Women Against Drugs : ड्रग्स और शराबखोरी के खिलाफ मोर्चा लेने में हिमाचल ही नहीं बल्कि पूरे देश में महिलाओं ने मोर्चा लिया है। नशाखोरी के खिलाफ लड़ने पर पुलिस मुकदमा से लेकर समाज के ताने भी झेलने पड़ते हैं। लघट महिला मंडल की अध्यक्ष पिंकी शर्मा ने बताया कि लघट को ड्रग्स से बचाने की मुहिम चलाने के एवज में पुलिस ने हमारे ऊपर इन धाराओं 115(2), 351(2), 126(2), 356(2), 191(2), 190, 61(2) के तहत केस दर्ज कर लिया है।
Himachal Women Against Drugs : हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गांव लघट पड़ता है, जहां सभी रात को रजाई ओढ़कर गर्म बिस्तरों में सो रहे होते हैं तब रात और जीवन के अंधकार को चीरने के लिए यहां की महिलाएं मोबाइल फोन की टॉर्चलाइट, लाठियों के साथ मोर्च पर तैनात हो जाती हैं। 22 सदस्यीय लाघाट महिला मंडल (Laghat Mahila Mandal) ने यह दृढ़ संकलप लिया है कि वह नशाखोरी से बदतर हो चुकी परिस्थितियों से पार पाकर रहेंगी।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य की 234 पंचायतों को चिट्टा की गिरफ्त में पाया है। वहीं पंजाब की सीमा से लगे बरमाना ग्राम पंचायत के अंतर्गत पड़ने वाले लघट गांव को हिमाचल प्रदेश सरकार ने चिट्टा के खतरे से अत्यधिक प्रभावित माना है। नशाखोरी की समस्या से परेशान होकर लघट की महिलाओं ने 22 सदस्यों की एक समिति बनाई और इस लघट महिला मंडल नाम दिया।
लघट महिला मंडल की अध्यक्ष पिंकी शर्मा (Pinki Sharma, Laghat Mahila Mandal) ने बताया, 'लघट पिछले देढ़ साल से चिट्टे की गिरफ्त में आ चुका है। पुलिस ने पिछले दिनों एक ड्रग स्मग्लर को पकड़ा भी था। वह जेल गया और फिर छूट भी गया। उसके बाद से वह हमारे गांव में खेल के मैदान और आसपास के इलाकों का दिन में 10-10 चक्कर लगाने लगा। मुझे पता चला कि वह हमारे गांव के युवाओं को नशे की पुड़िया थमाकर जाता है। ड्रग्स स्मग्लरों (Drugs Smugglers) से अपने बेटे और भाइयों को बचाने के लिए हमने एक समिति बनाई। हम महिलाएं दिन और रात में पहरा दे रही हैं।'
पिंकी शर्मा ने बताया कि लघट को ड्रग्स से बचाने की मुहिम चलाने के एवज में पुलिस ने हमारे ऊपर इन धाराओं 115(2), 351(2), 126(2), 356(2), 191(2), 190, 61(2) के तहत केस दर्ज कर लिया है।
पिंकी शर्मा ने बताया कि हमारे इलाके में एसीसी सीमेंट की फैक्टरी (ACC Cement Factory) है, जिसके चलते यहां हर रोज 5,000 ट्रकों का आना-जाना होता है। इसके अलावा मजदूर वर्ग के लोग भी काफी हैं, जो नशाखोरी करते हैं। युवा उनके जरिए नशे का सामान हासिल कर लेते हैं। उनसे जब पत्रिका ने पूछा कि आपलोग स्मग्लर्स से कैसे लड़ेंगी? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा- 'हमें अपना घर बचाना है। हमें अपने युवाओं की जान बचानी है। हमें अपन गांव और पंचायतों को बचाना है। हम महिलाएं इस काम के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार हैं।'
पिंकी ने बताया कि इस मुहिम से कुसुम लता (48), उर्मिला देवी (36), अंजू देवी (42), रीना देवी (49), कंचन (44), मीरा देवी (52) सहित 22 महिलाएं जुड़ चुकी हैं। हमारी महिला मंडल दिन और रात लाठी और हंसिया लेकर पहरा दे रही हैं। उनका कहना है कि इस काम में हमारे पति और बुजुर्ग भी बहुत साथ दे रहे हैं। हालांकि वह यह भी बताती हैं कि इस काम में जंगली जानवरों का भी डर काफी रहता है, लेकिन हम मजबूर हैं और हम मोर्चे पर डटे रहेंगे।
ग्रामीणों ने बताया कि पंकज चंदेल युवाओं को नशा से दूर करने के लिए युवाओं को खेल से जुड़ी गतिविधियां करवा रहे हैं। वह लिंक रोड के अंत में स्थित एक खेल के मैदान में वॉलीबॉल खेलने वाली ग्रामीण टीमों के मेंटर हैं। वह सौर ऊर्जा से चलने वाली लाइटों की रोशनी में युवाओं को खेल से जुड़ी गतिविधियां करवाते हैं।
