
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेज रफ्तार तरक्की ने दुनिया भर में नई चुनौतियों को जन्म दे दिया है। AI के बढ़ते दौर में सवाल है कि क्या सचमुच मशीनें बड़े पैमाने पर व्हाइट-कॉलर नौकरियों को खा रही हैं? क्या AI सिर्फ कंपनियों के लिए छंटनी को जायज ठहराने का एक सुविधाजनक बहाना बन गया है? ऐसे सवालों के जवाब कुछ आंकड़े और विशेषज्ञों की राय से मिल सकता है।
अमेरिका में Challenger, Gray & Christmas की ट्रैकिंग के अनुसार, 2023 से अब तक विभिन्न कंपनियों ने 71,800 से अधिक नौकरी कटौतियों के लिए सीधे तौर पर AI को कारण बताया है। मार्च 2026 में पहली बार AI किसी एक महीने में छंटनी का सबसे बड़ा कारण बना, जो उस महीने की कुल कटौतियों का करीब 25 प्रतिशत रहा।
साल 2026 के शुरुआती 4 महीनों में अकेले अमेरिका में AI को 49,135 नौकरी कटौतियों की वजह बताया गया। वहीं, टेक सेक्टर में 2025 में 1,54,000 से ज्यादा छंटनियां हुईं, जो 2024 के मुकाबले 15 प्रतिशत ज्यादा हैं, क्योंकि कंपनियों ने बजट AI डेवलपमेंट की ओर मोड़ना शुरू कर दिया।
कई कंपनियों ने छंटनी के लिए सीधे तौर पर AI को कारण बताया है। भारत भी इस लहर से अछूता नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार Cognizant कंपनी के करीब 2.5 लाख कर्मचारी भारत में हैं। यह कंपनी करीब 12,000 से 15,000 कर्मचारियों की वैश्विक छंटनी पर विचार कर रही है। इसका बड़ा असर भारत में ही देखा जा सकता है। इसी तरह Oracle की योजना के तहत भी करीब 12,000 भारतीय नौकरियों पर खतरा बताया जा रहा है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 6 बड़ी IT कंपनियों में बीते 3 वर्षों में करीब 64,000 नौकरियों की कटौती हुई है। नौकरियों हुई इस कटौती को AI रिप्लेसमेंट से जोड़कर देखा जा रहा है।
जनवरी 2026 में हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू ने 1,006 वैश्विक अधिकारियों के सर्वेक्षण पर आधारित रिपोर्ट में पाया कि केवल 2 प्रतिशत संगठनों ने बड़े पैमाने पर कर्मचारी कटौती को वास्तविक AI क्रियान्वयन से जोड़ा। बाकी अधिकांश मामलों में कंपनियां भविष्य में AI के असर की आशंका को देखते हुए धीमी हायरिंग कर रही हैं या छंटनी कर रही हैं। इसलिए आंकड़ों को पूरी सच्चाई मान लेना जल्दबाजी होगी।
इसी तरह अमेरिका में गैलप के एक सर्वे में पाया गया कि छंटनी झेलने वाले सिर्फ 1 प्रतिशत कर्मचारियों ने ही AI या ऑटोमेशन को अपनी नौकरी जाने का प्रमुख कारण बताया, जबकि 62 प्रतिशत छंटनी झेलने वाले वास्तव में AI का नियमित उपयोग ही नहीं करते थे। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के 'ग्लोबल मैक्रो रिसर्च निदेशक बेन मे' ने भी कहा है कि ज्यादातर नियोक्ता बड़ी संख्या में कर्मचारियों को AI से बदलते नहीं दिख रहे हैं। कुछ कंपनियां छंटनी को जायज ठहराने के लिए AI को महज बहाना बना रही हो सकती हैं।
विश्व आर्थिक मंच (WEF) के अनुमान के अनुसार, 2030 तक वैश्विक स्तर पर 9.2 करोड़ नौकरियां विस्थापित हो सकती हैं। हालांकि, इसी अवधि में 17 करोड़ नई नौकरियां भी बनेंगी। यानी शुद्ध रूप से 7.8 करोड़ नौकरियों की वृद्धि हो सकती है। मैकिन्जी का अनुमान है कि वैश्विक कार्यबल के करीब 14 प्रतिशत यानी 37.5 करोड़ कर्मचारियों को अपने करियर बदलने पड़ सकते हैं।
भारत के संदर्भ में विशेषज्ञों का आकलन है कि जनरेटिव AI से अर्थव्यवस्था में हर साल करीब 0.8 प्रतिशत अतिरिक्त उत्पादकता वृद्धि हो सकती है। टेक सेक्टर में इससे 10 लाख नई नौकरियां भी बन सकती हैं। सबसे ज्यादा खतरा उन कामों को है, जिनमें दोहराव वाले, नियम-आधारित कार्य ज्यादा हैं। जैसे- डेटा एंट्री, बहीखाता (बुककीपिंग), पेरोल क्लर्क और प्रशासनिक सहायक जैसी भूमिकाएं। शारीरिक श्रम से जुड़े कामों पर AI का असर अपेक्षाकृत कम है।
AI क्षेत्र में अग्रणी कंपनी एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने मार्च 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में आगाह किया कि श्रम बाजार पर AI का असर अभी उसकी वास्तविक क्षमता का एक छोटा-सा हिस्सा भर है। यानी AI उपकरण जितना कर सकते हैं, उसकी तुलना में अभी बहुत कम कामों में उनका इस्तेमाल हो रहा है। यह अंतर आने वाले समय में और तेजी से घट सकता है।
AI के 'गॉडफादर कहे जाने वाले वैज्ञानिक जेफ्री हिंटन ने चेतावनी दी है कि AI हर करीब 7 महीने में दोगुनी क्षमता के जटिल कार्य कर पाने में सक्षम हो रहा है। आने वाले वर्षों में यह महीनों तक चलने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग परियोजनाओं को भी अकेले पूरा कर सकेगा, जिससे बहुत कम लोगों की जरूरत रह जाएगी।
विशेषज्ञों की राय है कि यह बहस अब 'क्या AI असर डालेगा' से आगे बढ़कर 'कब और कितनी गहराई से' पर केंद्रित हो चुकी है। जो कर्मचारी नई तकनीकों को जल्दी सीखते हैं, निगरानी व निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में ढलते हैं और डेटा साक्षरता, संचार कौशल तथा AI उपकरणों के साथ काम करने की क्षमता विकसित करते हैं, उनके टिके रहने की संभावना ज्यादा है। कुल मिलाकर तस्वीर मिली-जुली है। AI कुछ नौकरियां जरूर खत्म कर रहा है। लेकिन अवसर भी पैदा कर रहा है। असली चुनौती यह होगी कि क्या श्रमिक और नीति-निर्माता इस बदलाव के साथ उतनी ही तेजी से तालमेल बिठा पाते हैं।