
किसानों और ग्रामीण पंचायतों के लिए यह जानना अब और भी जरूरी हो गया है कि खेतों में उगने वाली फसलें भूख मिटाने तक सीमित नहीं रह गई हैं। अब उनमें पोषण भी भरा जा रहा है। अब भारत में बायोफोर्टिफाइड फसलें तेजी से अपनाई जा रही हैं। इनमें जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे आयरन, जिंक और प्रोटीन पहले से अधिक मात्रा में होते हैं।
भारत में अब तक कई बायोफोर्टिफाइड किस्में विकसित की जा चुकी हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने पिछले वर्षों में कई बायोफोर्टिफाइड किस्में विकसित की हैं। ICAR के तहत 2014–2024 के बीच कुल 152 बायोफोर्टिफाइड किस्में तैयार की गईं, जिनमें चावल, गेहूं, मक्का, मिलेट्स, तेलबीन और दालें शामिल हैं।
कुछ विशेष किस्मों में शामिल हैं:
बायोफोर्टिफाइड फसलें पोषण सुरक्षा के लिए स्थायी और किफायती उपाय हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा स्वीकृत अन्य उपायों की तुलना में, बायोफोर्टिफिकेशन खेत से सीधे पोषण बढ़ाता है और अतिरिक्त लागत की जरूरत नहीं होती।
इसके अलावा, एक अध्ययन में सामने आया कि महाराष्ट्र के ग्रामीण स्कूलों में आयरन-समृद्ध बाजरा खाने से बच्चों में आयरन की कमी कम हुई और शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ी। अंतरराष्ट्रीय मक्का और गेहूं सुधार केंद्र (CIMMYT) और साझेदारों द्वारा विकसित हाई-जिंक गेहूं अब उत्तर-पश्चिमी भारत में उगाया जा रहा है, जिससे लाखों लोग लाभान्वित हो रहे हैं।
HarvestPlus ने 2011 से भारत में ICAR, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर बायोफोर्टिफाइड फसलों का विकास और प्रचार-प्रसार किया है। 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन फसलों का समर्थन किया, और ICAR ने अपने Frontline Demonstrations में 10% हिस्सेदारी बायोफोर्टिफाइड गेहूं और चावल को दी।
बिहार और ओडिशा सरकारों ने जिंक गेहूं, जिंक चावल और आयरन मसूर को “पोषण गांव” मॉडल के तहत बढ़ावा दिया है। ICAR ने किसानों तक बीज पहुंचाने के लिए Seed Village Programme और SMSP के तहत योजनाएं लागू की हैं। जुलाई 2026 में ICAR ने पिछले एक वर्ष में 386 उन्नत फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें से 29 बायोफोर्टिफाइड हैं।
बायोफोर्टिफाइड फसलें: