
अक्सर रेलवे स्टेशन, बस अड्डों या बाजार या फिर अखबारों के पन्नों पर "गुमशुदा की तलाश…" वाले पोस्टर दिख जाते हैं। ये दरअसल, एकाध घटना नहीं है। आंकड़े बता रहे हैं कि देश में हर घंटे 24 लोग लापता होते हैं।
भारत में लापता व्यक्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। हालिया आंकड़े और मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि यह समस्या क्यों बढ़ रही है, इसमें कौन-कौन से कारक योगदान दे रहे हैं, और इससे आम नागरिकों को क्या सीख मिलती है।
2024 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल 5,20,164 लोग लापता हुए - जिसमें 1,67,414 पुरुष, 3,52,729 महिलाएं और 21 ट्रांसजेंडर शामिल हैं। यह संख्या 2023 की तुलना में 7.3 प्रतिशत अधिक है, जबकि बच्चों के मामलों में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।
दिल्ली में जनवरी 2026 के करीब पंद्रह से बीस दिनों में 807 लोग लापता हुए - जिनमें 509 महिलाएं और लड़कियां तथा 191 नाबालिग शामिल हैं। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि यह कोई असामान्य वृद्धि नहीं है और कुल मिलाकर मामलों की संख्या पिछले वर्षों के औसत के आसपास ही बनी हुई है।
एनएचआरसी ने बिहार, ओडिशा, तेलंगाना, महाराष्ट्र और राजस्थान में मानव तस्करी और लापता मामलों की बढ़ती संख्या पर संज्ञान लेते हुए इन राज्यों के मुख्य सचिवों और डीजीपी को दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
समाजशास्त्रीय और प्रशासनिक दोनों तरह के कारण इस समस्या को बढ़ा रहे हैं:
यह समस्या केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है - यह हर परिवार, हर समुदाय को प्रभावित कर सकती है। यदि कोई लापता होता है, तो तुरंत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना, पहचान पत्र सुरक्षित रखना और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
एनएचआरसी की रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि राज्यों ने क्या उपाय किए हैं। साथ ही, NCRB की अगली ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट में 2025–26 के आंकड़े आने पर यह समझना आसान होगा कि क्या सुधार हो रहा है या नहीं।
यह समस्या केवल सरकार की नहीं है - यह समाज की भी जिम्मेदारी है। हर नागरिक को सतर्क रहना होगा, लापता मामलों में सहयोग करना होगा, और बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा के लिए मिलकर काम करना होगा।