
जलवायु परिवर्तन की वजह से भारत के शहरों में तापमान बढ़ रहा है। देश के महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक हर बार पिछली सीजन से ज्यादा गर्मी हो रही है। कंक्रीट की ऊंची होती इमारतें, घटते पेड़-पौधे और सूखते जलस्रोत जैसी गतिविधियां शहरी जीवन को एक नई तरह के संकट में धकेल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की चेतावनी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई बन चुका है।
अप्रैल 2026 के अंत में महाराष्ट्र के अकोला और अमरावती जैसे शहरों में तापमान 46-47 डिग्री सेल्सियस के करीब दर्ज किया गया। यह सिर्फ मौसमी चरम नहीं, बल्कि मानव-निर्मित 'हीट इकोनॉमी' का संकेत है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में रिकॉर्ड गर्मी के साथ-साथ रिकॉर्ड स्तर पर पेड़ों की कटाई भी हो रही है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या विकास की मौजूदा रफ्तार पर्यावरण की बुनियाद को ही कमजोर कर रही है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लखनऊ, दिल्ली और पटियाला जैसे शहरों में कंक्रीट संरचनाओं और हरियाली की कमी के कारण 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। जिससे शहरों में रात का तापमान भी 30 डिग्री से ऊपर बना रहता है और शरीर को आराम तक नहीं मिल पाता। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौजूदा स्थिति इसी प्रकार जारी रही तो 2026 से 2030 के बीच लंबी हीटवेव, जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट के चलते भारत की GDP में 4 से 6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
गर्मी के साथ-साथ पानी की किल्लत भी शहरी जीवन का स्थायी संकट बनती जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नदियां, तालाब, कुएं और भूजल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। जिससे शहरों में लोगों को पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इसका सीधा असर मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है।
पानी खरीदना, बिजली के बढ़े बिल, कूलर-AC पर अतिरिक्त खर्च और सेहत पर पड़ने वाला दबाव, यह सब मिलकर घर के बजट को असंतुलित कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, भूजल स्तर में गिरावट, जलाशयों में घटता पानी और शहरों में पेयजल संकट जैसी समस्याएं आगे और गंभीर हो सकती हैं। भारत को अब एकीकृत जल प्रबंधन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।
विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि केवल रेड और ऑरेंज हीट अलर्ट जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन रणनीति का प्रमुख हिस्सा बनाया जाना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, शहरों में असरदार 'हीट एक्शन प्लान' लागू करने की जरूरत है।
हरित क्षेत्र को बढ़ावा: शहरों में पेड़ लगाना और मौजूदा हरियाली को बचाना बदलते मौसम की चुनौतियों को कम कर सकता है।
जल संरक्षण: वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों को अपनाना।
छायादार मार्ग और कूलिंग सेंटर: सार्वजनिक स्थानों पर छांव और ठंडक की व्यवस्था करनी चाहिए।
सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था को मजबूत करना।
स्कूल व कार्यस्थल के समय में बदलाव: जलवायु परिवर्तन के चुनौतियों से निपटने के लिए स्थानीय तापमान के अनुसार समय तय करना चाहिए।
भारत सरकार ने 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) शुरू की थी, जो देश की जलवायु रणनीति का मुख्य ढांचा है। इसके तहत आठ राष्ट्रीय मिशन आते हैं, जिनमें राष्ट्रीय सौर मिशन, वर्धित ऊर्जा दक्षता मिशन, सतत आवास मिशन (नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल हैबिटेट), जल मिशन, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र मिशन, ग्रीन इंडिया मिशन, सतत कृषि मिशन और जलवायु परिवर्तन पर सामरिक ज्ञान मिशन शामिल हैं।
सतत आवास मिशन के अंतर्गत शहरी नियोजन में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने, भवन संहिता को बेहतर बनाने, अपशिष्ट प्रबंधन और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा कई राज्य सरकारें और शहर अब स्थानीय स्तर पर अपने हीट एक्शन प्लान और आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने में जुटे हैं।
भारत के शहर आज एक दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं। एक तरफ बढ़ता तापमान और दूसरी तरफ घटता जल संसाधन बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे लोगों की सेहत, आमदनी और जीवनशैली से जुड़ा है। समय रहते हरित क्षेत्र बढ़ाना, जल प्रबंधन सुधारना और शहरी नियोजन में जलवायु-अनुकूल नीतियां अपनाना ही आने वाले वर्षों में शहरी जीवन को राहत दे सकता है।