लघट की महिला मंडल से जुड़ी 32 वर्षीय सुमन कुमारी कहती हैं, “लगभग डेढ़ साल पहले मेरे पति को चिट्टा की लत लग गई थी। उन्हें नशीले पदार्थ ले जाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जमानत पर रिहा होने के बाद हमने उन्हें नशामुक्ति केंद्र में भर्ती कराया और तब से उन्होंने नशा नहीं किया है। मैं नहीं चाहती कि कोई और उस दर्द से गुजरे जिससे मैं गुजरी हूं। यही एकमात्र कारण है कि मैं आधी रात को अपने 10 वर्षीय बच्चे और बीमार सास को घर पर छोड़कर यहां आई हूं।”
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के एडवोकेट और बीजेपी नेता अमित सिंह चौहान का मानना है कि पति या बेटे नशाखोरी के चंगुल में पड़ जाएं तो उससे सबसे ज्यादा महिलाएं ही पीड़ित होती हैं। उनका कहना है कि नशाखोरी की गिरफ्त वाले घर की महिलाओं की जिंदगी नरक बन जाती है।
हिमाचल प्रदेश के हिंदू रक्षा मंच के अध्यक्ष कमल गौतम चिंता से भरकर पत्रिका से बातचीत करते हुए कहते हैं, पंजाब की यह बीमारी पिछले 4-5 वर्षों में हिमाचल के हिंदू युवाओं को लग गई।' वह कहते हैं, 'इस्लामिक संगठनों की साजिश के चलते हमारा हिमाचल बर्बाद हो रहा है। चिट्टे सप्लायर्स की लिस्ट तैयार करेंगे तो पाएंगे 60-70 फीसदी सप्लायर्स मुसलमान ही निकलेंगे।' कमल गौतम अवकाशप्राप्त शिक्षक हैं।
शिमला, सजौली, कुल्लू और नालागढ़ में नशामुक्ति को लेकर आंदोलन चालाने वाले कमल गौतम ने बताया, 'मैं हिमाचल को नशामुक्त बनाने की मुहिम का लगातार नेतृत्व कर रहा हूं। मैंने पाया कि नशाखोरी से राज्य में एक भी मुस्लिम लड़के की मौत नहीं हुई। राज्य में मरने वाले सारे लड़के हिंदू ही रहे हैं। इनके चलते हमारे घर बर्बाद हो रहे हैं। हमारी मां और बहनों के सुहाग उजड़ रहे हैं।'
कमल कहते हैं, 'नशा का सामान तैयार करने में मॉर्फिन का इस्तेमाल होता है। दवा बनाने में भी मॉर्फिन का इस्तेमाल होता है। हिमाचल में कई दवा निर्माण कंपनियों की यूनिट हैं। मुझे इस बात का गहरा अंदेशा है कि ड्रग्स की सप्लाई में दवा निर्माण का भी हाथ हो सकता है। पुलिस को इस एंगल से भी जांच-पड़ताल करना चाहिए।'
नशाखोरी से राज्य को मुक्ति दिलाने के बारे में कमल गौतम कहते हैं, 'ड्रग्स सप्लायर्स के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। सप्लायर्स की संपत्ति जब्त हो। इनके घरों पर बुलडोजर चलाए जाएं। युवाओं को नशीला पदार्थ मुहैया कराने वाले का एनकाउंटर करे पुलिस।'
बीते 15 नवंबर को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 'चिट्टा मुक्त हिमाचल' अभियान की शुरुआत की और ग्राम पंचायतों व अन्य निकायों से नशाखोरी की समस्या से लड़ने के लिए आगे आने का आह्वान किया। इस अभियान के तहत पुलिस टीमें जंगल, परित्यक्त इमारतें, पार्किंग स्थल, नदी किनारे, पुराने बस स्टैंड और गैरेज सहित नशीली दवाओं से संबंधित गतिविधियों के लिए संवेदनशील सुनसान, एकांत और अर्ध-सार्वजनिक स्थानों का निरीक्षण कर रही हैं। 26 दिसंबर को सुक्खू अपने 'चिट्टा विरोधी पदयात्रा' के तहत बिलासपुर में होंगे।
सूखा नशा की समस्या पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में सबसे ज्यादा है। हरियाणा और पंजाब में भी महिलाओं ने कई बार नशाखोरी के खिलाफ मोर्चा खोला है। विभिन्न आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, पंजाब में 2020 से लेकर 2024 के अंत तक मादक पदार्थों और मनोविकृत पदार्थों (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत 40,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए और 50,000 से अधिक व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। 2015 से 2024 के बीच कुल 51,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए।
देश के दूसरे राज्यों में नशाखोरी खासतौर पर शराबखोरी के खिलाफ भी महिलाओं ने जोरदार अभियान चलाए हैं। हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और पंजाब में महिलाओं ने कई बार शराब के ठेके बंद कराने की मुहिम चलाई। वहीं बिहार में भी महिला संगठनों की लंबी लड़ाई के बाद राज्य की नीतीश सरकार ने 1 अप्रैल 2016 से शराबबंदी लागू कर दी। वहीं गुजरात में 1 मई 1960 से ही शराब पर प्रतिबंध जारी है।