
आजकल AI शब्द हर नए स्मार्टफोन के लॉन्च इवेंट में बार-बार सुनाई देता है। फोन के कैमरे में AI, बैटरी में AI और यहां तक कि सर्च करने के तरीके में भी AI हो गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या 'सर्कल टू सर्च', 'मैजिक एडिटर' और 'ऐड मी' जैसे फीचर वाकई रोजमर्रा की जिंदगी आसान बना रहे हैं? ये फीचर सिर्फ नए फोन बेचने के लिए चालाकी से दिखाई गई मार्केटिंग गिमिक (Gimmick) तो नहीं है? आइए इसकी सच्चाई समझते हैं।
स्मार्टफोन में गूगल का 'सर्कल टू सर्च' फीचर अब सिर्फ किसी चीज को सर्च करने का टूल नहीं रह गया, बल्कि एक पूरा AI सहायक बन चुका है। इसकी मदद से किसी पोस्टर, वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट में दिखने वाले दूसरी भाषा के टेक्स्ट को बिना कॉपी किए तुरंत अनुवाद किया जा सकता है। इसके साथ ही पूरा पेज या स्क्रीन एक साथ ट्रांसलेट किया जा सकता है। यहां तक कि किसी संदिग्ध मैसेज या ऑफर को चेक कर उसकी सच्चाई भी परखी जा सकती है। यह दिखाता है कि रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों में यह फीचर वाकई समय बचाता है, बशर्ते यूजर को इसका सही इस्तेमाल आता हो।
इसी तरह फोन में मौजूद गूगल फोटोज का 'मैजिक एडिटर' फीचर तस्वीरों में जटिल एडिटिंग को आसान बनाता है। बैकग्राउंड से अनचाही चीजें हटाना, किसी वस्तु की जगह बदलना या फोटो के हिस्सों को फिर से बनाना, यह सब कुछ टैप में हो जाता है। इसी तरह पिक्सल फोन का 'ऐड मी' फीचर ग्रुप फोटो में फोटो खींचने वाले व्यक्ति को भी AI की मदद से तस्वीर में शामिल कर देता है, ताकि कोई पीछे न छूटे।
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या, फोन के फीचर्स की उपयोगिता में नहीं, बल्कि उनके इस्तेमाल के पैटर्न में है। फ्लिपकार्ट और काउंटरपॉइंट रिसर्च की संयुक्त रिपोर्ट 'स्मार्टफोन इनसाइट्स रिपोर्ट 2026' में सामने आया है कि लगभग 89 प्रतिशत लोग अब कैमरा या बैटरी जैसे पारंपरिक स्पेसिफिकेशन की बजाय AI फीचर्स देखकर फोन खरीदने का फैसला ले रहे हैं। यूजर्स अब स्पेसिफिकेशन-आधारित नहीं बल्कि, अनुभव-आधारित फैसले ले रहे हैं। इसका सीधा फायदा उठाते हुए मोबाइल कंपनियां अपने हर फोन में एक से बढ़कर एक AI फीचर जोड़ने लगी हैं, चाहे उनकी वास्तविक उपयोगिता कितनी भी सीमित क्यों न हो।
तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि कई फीचर सिर्फ लॉन्च इवेंट की स्लाइड पर आकर्षक लगने के लिए बनाए जाते हैं, जबकि असल इस्तेमाल में औसत यूजर उन्हें महीने में शायद ही एक-दो बार छूता है। खासतौर पर सस्ते और मिड-रेंज फोन में AI का नाम सिर्फ ब्रांडिंग टूल की तरह इस्तेमाल हो रहा है, ताकि प्रीमियम फोन जैसा अनुभव देने का भ्रम पैदा किया जा सके।
नए-नए AI फीचर्स का असर सीधे तौर पर फोन की कीमतों पर पड़ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेमोरी चिप्स की वैश्विक कमी और AI इंडस्ट्री की बढ़ती मांग के चलते भारत में सस्ते फोन मिलना मुश्किल होता जा रहा है, जिसके असर से 2026 की शुरुआत में भारत में स्मार्टफोन बिक्री में करीब 9 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। अगली पीढ़ी के फ्लैगशिप फोन की बढ़ती कीमतों की मुख्य वजह डिजाइन या मैन्युफैक्चरिंग नहीं, बल्कि AI की बढ़ती वैश्विक मांग के चलते हाई-परफॉर्मेंस मेमोरी चिप्स (DRAM) की कमी है। यानी फोन में AI फीचर जोड़ने की होड़ सीधे तौर पर उसकी लागत और अंतिम कीमत दोनों को बढ़ा रही है। भले ही ग्राहक उन फीचर का इस्तेमाल करे या न करे।
तकनीकी विशेषज्ञों की सलाह है कि फोन खरीदते समय सिर्फ लंबी फीचर लिस्ट से प्रभावित होने की बजाय यह जांचना जरूरी है कि कौन-से AI फीचर वाकई रोजमर्रा के इस्तेमाल में काम आएंगे? इसके अलावा कस्टमर्स को अपने बजट का ध्यान रखते हुए आने वाले महीनों में फेस्टिव सेल और ऑनलाइन ऑफर्स के दौरान स्मार्टफोन खरीदना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। अब खरीदारों को कीमत के साथ-साथ फीचर की वास्तविक उपयोगिता पर भी ज्यादा ध्यान देना चाहिए।