Women Unpaid Work Data: महिलाएं घर और ऑफिस मिलाकर पुरुषों के मुकाबले हर दिन ज्यादा काम करती हैं। इस रिपोर्ट में घरेलू और बिना वेतन वाले काम के असली आंकड़े सामने आए हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट...
Male vs Female Working Hours : मेहनत और काम करने के मामले में आज भी समाज में अक्सर यही माना जाता है कि पुरुष ज्यादा काम करते हैं क्योंकि वो घर के बाहर जाकर पैसे कमाते हैं। लेकिन क्या असल जिंदगी में सच में ऐसा ही है? ओईसीडी (Organisation for Economic Co-operation and Development) रिपोर्ट कि अनुसार दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, महिलाएं हर दिन पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा काम कर रही हैं। फर्क सिर्फ इतना सा है कि पुरुषों को दफ्तर में काम की सैलरी मिलती है, जबकि महिलाओं की दिन-रात की मेहनत को 'फर्ज', 'त्याग' या 'जिम्मेदारी' का नाम देकर उसका कोई मोल नहीं चुकाया जाता।
अक्सर घरों में देखते हैं कि एक नौकरीपेशा महिला सुबह उठकर पूरे परिवार का नाश्ता बनाती है, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती है, फिर ऑफिस भी जाती है। ऑफिस में 8 से 9 घंटे काम करने के बाद जब वो वापस घर लौटती है, तो उसके आराम का समय शुरू नहीं होता, बल्कि उसकी 'दूसरी शिफ्ट' शुरू हो जाती है। रात का खाना बनाना, घर की सफाई और अगले दिन की तैयारी। वहीं दूसरी तरफ, एक पुरुष जब ऑफिस से थका-हारा घर आता है, तो उसे एक कप चाय और सोफे पर आराम चाहिए होता है।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले पुरुषों और महिलाओं के काम करने के घंटों का हिसाब लगाया है। इस रिपोर्ट में काम को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहला 'पेड वर्क' वो काम जिसके बदले पैसे या सैलरी मिलती है और दूसरा 'अनपेड वर्क' घरेलू काम जिसके बदले एक रुपया भी नहीं मिलता।
आंकड़ों के मुताबिक, एशियाई देशों में एक पुरुष दिन भर में औसतन 470 मिनट काम करता है। इसमें से 410 मिनट वो 'पेड वर्क' पैसे कमाने वाले काम में लगाता है और घर के काम (अनपेड वर्क) में सिर्फ 60 मिनट देता है। पूरे 24 घंटे में घर के कामों के लिए सिर्फ 1 घंटे का समय देता है। एशियाई देशों में एक महिला हर दिन औसतन 512 मिनट काम करती है, जो पुरुषों से काफी ज्यादा है। महिला अपने दिन के 259 मिनट ऑफिस या पैसे कमाने वाले काम में लगाती है और 252 मिनट करीब 4 घंटे से ज्यादा घर के बिना वेतन वाले काम में खपा देती है। एशियाई महिलाएं पुरुषों के मुकाबले घर और बाहर दोनों जगह चक्की की तरह पिस रही हैं। घर की जिम्मेदारी का लगभग पूरा बोझ उन्हीं के कंधों पर है।
अमेरिका, कनाडा या यूरोप जैसे विकसित और पढ़े-लिखे देशों में लगता है महिला पुरुष बराबर हिशों में काम करती होगी पर ऐसा नहीं है। वहां भी बिना सैलरी वाले काम का बोझ महिलाओं पर ही ज्यादा है। यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका) और कनाडा की में महिलाएं हर दिन औसतन 484 मिनट काम करती हैं, जबकि पुरुष 477 मिनट काम करते हैं। अमेरिका और कनाडा के पुरुष पैसे वाले काम में 330 मिनट और घर के काम में 147 मिनट देते हैं। वहीं, महिलाएं पैसे वाले काम में 258 मिनट और घर के काम में 226 मिनट देती हैं। यहां के पुरुष एशियाई पुरुषों के मुकाबले घर के कामों में ज्यादा हाथ बंटाते हैं 60 मिनट के मुकाबले 147 मिनट, लेकिन फिर भी महिलाओं के 226 मिनट के सामने वो काफी पीछे हैं।
यूरोप के विकसित देशों में भी महिलाओं पुरुषों से ज्यादा काम कर रही हैं। आंकड़ों के अनुसार महिलाएं हर दिन करीब 472 मिनट काम में बिताती हैं, जिसमें से 210 मिनट के उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन 262 मिनट का काम अनपेड होता है। दूसरी ओर, पुरुष दिन भर में कुल 438 मिनट काम करते हैं, जिसमें उनका ज्यादातर समय 296 मिनट पेड वर्क में जाता है और घर के अनपेड कामों में वे सिर्फ 141 मिनट ही देते हैं। यूरोप के विकसित देशों में भी दिन भर की भागदौड़ और घर-ऑफिस की दोहरी जिम्मेदारी उन्हें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा थका रही है।
पूरी दुनिया के आंकड़ों में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का हिस्सा थोड़ा अच्छा है, पर इन दोनों देशों में पुरुष हर दिन औसतन 477 मिनट और महिलाएं 476 मिनट काम करती हैं। दोनों का ही कुल काम का समय लगभग बराबर है। लेकिन, जब काम को 'सैलरी वाले' और 'बिना सैलरी वाले' हिस्सों के आधार पर देखा गया तो पुरुष 321 मिनट पैसे वाले काम और 156 मिनट घर के काम में लगाते हैं। वहीं, महिलाएं 189 मिनट पैसे वाले काम में और 288 मिनट घर के काम में लगाती हैं। लेकिन घर के बर्तन धोने, कपड़े साफ करने और बच्चों को संभालने जैसे 'फ्री' के कामों में महिलाएं ही आगे हैं।
महिलाएं सुबह घर के सारे काम निपटाने के बाद दिन भर ऑफिस में काम करती हैं। वह ऑफिस से लौटने के बाद घर आकर भी दोबारा घंटों काम करती है। इस दोहरी जिम्मेदारी का सबसे बुरा असर महिलाओं की शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। लगातार काम के बोझ से वो तनाव और थकान की शिकार हो रही हैं। घर के काम का इतना ज्यादा बोझ होने की वजह से कई महिलाएं अपने करियर पर सही से फोकस नहीं कर पातीं। जब एक पुरुष ऑफिस के बाद अपना समय नई चीजें सीखने या अपने करियर को आगे बढ़ाने में लगाता है, तब एक महिला रसोई में अगले दिन के टिफिन की तैयारी कर रही होती है। इसी वजह है कि बड़ी-बड़ी कंपनियों में ऊंचे पदों पर महिलाओं की संख्या आज भी पुरुषों के मुकाबले कम देखने को मिलती है।