
Body shaming self esteem: क्या आपने कभी सोचा है कि दूसरों के शरीर को लेकर की गई आपकी टिप्पणी या मजाक कैसे सामने वाले के मन की शांति और मेंटल हेल्थ से लेकर उसकी पर्सनलिटी को प्रभावित कर देती है? ऐसे कई केस सामने आते हैं, क्योंकि शरीर की आलोचना चाहे वह वजन, रंग, ऊंचाई, चेहरे की बनावट या किसी अन्य शारीरिक विशेषता पर हो, आज की तेज-तर्रार दुनिया में एक आम, लेकिन गहरा असर छोड़ने वाला अनुभव बन चुका है।
सोशल मीडिया, परिवार, दोस्तों या कॉलेज के माहौल में यह टिप्पणियां अक्सर मजाक या 'फिक्र' के नाम पर की जाती हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा दर्द और मानसिक प्रभाव अक्सर अनदेखा रह जाता है। यहां जानिए यह दबाव कैसे काम करता है, इसका असर क्या होता है और हम इससे कैसे निपट सकते हैं?
कई शोध बताते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों पर सोशल मीडिया (जैसे इंस्टाग्राम, स्नैपचैट) और कॉलेज के माहौल में शरीर की आलोचना ने चिंता, आत्म-संदेह और आत्म-मूल्य में कमी जैसे प्रभाव डाले हैं। इस अध्ययन में 30 छात्रों की पांच समूह चर्चाओं से यह सामने आया कि सोशल मीडिया की सजाई गई छवियां और कॉलेज में 'मजाक' के नाम पर होने वाली टिप्पणियां आत्म-छवि को गहराई से प्रभावित करती हैं।
सामाजिक मानदंडों और कलंक की जड़ें भी गहरी हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एक समाजशास्त्रीय अध्ययन में बताया गया है कि शरीर की आलोचना केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण का एक रूप है, जो आत्म-शर्म और सामाजिक बहिष्कार को जन्म देता है।
वैश्विक स्तर पर भी यह समस्या गंभीर मानी जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ (APA) अब शरीर की छवि से जुड़ी परेशानियों को मानसिक स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण कारक मानते हैं। ICD‑11 (अंतर्राष्ट्रीय रोग वर्गीकरण) ने बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर और वजन से जुड़े कलंक को मानसिक और व्यवहार संबंधी विकारों की श्रेणी में शामिल किया है।
भारत में किशोर और युवा वर्ग इस दबाव से सबसे अधिक प्रभावित हैं। तमिलनाडु के एक अध्ययन में ग्रामीण युवतियों ने बताया कि सांस्कृतिक अपेक्षाएं और मीडिया की छवियां उनके आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती हैं।
केरल के एक अध्ययन में पाया गया कि 60 युवाओं में से आधे से अधिक लोग रोजमर्रा की जिंदगी में बॉडी शेमिंग का सामना करते हैं, जिससे उनकी सामाजिक उपस्थिति को लेकर चिंता और मानसिक अस्वस्थता जुड़ी हुई है।
एक अन्य अध्ययन में 20-30 वर्ष के युवाओं ने बताया कि शरीर की आलोचना ने उनकी आत्म-स्वीकृति और जीवन संतुष्टि को प्रभावित किया और मीडिया ने इस चक्र को और गहरा किया। इसे शोध में 'विषाक्त चक्र' कहा गया है।
यह जानना जरूरी है कि शरीर की आलोचना से निपटना संभव है और इसमें कुछ ठोस, व्यावहारिक कदम मददगार साबित हो सकते हैं-
कहना होगा कि शरीर की आलोचना एक गहरा मानसिक प्रभाव छोड़ने वाला सामाजिक दबाव है, लेकिन इससे निपटना संभव है। जब हम अपने विचारों को पहचानते हैं, खुद के प्रति दया रखते हैं, सकारात्मक माहौल बनाते हैं और मनोवैज्ञानिक सहायता लेते हैं, तो हम इस दबाव को तोड़ सकते हैं।
तो आपका अगला कदम हो सकता है कि आप किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें, माइंडफुलनेस अभ्यास शुरू करें या किसी थेरेपिस्ट से संपर्क करें। यह सफर धीरे-धीरे शुरू होता है, लेकिन हर कदम आपके आत्मसम्मान और मानसिक शक्ति को मजबूत करता है।