
भारत में करोड़ों किसानों के सामने एक आम समस्या यह है कि उन्हें खुद नहीं पता होता कि उनके या उनके परिवार के नाम कुल कितनी जमीन दर्ज है। कई बार जमीन अलग-अलग गांवों में होती है, कुछ जमीन पुश्तैनी होती है, कुछ खरीदकर ली गई होती है और कुछ का रिकॉर्ड वर्षों से अपडेट नहीं हुआ होता। ऐसे में जब किसान बैंक से ऋण लेने, सरकारी योजना का लाभ लेने, जमीन बेचने या उत्तराधिकार का दावा करने जाता है, तब पता चलता है कि राजस्व रिकॉर्ड में कई जानकारियां अधूरी या गलत दर्ज हैं।
डिजिटल भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था आने के बाद अब अधिकांश राज्यों में खसरा, खतौनी, जमाबंदी और भू-नक्शा ऑनलाइन उपलब्ध हैं। हालांकि, केवल रिकॉर्ड देख लेना ही पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि जमीन का सही रिकॉर्ड कहां मिलेगा, अलग-अलग गांवों में दर्ज भूमि की जानकारी कैसे जुटाई जाए और यदि रिकॉर्ड गलत हो तो उसे कैसे ठीक कराया जाए।
किसानों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं बल्कि आय और पहचान का मुख्य आधार होती है। किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), फसल बीमा, पीएम किसान सम्मान निधि, भूमि अधिग्रहण मुआवजा और कई अन्य सरकारी योजनाओं में भूमि रिकॉर्ड महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि रिकॉर्ड में नाम गलत है, क्षेत्रफल कम दर्ज है या उत्तराधिकार के बाद नामांतरण नहीं हुआ है, तो कई बार किसान को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए समय-समय पर भूमि रिकॉर्ड की जांच करना जरूरी माना जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले मिलते हैं जहां परिवार को यह तक पता नहीं होता कि उनके पूर्वजों के नाम कितनी जमीन दर्ज थी। कई बार दादा या पिता के नाम जमीन दर्ज रहती है लेकिन उनके निधन के बाद उत्तराधिकार की प्रक्रिया पूरी नहीं होती।
कुछ मामलों में परिवार के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर बस जाते हैं और वर्षों तक भूमि रिकॉर्ड की जांच नहीं करते। बाद में जब जमीन बेचने या बंटवारा करने की जरूरत पड़ती है, तब पता चलता है कि रिकॉर्ड में कई विसंगतियां हैं। ऐसे भूले हुए रिकॉर्ड खोजने के लिए पुराने खाता नंबर, खसरा नंबर, रजिस्ट्री दस्तावेज और राजस्व विभाग के रिकॉर्ड उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कई किसानों की जमीन एक ही गांव में नहीं होती। परिवार के पास अलग-अलग गांवों या तहसीलों में भूमि हो सकती है। ऐसी स्थिति में केवल एक गांव की खतौनी देखने से पूरी जानकारी नहीं मिलती।
यदि किसी व्यक्ति के नाम कई गांवों में भूमि दर्ज है तो प्रत्येक गांव के रिकॉर्ड को अलग-अलग देखना पड़ सकता है। कुछ राज्यों में नाम के आधार पर खोज की सुविधा उपलब्ध है, जबकि कुछ जगहों पर खाता संख्या या खसरा संख्या की जरूरत होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी परिवार के पास पुश्तैनी भूमि है तो सभी गांवों के रिकॉर्ड का मिलान करना चाहिए, क्योंकि कई बार एक गांव की भूमि की जानकारी परिवार को होती है जबकि दूसरे गांव में दर्ज जमीन की जानकारी वर्षों तक सामने नहीं आती।
भूमि विवादों का एक बड़ा कारण उत्तराधिकार के बाद रिकॉर्ड अपडेट न होना है। किसी भूमि स्वामी की मृत्यु के बाद वारिसों का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराना आवश्यक होता है। इसे नामांतरण या दाखिल-खारिज की प्रक्रिया कहा जाता है।
यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो जमीन कानूनी रूप से अभी भी मृत व्यक्ति के नाम दर्ज दिखाई दे सकती है। ऐसी स्थिति में बिक्री, बंटवारा, ऋण या सरकारी योजना से जुड़े कई कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु के बाद जल्द से जल्द विरासत दर्ज कराने और रिकॉर्ड अपडेट कराने की प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए ताकि भविष्य में विवाद की संभावना कम हो।
आज अधिकांश राज्यों ने अपने भूलेख पोर्टल विकसित किए हैं, जहां किसान घर बैठे भूमि रिकॉर्ड देख सकते हैं। इसके लिए सामान्यतः निम्न प्रक्रिया अपनाई जाती है।
इसके अलावा केंद्र सरकार की डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) पहल के तहत विभिन्न राज्यों के भूमि रिकॉर्ड पोर्टलों तक पहुंचने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।
केवल नाम देख लेना पर्याप्त नहीं है। भूमि रिकॉर्ड में दर्ज अन्य विवरणों की भी जांच करनी चाहिए। सबसे पहले यह देखें कि खातेदार का नाम सही है या नहीं। इसके बाद खाता संख्या, खसरा संख्या और भूमि का क्षेत्रफल जांचें। यदि जमीन का क्षेत्रफल वास्तविक क्षेत्रफल से कम या अधिक दर्ज है तो संबंधित राजस्व अधिकारी से संपर्क करना चाहिए।
भूमि की श्रेणी भी महत्वपूर्ण होती है। कई बार भूमि कृषि भूमि के रूप में दर्ज होती है, जबकि उसका वास्तविक उपयोग अलग हो सकता है। ऐसे मामलों में भविष्य में कानूनी विवाद पैदा हो सकते हैं। यदि भूमि संयुक्त स्वामित्व में है तो यह भी देखना चाहिए कि सभी सह-स्वामियों के नाम सही तरीके से दर्ज हैं या नहीं।
यदि भूमि रिकॉर्ड में कोई त्रुटि दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। गलत नाम, गलत क्षेत्रफल, गलत भूमि श्रेणी या अधूरा स्वामित्व रिकॉर्ड भविष्य में बड़ी समस्या बन सकता है।
ऐसी स्थिति में किसान संबंधित तहसील, लेखपाल, कानूनगो या राजस्व अधिकारी से संपर्क कर सकता है। आवश्यक दस्तावेज जैसे रजिस्ट्री, उत्तराधिकार प्रमाण पत्र, पहचान पत्र और अन्य प्रमाण प्रस्तुत करके रिकॉर्ड सुधार का आवेदन दिया जा सकता है। कुछ राज्यों में भूमि रिकॉर्ड सुधार और नामांतरण के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी उपलब्ध है।
हालांकि भूमि रिकॉर्ड तेजी से डिजिटल हो रहे हैं, फिर भी किसानों को केवल ऑनलाइन जानकारी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। किसी महत्वपूर्ण लेनदेन, बिक्री, बंटवारे या कानूनी प्रक्रिया से पहले रिकॉर्ड का राजस्व विभाग से सत्यापन कराना बेहतर माना जाता है।
इसके अलावा भू-नक्शा और खतौनी का आपस में मिलान करना भी जरूरी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रिकॉर्ड में दर्ज भूमि और वास्तविक भूमि एक ही है।