Woman Reservation Bill: देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात जोरशोर से चल रही है। राजनीति में महिलाओं को टिकट देने के मामले में भारत में एक दो पार्टियों को छोड़कर सभी बहुत पीछे हैं। यही हाल आर्थिक क्षेत्र का भी है। आइए जानते हैं कि राजनीति से लेकर आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी की क्या स्थिति है।
Women Reservation Bill: देश में महिला आरक्षण विधेयक (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) पर पिछले एक सप्ताह से जोरशोर से चर्चा हो रही है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार की चिंता में शामिल दिख रहा है तो दूसरा बड़ा हिस्सा विपक्ष की जीत में खुश दिख रहा है। लेकिन क्या भारत में महिलाओं की भागीदारी को लेकर देश की राजनीतिक पार्टियां चिंतित हैं? क्या राजनीतिक पार्टियों ने देश में महिलाओं की हर जगह भागीदारी बढ़ाने के पक्ष में माहौल तैयार किया है? आइए राजनीतिक पार्टियों से लेकर देश के आर्थिक विकास के मामले में महिलाओं की भागीदारी की भूमिका कितनी है, समझने की कोशिश करते हैं।
Woman Participation in Politics : अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान से पहले राजनीतिक पार्टियों के घर में ही झांककर देखते हैं, वहां महिलाओं को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका कितनी मजबूत रही है।
वर्ष 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद हुए चुनावों के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि महिला उम्मीदवारों की संख्या में कहीं थोड़ी ज्यादा तो कहीं मामूली बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों पर गौर फरमाने पर यह साफ पता चलता है कि पार्टियों के अंदर लैंगिक असमानता अब भी पसरी हुई है। हालांकि, इस मामले में कुछ पार्टियों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।
Vidhan Sabha Chunav 2026: वर्ष 2026 में असम, केरलम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी राज्यों में नई सरकार के लिए विधानसभा चुनाव कराए जा रहे हैं। अधिकांश दलों ने महिला उम्मीदवारों की भागीदारी में थोड़ी वृद्धि दर्ज की, जबकि कुछ पार्टियों ने इस मामले में कंजूसी दिखाई। यदि 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने से पहले और बाद के विधानसभा चुनावों की तुलना करें, तो सिर्फ छह ऐसे उदाहरण सामने आए, जहां किसी पार्टी ने 20% से अधिक महिलाओं को टिकट दिया।
लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक को खारिज करवाने का श्रेय लेने वाली कांग्रेस पार्टी ने पश्चिम बंगाल में मौजूदा विधानसभा चुनाव में 35 महिलाओं को टिकट दिया। पार्टी इस बार पर 294 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं 2021 में कांग्रेस ने सिर्फ 7 महिलाओं को टिकट दिया था, तब पार्टी ने सिर्फ 92 विधानसभा सीटों पर ही चुनाव लड़ा था। राज्य में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत 2021 की तुलना में 7.6% से बढ़कर 11.9% हो गया।
तृणमूल कांग्रेस ने 2021 में 48 यानी 16.55% महिलाओं को टिकट दिया था। मौजूदा विधानसभा 2026 में पार्टी ने 52 यानी 17.86% महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया। इसके विपरीत, भाजपा ने पिछले विधानसभा के मुकाबले 2026 में महिला उम्मीदवारों की सीटों में कटौती की। पार्टी ने 38 के मुकाबले इस बार 33 महिलाओं को ही टिकट दिया।
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके और विपक्षी एआईएडीएमके पार्टियों ने लगभग समान रुख अपनाया। डीएमके ने 176 सीटों में 19 महिलाओं को टिकट दिया, जबकि एआईडीएमके ने भी 172 में से 19 सीटें महिला उम्मीदवारों को दी। डीएमके ने 2021 में 13 महिलाओं को टिकट दिया था जबकि एआईएडीएमके ने इस मामले में अपनी पुरानी स्थिति बनाए रखी। दोनों दलों में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत करीब 11% रहा।
केरलम में कांग्रेस ने पिछली बार की तुलना में इस बार अपेक्षाकृत कम महिलाओं को टिकट दिया। भाजपा ने सीट देने में बेहद मामूली बढ़ोतरी की। वहीं वामपंथी दलों सीपीएम और सीपीआई ने महिलाओं को सीट देने में मामूली बढ़ोतरी की। भाजपा का प्रतिशत 13.9% से बढ़कर 14.3% हुआ, जबकि कांग्रेस का 10.8% से घटकर 9.9% रह गया। सीपीएम ने भी अपने हिस्से की सीटों में महिलाओं की भागीदारी 14.7% से बढ़ाकर 15.6% की।
