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युवाओं में Co-working और Co-living कल्चर का क्रेज, क्या है इस बड़े बदलाव की वजह?

शहरों में रहने वाले आधुनिक दौर के युवाओं की जीवनशैली (Urban Lifestyle) तेजी से बदल रही है। पेशेवर युवा 'को-वर्किंग' (Co-working) और 'को-लिविंग' (Co-living) कल्चर को तेजी से अपना रहे हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 11, 2026

young professional lifestyle

सांकेतिyoung professional lifestyleक फोटो (सोर्स-Chatgpt)

भारत के बड़े महानगरों (टियर-1) से लेकर अब उभरते हुए छोटे और मध्यम शहरों (टियर-2) तक में युवाओं की जीवनशैली में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक रूप से अपना मकान खरीदने या लंबे समय के लिए फ्लैट किराए पर लेने की पुरानी सोच अब पीछे छूट रही है। इसकी जगह युवाओं, विशेषकर कामकाजी पेशवरों (Professionals) और स्टार्टअप संस्कृति से जुड़े लोगों के बीच 'को-वर्किंग' (Co-working) और 'को-लिविंग' (Co-living) कल्चर तेजी से बढ़ा है।

आज की युवा पीढ़ी इस लचीले, किफायती और कम्युनिटी-ड्रिवेन लाइफस्टाइल को दिल से अपना रही है। मौजूदा दौर में 'को-वर्किंग' और 'को-लिविंग' केवल कुछ समय का ट्रेंड नहीं है, बल्कि यह बदलते भारत की नई शहरी संस्कृति का एक स्थायी हिस्सा बन चुका है। यह जीवनशैली इस बात का प्रमाण है कि आज की युवा पीढ़ी भौतिक संपत्ति जोड़ने की बजाय अनुभवों, स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व (Co-existence) को अधिक महत्व दे रही है।

को-लिविंग (Co-living): घर जैसी आत्मीयता और आधुनिक सुविधाएं

पारंपरिक रूप से किराए का मकान ढूंढना, ब्रोकरेज देना, एडवांस चुकाना और फर्नीचर की व्यवस्था करना एक थकाने वाली प्रक्रिया रही है। इस परेशानी से मुक्ति पाने के लिए देश के महानगरों जैसे बेंगलुरु, मुंबई, पुणे, गुरुग्राम के साथ-साथ अब जयपुर, इंदौर, कोच्चि और अहमदाबाद जैसे टियर-2 शहरों में भी 'को-लिविंग' स्पेस का कॉन्सेप्ट बूम पर है।

रियल एस्टेट कंसल्टेंसी फर्म 'नाइट फ्रैंक' (Knight Frank) और विभिन्न उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, शहरी युवाओं में बिना किसी झंझट के रेडी-टू-मूव और पूरी तरह से सुसज्जित (Fully Furnished) घरों की मांग में भारी उछाल आया है। को-लिविंग स्पेस में युवाओं को रहने के लिए कमरा या बेड तो मिलता ही है।

इसके साथ ही हाउसकीपिंग, वाई-फाई, लांड्री, जिम, गेमिंग जोन और साझा रसोई जैसी सुविधाएं भी एक ही छत के नीचे मिल जाती हैं। इसके अलावा, इसका सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक पहलू 'एकाकीपन (Loneliness) से मुक्ति' है। बड़े शहरों में घर से दूर रहने वाले युवा जब एक कम्युनिटी में रहते हैं, तो विभिन्न वीकेंड एक्टिविटीज, मूवी नाइट्स और नेटवर्किंग से उनका सामाजिक दायरा भी मजबूत होता है।

