
सांकेतिक फोटो (सोर्स-Chatgpt)
स्पेस टेक्नोलॉजी में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब सिर्फ इसरो के भरोसे नहीं चल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में निजी कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी ने स्पेस टेक्नोलॉजी की तस्वीर बदल दी है। अब यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक नए और तेजी से उभरते अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
हैदराबाद स्थित स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस के ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 की सफल उड़ान को भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक गेमचेंजर पल माना जा रहा है। अब तक अंतरिक्ष प्रक्षेपण की जिम्मेदारी मुख्यतः ISRO निभाता था, लेकिन विक्रम-1 ने साबित कर दिया कि भारतीय निजी कंपनियां भी विश्वस्तरीय रॉकेट बना सकती हैं। इससे तकनीकी को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने के लिए सरकार ने 500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड भी शुरू किया है।
साल 2020 में सरकार ने स्पष्ट किया कि इसरो का काम अब सिर्फ अपने मिशन चलाना नहीं, बल्कि निजी उद्योग को तकनीक, परीक्षण सुविधाएं और विशेषज्ञता उपलब्ध कराना भी होगा। इसी मकसद से स्वतंत्र नियामक संस्था 'इन-स्पेस' (IN-SPACe) बनाई गई, जबकि इसरो की व्यावसायिक शाखा 'न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड' (NSIL) को तकनीकों के व्यावसायीकरण की जिम्मेदारी दी गई।
इंडियन स्पेस पॉलिसी 2023 ने पूरे सेक्टर की वैल्यू चेन निजी कंपनियों के लिए खोल दी है। पहले जो कंपनियां सिर्फ उपकरण और पुर्जे बनाती थीं, अब वे पूरे मिशन डिजाइन और संचालित कर सकती हैं। इसके अलावा सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल और उनके पुर्जे बनाने वाली कंपनियों में अब ऑटोमैटिक रूट से 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश की अनुमति दी जा चुकी है।
भारत में अब 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिससे कंपनियों की संख्या के लिहाज से भारत दुनिया में 5वें स्थान पर है। जुलाई 2026 तक भारत के स्पेस-टेक क्षेत्र में कुल निवेश करीब 871 मिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। वहीं, बीते कुछ वर्षों में स्टार्टअप्स में निजी निवेश करीब 4 गुना बढ़ा है।
इसरो की व्यावसायिक शाखा NSIL की कमाई में भी 10 गुना की भारी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जुलाई 2026 तक NSIL कुल 141 सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है, जिनमें से 138 विदेशी ग्राहकों के लिए थे, जो दुनिया के भारत की लॉन्चिंग क्षमता पर भरोसे को दर्शाता है। केंद्रीय बजट में भी इस भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए NSIL का आवंटन 1,030 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1,403 करोड़ रुपये किया गया है।
CII और KPMG की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र 2022 के 8.4 अरब डॉलर से बढ़कर 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि करीब 5 गुना वृद्धि हुई है। इससे वैश्विक स्पेस इकॉनमी में भारत की हिस्सेदारी मौजूदा 2-3 प्रतिशत से बढ़कर 2033 तक 8 प्रतिशत और 2047 तक 15 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।
अंतरिक्ष क्षेत्र में हर एक डॉलर का निवेश अर्थव्यवस्था में 2.54 डॉलर का प्रभाव पैदा करता है। यानी कि यह भारत के व्यापक उद्योग जगत की तुलना में ढाई गुना अधिक उत्पादक क्षेत्र बन जाता है। बीते दशक में इस क्षेत्र ने GDP में करीब 20,000 करोड़ रुपये का योगदान दिया और करीब 96,000 लोगों को रोजगार भी दिया है।
तेज ग्रोथ के बावजूद भारत के लिए कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम 'नाविक' (NavIC) की सीमित क्षेत्रीय संरचना इसकी अंतरराष्ट्रीय उपयोगिता को सीमित करती है। भू-प्रेक्षण (अर्थ ऑब्जर्वेशन) डेटा के लिए वाणिज्यिक बाजार अब भी अविकसित है, जिसकी वजह उद्यमों में जागरूकता की कमी और बिखरी हुई बाजार मांग है। इसके अलावा निजी क्षेत्र की भागीदारी अभी भी वैश्विक मानकों की तुलना में सीमित मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसरो और निजी कंपनियों के बीच सहयोग का यह मॉडल दीर्घकालिक रूप से फायदेमंद साबित होगा। इसरो गहन अंतरिक्ष अभियानों और वैज्ञानिक अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करेगा, जबकि निजी कंपनियां व्यावसायिक प्रक्षेपण, उपग्रह निर्माण और नई सेवाओं का विस्तार करेंगी। यदि यह रफ्तार बनी रही, तो आने वाले दशक में भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों बल्कि रोजगार और निर्यात के मोर्चे पर भी देश की तरक्की में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
Updated on:
11 Aug 2026 08:05 pm
Published on:
11 Aug 2026 08:05 pm
