चे का जन्म हमेशा सिजेरियन सेक्शन (C-Section/बड़ा ऑपरेशन) के जरिए ही होता है।

वूम्ब ट्रांसप्लांट के लाभ (Advantages)

  • जैविक मातृत्व (Biological Motherhood): सरोगेसी या गोद लेने की तुलना में, वूम्ब ट्रांसप्लांट महिला को अपने खुद के गर्भ में बच्चे को पालने, उसकी पहली हलचल महसूस करने और उसे जन्म देने का अनूठा अहसास कराता है।
  • अनुवांशिक संबंध (Genetic Connection): इसमें महिला के अपने अंडों और पति के स्पर्म का उपयोग होता है, इसलिए बच्चा पूरी तरह से आनुवंशिक रूप से उसी जोड़े का होता है।
  • कानूनी और भावनात्मक जटिलताओं से मुक्ति: कई देशों में सरोगेसी को लेकर कड़े कानून हैं या इसे अनैतिक माना जाता है। वूम्ब ट्रांसप्लांट इन सभी कानूनी और सामाजिक विवादों से मुक्त है।

चुनौतियां, जोखिम और साइड इफेक्ट्स

यह विज्ञान का एक अद्भुत चमत्कार जरूर है, लेकिन इसके साथ कई गंभीर जोखिम भी जुड़े हुए हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

  • अत्यधिक जटिल और लंबी सर्जरी : यह सर्जरी सामान्य ऑपरेशनों जैसी नहीं है। इसमें डोनर और रिसीवर दोनों की जान को जोखिम रहता है। डोनर महिला के लिए भी यह एक बड़ी मेजर सर्जरी होती है, जिससे उसके आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
  • ऑर्गन रिजेक्शन (Organ Rejection) : हार्ट या किडनी की तरह ही, शरीर किसी भी समय नए गर्भाशय को अस्वीकार (Reject) कर सकता है। यदि तीव्र रिजेक्शन होता है, तो आपातकालीन स्थिति में गर्भाशय को तुरंत बाहर निकालना पड़ता है, जिससे पूरी मेहनत और पैसा बरबाद हो जाता है।
  • दवाओं के गंभीर साइड इफेक्ट्स : इम्यूनोसप्रेसेन्ट दवाएं महिला की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बहुत कमजोर कर देती हैं। इसके कारण महिला को गंभीर बैक्टीरियल और वायरल इन्फेक्शन होने का खतरा हमेशा बना रहता है। इसके अलावा, ये दवाएं किडनी के फंक्शन को प्रभावित कर सकती हैं और हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) का कारण बन सकती हैं।
  • समय से पहले प्रसव (Premature Delivery) : वूम्ब ट्रांसप्लांट के माध्यम से होने वाले अधिकांश बच्चे समय से थोड़ा पहले (Pre-term) पैदा होते हैं। हालांकि वे पूरी तरह स्वस्थ होते हैं, लेकिन उन्हें कुछ दिनों तक एनआईसीयू (NICU) में रखने की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • भारी-भरकम खर्च (High Cost) : यह इस तकनीक की सबसे बड़ी कमियों में से एक है। वूम्ब ट्रांसप्लांट की लागत लाखों-करोड़ों में होती है। इसमें आईवीएफ का खर्च, दो बड़ी सर्जरी का खर्च, अस्पताल में लंबे समय तक रुकना और महंगी दवाएं शामिल हैं। यही कारण है कि यह आम या मध्यम वर्गीय परिवारों की पहुंच से बहुत दूर है।

नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण

वूम्ब ट्रांसप्लांट ने चिकित्सा जगत में कई नैतिक (Ethical) सवाल भी खड़े किए हैं। चूंकि यह जीवन बचाने वाली सर्जरी (Life-saving surgery) नहीं है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने वाली (Life-enhancing surgery) प्रक्रिया है, इसलिए आलोचकों का मानना है कि क्या एक बच्चे को जन्म देने के लिए दो स्वस्थ महिलाओं की जान को इतने बड़े जोखिम में डालना सही है? हालांकि, इसके समर्थकों और मनोवैज्ञानिकों का तर्क है कि मां बनने की इच्छा किसी महिला के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की खुशी के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है, जितना कि कोई अन्य अंग। इसलिए, यदि डोनर अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के अंगदान कर रहा है, तो इसे पूरी तरह से नैतिक माना जाना चाहिए।

वूम्ब ट्रांसप्लांट का भविष्य

वर्तमान में, वूम्ब ट्रांसप्लांट की सफलता दर (Success Rate) लगभग 75% से 80% तक पहुंच चुकी है, जो कि किसी भी नई सर्जिकल तकनीक के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। वैज्ञानिक अब इस दिशा में और अधिक शोध कर रहे हैं:

