
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसी जमीन का है जहां खेती नहीं होती या बहुत सीमित उपयोग होता है। अक्सर लोग हर खाली या अनुपयोगी जमीन को 'बंजर' कह देते हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में बंजर, परती और अनुपजाऊ जमीन अलग-अलग श्रेणियां हैं। इन्हें समझे बिना भारत की भूमि उपयोग की असली तस्वीर समझना मुश्किल है।
राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) और भूमि संसाधन विभाग द्वारा तैयार वेस्टलैंड एटलस 2019 के अनुसार भारत में लगभग 5.57 करोड़ हेक्टेयर भूमि वेस्टलैंड श्रेणी में आती है। यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि यह पूरी जमीन हमेशा के लिए बेकार है या उस पर कोई उपयोग संभव नहीं है।
यही वह जगह है जहां सबसे ज्यादा भ्रम होता है। बंजर भूमि वह होती है जहां प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण खेती करना बेहद कठिन होता है। जैसे रेगिस्तानी क्षेत्र, पथरीली जमीन, चट्टानी इलाके या अत्यधिक ढलान वाली भूमि।
इसके विपरीत परती भूमि ऐसी कृषि भूमि होती है जिस पर कुछ समय के लिए खेती नहीं की जा रही होती। किसान कभी-कभी मिट्टी को आराम देने, पानी की कमी या आर्थिक कारणों से खेत खाली छोड़ देते हैं। ऐसी जमीन भविष्य में फिर खेती के लिए इस्तेमाल हो सकती है।
वहीं अनुपजाऊ या क्षरित भूमि वह होती है जिसकी उत्पादकता समय के साथ कम हो गई हो। मिट्टी कटाव, जलभराव, लवणीयता, अत्यधिक रासायनिक उपयोग और खनन जैसी गतिविधियां इसकी प्रमुख वजह बनती हैं।
बंजर भूमि → प्राकृतिक रूप से खेती के लिए कठिन
परती भूमि → फिलहाल खेती नहीं हो रही
अनुपजाऊ भूमि → उत्पादकता घट चुकी है
वेस्टलैंड → कम उपयोग या क्षरित भूमि की व्यापक श्रेणी
भारत में इतनी जमीन बंजर क्यों हुई?
भारत में भूमि के खराब होने के पीछे सिर्फ प्राकृतिक कारण जिम्मेदार नहीं हैं। कई मामलों में मानवीय गतिविधियों ने भी स्थिति को बिगाड़ा है।
सबसे बड़ी समस्या मरुस्थलीकरण (Desertification) और मिट्टी का कटाव है। लगातार कटते जंगल, अनियंत्रित चराई, गलत खेती पद्धतियां और भूजल का अत्यधिक दोहन भी भूमि को कमजोर बनाते हैं। कई इलाकों में खनन गतिविधियों ने भी जमीन की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। जानिए क्या हैं कारण…।
भारत में वेस्टलैंड का वितरण समान नहीं है। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों वाले राज्यों में इसका हिस्सा ज्यादा है। राजस्थान और गुजरात में रेगिस्तानी और कम वर्षा वाले इलाके होने के कारण बड़ी मात्रा में भूमि वेस्टलैंड श्रेणी में आती है। वहीं महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी मात्रा में कम उत्पादक या क्षरित भूमि मौजूद है।
इन राज्यों में कारण अलग-अलग हो सकते हैं। कहीं रेगिस्तान है, कहीं पानी की कमी और कहीं मिट्टी का क्षरण।
नहीं। यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। वेस्टलैंड शब्द सुनते ही अक्सर लगता है कि जमीन किसी काम की नहीं है, जबकि ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ भूमि प्राकृतिक घासभूमि, झाड़ीदार क्षेत्र या वन्यजीवों के आवास के रूप में महत्वपूर्ण होती है। यानी हर वेस्टलैंड को खेती या निर्माण में बदल देना सही समाधान नहीं माना जाता। कई बार ऐसी जमीन पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होती है।
कई मामलों में हां। भारत में वर्षों से वॉटरशेड विकास, भूमि सुधार और सिंचाई परियोजनाओं के जरिए खराब हो चुकी भूमि को फिर से उपयोगी बनाने की कोशिशें होती रही हैं। जहां समस्या पानी की कमी या मिट्टी की गुणवत्ता की हो, वहां सुधार की संभावना रहती है।
हालांकि हर बंजर भूमि को खेती योग्य बनाना संभव नहीं होता। कुछ क्षेत्रों की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां इसकी अनुमति नहीं देतीं।
देश में बढ़ती औद्योगिक और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कम उत्पादक भूमि को एक विकल्प के रूप में देखा जाता है। सरकारें अक्सर कोशिश करती हैं कि उपजाऊ कृषि भूमि के बजाय अपेक्षाकृत कम उत्पादक जमीन का उपयोग किया जाए।
राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में बड़े सौर ऊर्जा पार्क ऐसे ही क्षेत्रों में विकसित किए गए हैं।
आज जमीन की स्थिति जानने के लिए सिर्फ पटवारी या जमीनी सर्वे पर निर्भर नहीं रहा जाता। सैटेलाइट तकनीक ने पूरी तस्वीर बदल दी है। सैटेलाइट इमेजरी और GIS मैपिंग की मदद से यह देखा जाता है कि किसी क्षेत्र में वनस्पति कितनी है, जमीन का उपयोग कैसे हो रहा है और समय के साथ उसमें क्या बदलाव आया है। इसी आधार पर वेस्टलैंड एटलस और भूमि उपयोग के नक्शे तैयार किए जाते हैं।
भारत में करोड़ों हेक्टेयर भूमि ऐसी है जिसे वेस्टलैंड या कम उत्पादक भूमि माना जाता है। लेकिन यह पूरी जमीन बेकार नहीं है। कुछ हिस्से प्राकृतिक रूप से अनुपयुक्त हैं, कुछ को सुधारकर खेती योग्य बनाया जा सकता है और कुछ ऊर्जा या औद्योगिक परियोजनाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।