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भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम लागू: अक्टूबर से शुरू हो सकती है ट्रेडिंग, क्या होगा असर?

भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम लागू हो गई है। इसके साथ ही देश के उद्योग जगत में जलवायु प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। आइए जानते हैं क्या हैं सरकार के नियम और इससे क्या असर पड़ेगा?
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Aug 11, 2026
Carbon Credit Trading Scheme implemented
सांकेतिक फोटो (सोर्स-Chatgpt)

भारत की जलवायु नीति एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। ऊर्जा दक्षता आधारित 'परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड' (PAT) योजना की जगह अब देश में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन आधारित 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' (CCTS) लागू हो रही है, जिसके तहत भारतीय कार्बन बाजार (Indian Carbon Market- ICM) का दायरा हर महीने बढ़ रहा है। ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के तहत 2023 में अधिसूचित यह योजना अब क्रियान्वयन के अहम चरण में पहुंच चुकी है। इसके साथ ही देश की बड़ी कंपनियां नेट-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने की दौड़ में शामिल हो गई हैं।

7 ऊर्जा-गहन क्षेत्रों के लिए GEI लक्ष्य अधिसूचित

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने दो चरणों में सात ऊर्जा-गहन क्षेत्रों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता (GEI) लक्ष्य अधिसूचित किए हैं। अक्टूबर 2025 में एल्युमिनियम, सीमेंट, क्लोर-अल्कली और पल्प एंड पेपर क्षेत्रों को शामिल किया गया, जबकि जनवरी 2026 में पेट्रोलियम रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स और वस्त्र उद्योग को इस दायरे में लाया गया। इसके साथ ही योजना के अंतर्गत बाध्य इकाइयों की संख्या बढ़कर करीब 490 हो गई है, जो देश के सबसे अधिक उत्सर्जन वाले औद्योगिक क्षेत्रों को कवर करती हैं।

जल्द ही लौह-इस्पात क्षेत्र के लक्ष्य भी अधिसूचित होने की उम्मीद है, हालांकि उर्वरक क्षेत्र के लक्ष्य फिलहाल रोके गए हैं। पहले की PAT योजना में हर 3 साल में एक चक्र पूरा होता था, जबकि CCTS के तहत अनुपालन चक्र सालाना है। यानी हर साल आंकड़ों का संकलन, सत्यापन और कारोबार तीनों चरण पूरे किए जाने हैं। BEE ने 'प्रकृति 2026' सम्मेलन तक 9 मेथडोलॉजी अधिसूचित कर दी थीं और बायोगैस, हाइड्रोजन तथा वनीकरण जैसी परियोजनाओं में 40 से अधिक इकाइयां पंजीकरण या आवेदन की प्रक्रिया में शामिल हो चुकी थीं।

भारतीय कार्बन बाजार पोर्टल लॉन्च

मई 2026 में मुंबई में हुई दो-दिवसीय क्षमता-निर्माण कार्यशाला में BEE ने अनुपालन बाजार के लिए मूल्य-निर्धारण की कवायद पर भी काम जारी होने की जानकारी दी। क्रियान्वयन को गति देने के लिए बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने 21 मार्च 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 'प्रकृति 2026' अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाज़ार सम्मेलन में भारतीय कार्बन बाजार पोर्टल लॉन्च किया। यह पोर्टल इकाइयों के पंजीकरण से लेकर कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट जारी करने, सत्यापन और अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजारों से जुड़ाव तक की पूरी प्रक्रिया के लिए डिजिटल रीढ़ का काम करेगा।

कार्बन क्रेडिट की संभावित कीमत 10-15 डॉलर प्रति टन

ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी के अनुसार, पहली कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट ट्रेडिंग 2026 के मध्य तक शुरू होने की उम्मीद है, जबकि पावर एक्सचेंजों पर वास्तविक ट्रेडिंग अक्टूबर 2026 तक शुरू हो सकती है। योजना के तहत आधार वर्ष वित्त वर्ष 2023-24 रखा गया है, जबकि अनुपालन वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के लिए तय किया गया है। जो कंपनियां अपने तय लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, उन्हें अतिरिक्त क्रेडिट मिलेंगे जिन्हें वे बेच सकती हैं, जबकि लक्ष्य से पीछे रहने वाली कंपनियों को बाज़ार से क्रेडिट खरीदने होंगे या तय शॉर्टफॉल की दोगुनी कीमत के बराबर जुर्माना भरना होगा। शुरुआती आकलन के अनुसार अनुपालन बाज़ार में कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट की कीमत करीब 10 से 15 डॉलर प्रति टन के दायरे में रह सकती है, हालांकि फ्लोर और फोरबेयरेंस प्राइस अभी औपचारिक रूप से तय नहीं हुई है।

इसी बीच भारतीय उद्योग जगत में नेट-शून्य लक्ष्यों को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज़ हो गई है। टाटा स्टील ने विश्व पर्यावरण दिवस 2026 के मौके पर 2045 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य दोहराते हुए बताया कि वह जमशेदपुर में जल्द ही 'हाइसारना' तकनीक का प्रदर्शन करेगी, जो कोकिंग जैसी ऊर्जा-गहन प्रक्रियाओं को खत्म कर सकती है। टाटा पावर भी 2045 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य के साथ विकेंद्रीकृत हरित ऊर्जा ढांचे में भारी निवेश कर रही है। वहीं अडाणी समूह को हाल ही में 'इंडिया क्लाइमेट वीक 2026' में स्वच्छ ऊर्जा क्षमता विस्तार, ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक और टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर में योगदान के लिए 'नेट-जीरो लीडरशिप' सम्मान से नवाजा गया।

चुनौतियां और जोखिम: स्कोप-3 रिपोर्टिंग

यह दौड़ चुनौतियों से खाली नहीं है। कई वैश्विक विश्लेषणों में यह संकेत मिला है कि बीते एक साल में कुछ बड़ी कंपनियों ने आर्थिक सुस्ती के दबाव में अपनी जलवायु और ईएसजी प्रतिबद्धताओं की गति धीमी कर दी है। इसकी एक बड़ी वजह जटिल होते रिपोर्टिंग मानक भी हैं। खासकर स्कोप-3 उत्सर्जन के आंकड़े बड़ी और जटिल आपूर्ति शृंखलाओं से समय पर और भरोसेमंद तरीके से जुटाना मुश्किल साबित हो रहा है।

भारत के संदर्भ में विशेषज्ञ स्वैच्छिक ऑफसेट तंत्र से जुड़े जोखिमों की भी चेतावनी दे रहे हैं और मानते हैं कि CCTS की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अनिवार्य भागीदारी और मज़बूत निगरानी, रिपोर्टिंग व सत्यापन व्यवस्था ज़रूरी होगी। भारत ने अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के तहत 2035 तक उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के स्तर से 47 प्रतिशत तक घटाने और 2070 तक नेट-जीरो हासिल करने का लक्ष्य रखा है।

ऐसे में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को न सिर्फ एक अनुपालन ढांचे बल्कि निवेश और नवाचार को गति देने वाले औज़ार के तौर पर देखा जा रहा है, जो किसानों, लघु उद्योगों और नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स को भी कार्बन बाज़ार से जोड़ने का मौका देगा। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे ट्रेडिंग शुरू होगी और कीमतों की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी, यह साफ हो पाएगा कि भारत का यह महत्वाकांक्षी कार्बन बाज़ार मॉडल औद्योगिक उत्सर्जन घटाने और जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में कितना कारगर साबित होता है।

Updated on:
11 Aug 2026 09:35 pm
Published on:
11 Aug 2026 09:35 pm