  • रोबोटिक सर्जरी: अब डोनर के गर्भाशय को निकालने के लिए रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी (Robotic Surgery) का उपयोग किया जा रहा है, जिससे डोनर का ब्लड लॉस कम होता है और वह बहुत जल्दी ठीक हो जाती है।
  • आर्टिफिशियल वूम्ब (कृत्रिम गर्भाशय): वैज्ञानिक लैब में बायो-इंजीनियरिंग के जरिए कृत्रिम गर्भाशय उगाने पर भी काम कर रहे हैं, जिससे भविष्य में किसी डोनर की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

डॉ. मेघा एस. शास्त्री के साथ पत्रिका के सवाल- जवाब

वूम्ब ट्रांसप्लांट तकनीकी रूप से किडनी या लिवर ट्रांसप्लांट से कितना अलग है?

  • अस्थायी अंग (Temporary Organ): किडनी या लिवर ट्रांसप्लांट जीवन बचाने के लिए स्थायी रूप से किए जाते हैं। इसके विपरीत, वूम्ब ट्रांसप्लांट केवल बच्चे के जन्म तक के लिए एक 'अस्थायी' प्रत्यारोपण है। डिलीवरी के बाद इसे शरीर से निकाल दिया जाता है।
  • उद्देश्य: यह जीवन रक्षक नहीं, बल्कि 'जीवन की गुणवत्ता' सुधारने और मातृत्व सुख देने वाली सर्जरी है। इसकी बेहद बारीक रक्त वाहिकाओं को जोड़ना तकनीकी रूप से अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
  • अंग की कार्यप्रणाली (Functional Validation): किडनी या लिवर ट्रांसप्लांट के सफल होते ही वे तुरंत शरीर में काम करना (जैसे यूरिन बनाना या टॉक्सिन्स साफ करना) शुरू कर देते हैं। लेकिन गर्भाशय के मामले में असली परीक्षा सर्जरी के तुरंत बाद नहीं, बल्कि महीनों बाद होती है। जब वह भ्रूण को स्वीकार करता है, नौ महीने तक शिशु का भार संभालता है और एक नई जिंदगी को जन्म देता है।

इसमें 'टिशू मैचिंग' (HLA Typing) की प्रक्रिया कितनी कड़ी होती है? क्या मां और बेटी के अलावा किसी अनजान व्यक्ति (ब्रेन डेड डोनर) का गर्भाशय भी उतना ही सफल होता है?

उन्होंने बताया, वूम्ब ट्रांसप्लांट में 'टिशू मैचिंग' (HLA Typing) की प्रक्रिया बेहद कड़ी होती है, ताकि शरीर नए अंग को रिजेक्ट न करे। जहां तक डोनर का सवाल है, मां और बेटी के बीच जेनेटिक समानता के कारण सफलता दर सबसे अधिक होती है और रिजेक्शन का खतरा कम रहता है। हालांकि, मेडिकल साइंस की प्रगति से अब 'ब्रेन डेड डोनर' (अनजान व्यक्ति) का गर्भाशय भी सफल साबित हो रहा है, बशर्ते ब्लड ग्रुप और टिशू पूरी तरह मैच करते हों। वैश्विक स्तर पर मृत डोनर्स से भी कई स्वस्थ बच्चों का जन्म हो चुका है।

सर्जरी के बाद शरीर द्वारा अंग को रिजेक्ट करने (Organ Rejection) के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं, और डॉक्टर इसे कैसे मैनेज करते हैं?

सर्जरी के बाद गर्भाशय रिजेक्शन के शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, पेट के निचले हिस्से में दर्द, योनि से असामान्य ब्लीडिंग या डिस्चार्ज और अचानक वजन बढ़ना (फ्लूइड रिटेंशन के कारण) शामिल हैं। इसका पता रूटीन बायोप्सी (biopsy) और डॉपलर अल्ट्रासाउंड (doppler ultrasound) से चलता है। इसे मैनेज करने के लिए तुरंत इम्यूनोसप्रेसेन्ट दवाओं (Anti-rejection drugs) की खुराक बढ़ा देते हैं। यदि रिजेक्शन गंभीर हो और दवाओं से ठीक न हो, तो मरीज की जान बचाने के लिए ट्रांसप्लांट किए गए गर्भाशय को तुरंत सर्जरी करके बाहर निकाल दिया जाता है।

जब फैलोपियन ट्यूब काम नहीं करती, तो आईवीएफ (IVF) के जरिए भ्रूण को नए गर्भाशय में इम्प्लांट करने की टाइमिंग कैसे तय की जाती है?