को-वर्किंग: वर्क फ्रॉम होम की बोरियत से मुक्ति और नेटवर्किंग

कोविड महामारी के बाद 'वर्क फ्रॉम होम' और 'हाइब्रिड वर्क मॉडल' ने जब रफ्तार पकड़ी, तो अकेले घर के एक कोने में बैठकर काम करना कई लोगों के लिए मानसिक थकान का कारण बन गया। यहीं से 'को-वर्किंग स्पेस' यानी साझा दफ्तरों की संस्कृति मुख्यधारा में आई। आधिकारिक उद्योग डेटा और फ्लेक्सी-स्पेस ऑपरेटर्स के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में फ्लेक्सिबल वर्कस्पेस मार्केट पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड गति से बढ़ा है।

वीक्वर्क (WeWork), Awfis, Smartworks और Stanza Living जैसे बड़े ब्रांड्स अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि टियर-2 शहरों में भी अपने नए केंद्र खोल रहे हैं। को-वर्किंग स्पेस युवाओं को कॉर्पोरेट स्तर की बुनियादी सुविधाएं बेहद किफायती मासिक या दैनिक किराए पर उपलब्ध कराते हैं। तेज गति का इंटरनेट, मीटिंग रूम्स, प्रिंटर, कैफे और सबसे बढ़कर एक जीवंत कॉर्पोरेट माहौल युवाओं को आकर्षित कर रहा है।

युवाओं के बीच इस बदलाव के प्रमुख कारण


आर्थिक लचीलापन (Financial Flexibility): आज के युवा भारी-भरकम होम लोन के बोझ तले दबने या भारी डिपॉजिट (सुरक्षा निधि) देने के पक्ष में नहीं हैं। को-वर्किंग और को-लिविंग ‘पे-एज-यू-गो’ (Pay-as-you-go) मॉडल पर काम करते हैं, जिससे वित्तीय प्रबंधन आसान हो जाता है।

मोबिलिटी और फ्रीडम: आधुनिक युवा अपने करियर में गतिशीलता (Mobility) पसंद करते हैं। उन्हें जब नौकरी बदलने या दूसरे शहर शिफ्ट होने की जरूरत पड़ती है, तो पारंपरिक किराए के मकान को खाली करने का झंझट नहीं उठाना पड़ता। वे आसानी से एक शहर से दूसरे शहर के को-लिविंग या को-वर्किंग स्पेस में शिफ्ट हो सकते हैं।

गिग इकॉनमी और स्टार्टअप बूम: भारत में पिछले कुछ वर्षों में स्टार्टअप्स की बाढ़ आई है और 'गिग वर्कर्स' (फ्रीलांसर्स) की संख्या तेजी से बढ़ी है। छोटे स्टार्टअप्स के लिए अपना खुद का ऑफिस खरीदना या महंगे कमर्शियल रेंट पर लेना असंभव सा होता है, ऐसे में को-वर्किंग स्पेस उनके लिए वरदान साबित हो रहे हैं।

मेंटल वेलनेस और वर्क-लाइफ बैलेंस: आधुनिक जीवनशैली में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ा मुद्दा बन गया है। को-लिविंग और को-वर्किंग दोनों ही जगहें लोगों को एक-दूसरे से जुड़ने, विचार साझा करने और अकेलापन दूर करने का बेहतरीन मंच प्रदान करती हैं।

भविष्य की राह और चुनौतियां

भले ही यह संस्कृति युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हो रही है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। जिसमे व्यक्तिगत निजता (Privacy) का सीमित होना अहम मुद्दा है। कुछ जगहों पर अत्यधिक भीड़भाड़ और अनुबंध की शर्तें भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं। हालांकि, ऑपरेटर इन कमियों को दूर करने के लिए प्रीमियम और कस्टमाइज्ड विकल्प भी बाजार में ला रहे हैं।

मौजूदा दौर में 'को-वर्किंग' और 'को-लिविंग' केवल कुछ समय का ट्रेंड नहीं है, बल्कि यह बदलते भारत की नई शहरी संस्कृति का एक स्थायी हिस्सा बन चुका है। यह जीवनशैली इस बात का प्रमाण है कि आज की युवा पीढ़ी भौतिक संपत्ति जोड़ने की बजाय अनुभवों, स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व (Co-existence) को अधिक महत्व दे रही है।