असम में कांग्रेस ने 2021 के मुकाबले मौजूदा चुनाव में महिला उम्मीदवारों को 4 सीटें बढ़ाकर 13 कर दिया। वहीं भाजपा ने 7 महिला उम्मीदवार से घटाकर 6 महिलाओं को ही टिकट दिया। प्रतिशत के रूप में कांग्रेस में महिलाओं की हिस्सेदारी 13.3% और भाजपा में 6.7% रही।
वर्ष 2024 में सिक्किम विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने 12 में से 4 सीटों यानी 33.3% पर महिलाओं को उम्मीदवार बनाया। वहीं इसी वर्ष हुए झारखंड के विधानसभा चुनाव में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) ने 10 में से 3 महिलाओं को टिकट देकर 30% का आंकड़ा हासिल किया। इसके अलावा, ओडिशा में बीजू जनता दल (23.8%), झारखंड में कांग्रेस (23.3%), केरल में सीपीआई (20.8%) और छत्तीसगढ़ (2023) में कांग्रेस (20%) ही ऐसे उदाहरण हैं, जहां महिलाओं की हिस्सेदारी 20% से अधिक रही। इन सभी राज्यों में इससे पहले किसी भी पार्टी ने 20% से अधिक महिलाओं को टिकट नहीं दिया था।
कांग्रेस ने सिक्किम, झारखंड और छत्तीसगढ़ में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई और 2024 में अरुणाचल प्रदेश में 15.8% महिला उम्मीदवार उतारे। हालांकि, इससे पहले 2019 में झारखंड में उसका महिला प्रतिनिधित्व 19.4% तक पहुंच चुका था। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी गिरावट पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश और दिल्ली में दर्ज की गई।
हाल ही में केंद्र सरकार महिलाओं के आरक्षण कानून को जल्दी लागू कराने के प्रयास में संसद से मंजूरी नहीं ले सकी। इस कानून को परिसीमन विधेयक से जोड़ना इसकी राह में एक बड़ी बाधा बन गया। हालांकि, राजनीतिक क्षेत्र में महिला भागीदारी बढ़ाने की असफलता तो चिंताजनक बात है ही, लेकिन इसके साथ आर्थिक क्षेत्र में भी महिलाओं का दखल बढ़ाने की बहस और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन निर्णय लेने वाले शीर्ष पदों पर उनकी उपस्थिति अभी भी बेहद कम है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 'विकसित भारत @2047' का सपना देखा है। इसके मद्देनजर विश्व बैंक ने 2023 में कहा था कि भारत को 2047 तक विकसित देश बनने के लिए हर साल लगभग 8% की दर से आर्थिक विकास करना होगा। हालांकि, कार्यबल में महिलाओं की कम भागीदारी इस लक्ष्य को हासिल करने में बाधा बन सकती है। एक शोध में यह पाया गया कि महिला विधायकों का आर्थिक प्रदर्शन पुरुष विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में औसतन 1.8 प्रतिशत अंक अधिक था।
हाल के वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज़ वृद्धि के साथ महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर में सुधार देखा गया है। यह 2022 में 33.9% से बढ़कर 2025 में 40% हो गई है। फिर भी यह वैश्विक औसत 49% से काफी कम है। ब्राज़ील (53%) और वियतनाम (69%) से भारत अभी काफी पीछे है।
भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM) में कार्यबल में महिलाओं की स्थिति थोड़ी बेहतर दिखाई देती है। अहमदाबाद में 20%, बेंगलुरु में 26%, कोलकाता में 31%, लखनऊ में 24%, इंदौर में 19% और कोझिकोड में 30% महिला फैकल्टी हैं। पूरे देश में प्रोफेसर स्तर पर महिलाओं की भागीदारी 2011-12 के 25.9% से बढ़कर 2021-22 में 29.5% हो गई है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में महिला फैकल्टी का प्रतिशत लगभग 14% पर स्थिर है। IIT जोधपुर में कार्यबल में महिलाएं 22% है। यह IIT में सर्वाधिक है। महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी तो बढ़ रही है, लेकिन शीर्ष पदों पर उनकी मौजूदगी अभी भी काफी कम है।
व्यापार और कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी सीमित है। 2025 में महिला की मालिकाना वाली कंपनियों की हिस्सेदारी सिर्फ 27% थी। वहीं, उच्च पदों जैसे वरिष्ठ अधिकारी और प्रबंधक पद पर हर 100 पुरुषों पर सिर्फ 13 महिलाएं ही हैं। देश की बड़ी कंपनियों में से 77% कंपनियों में ही 1-2 महिलाएं निदेशक या इसके समकक्ष पद पर मौजूद हैं। आंकड़े बताते हैं कि बीएसई (BSE) 200 की केवल 7% और एनएसई (NSE) 500 की 5% कंपनियों में ही महिला चेयरपर्सन हैं।
देश की राजनीति और देश की कंपनियों में भारत में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन यह वृद्धि अभी भी संतोषजनक नहीं है। दरअसल, महिलाओं को रणनीतिक रूप से अभी भी पुरुषों के मुकाबले कमजोर माना जाता है।