फैलोपियन ट्यूब न होने के कारण, ट्रांसप्लांटेड गर्भाशय में भ्रूण (Embryo) इम्प्लांट करने की टाइमिंग 'इम्प्लांटेशन विंडो' (Window of Implantation) के आधार पर बेहद सटीकता से तय की जाती है। इसके लिए सर्जरी के 6 से 12 महीने बाद महिला के गर्भाशय की परत (Endometrium) की मोटाई, रक्त प्रवाह और हार्मोनल स्तर (विशेषकर प्रोजेस्टेरोन) की बारीकी से निगरानी करते हैं। जब गर्भाशय की अंदरूनी परत भ्रूण को स्वीकार करने के लिए सबसे अनुकूल और आदर्श स्थिति में होती है, ठीक उसी समय लैब में फ्रीज किए गए भ्रूण को सीधे गर्भाशय में ट्रांसफर कर दिया जाता है।

एक जीवित डोनर (जैसे मां या बहन) के स्वास्थ्य पर इस सर्जरी का भविष्य में क्या असर पड़ सकता है? क्या उनके लिए कोई लॉन्ग-टर्म रिस्क है?

एक जीवित डोनर (जैसे मां या बहन) के लिए यह एक बड़ी और जटिल सर्जरी (Radical Hysterectomy) होती है। अल्पकालिक जोखिमों में ब्लीडिंग, इन्फेक्शन और यूरिनरी ट्रैक्ट या नसों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। लॉन्ग-टर्म रिस्क की बात करें तो, यदि डोनर का मेनोपॉज नहीं हुआ है और सर्जरी में उनके अंडाशय (Ovaries) सुरक्षित रखे गए हैं, तो उनके हार्मोनल स्तर पर कोई असर नहीं पड़ता। मुख्य दीर्घकालिक जोखिमों में सर्जरी वाले हिस्से में हर्निया (Hernia) होना या पेल्विक अंगों के सपोर्ट में कमजोरी आना शामिल है।

क्या मेनोपॉज (मासिक धर्म बंद होने) के बाद भी कोई महिला गर्भाशय दान कर सकती है?

यदि महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ है और उसकी रक्त वाहिकाएं अच्छी स्थिति में हैं, तो मेनोपॉज के बाद भी वह गर्भाशय दान कर सकती है। रिसीवर के शरीर में जाने के बाद हार्मोनल थेरेपी के जरिए उस गर्भाशय को दोबारा सक्रिय कर दिया जाता है।

क्या ट्रांसप्लांट किया गया गर्भाशय हमेशा के लिए शरीर में रहता है?

उन्होंने कहा, बच्चे के जन्म के बाद (या अधिकतम दो बच्चों के बाद) एक और सर्जरी करके इस गर्भाशय को निकाल दिया जाता है ताकि महिला को जीवनभर इम्यूनोसप्रेसेन्ट दवाएं न खानी पड़ें, जिनके कई साइड इफेक्ट्स होते हैं।

क्या वूम्ब ट्रांसप्लांट के बाद पैदा हुआ बच्चा सामान्य होता है?

उन्होंने कहा, इस तकनीक से पैदा हुए बच्चे पूरी तरह से सामान्य और स्वस्थ होते हैं। गर्भावस्था के दौरान दी जाने वाली दवाओं का बच्चे के विकास पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े, इसके लिए डॉक्टरों द्वारा बेहद सुरक्षित दवाओं का चयन किया जाता है।

जो महिलाएं बिना गर्भाशय के पैदा होती हैं (जैसे MRKH सिंड्रोम), इस सर्जरी के सफल होने के बाद उनकी मानसिक स्थिति में क्या बदलाव आता है? डॉक्टरों के रूप में आपका क्या अनुभव रहा है?

उन्होंने कहा, बिना गर्भाशय के पैदा हुई महिलाओं (MRKH सिंड्रोम) के लिए यह सर्जरी केवल शारीरिक इलाज नहीं, बल्कि भावनात्मक पुनर्जन्म है। मेरा अनुभव है कि सर्जरी की सफलता के बाद महिलाओं में वर्षों की हीनभावना, सामाजिक कलंक का डर और मानसिक तनाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है। खुद के गर्भ से संतान को जन्म देने की खुशी उनके आत्मविश्वास और नारीत्व के अहसास को चरम पर ले जाती है, जिससे उनका वैवाहिक और पारिवारिक जीवन अत्यंत सुखद और अवसाद-मुक्त हो जाता है।

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