
Dharmendra Pradhan Resignation : जुलाई 2026 में जब देशभर में NEET पेपर लीक को लेकर छात्र आंदोलन इतना तेज हुआ कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, तब सोशल मीडिया पर उन्हीं की एक पुरानी तस्वीर वायरल हुई। तस्वीर करीब तीन दशक पुरानी थी, जिसमें एक युवा धर्मेंद्र प्रधान खुद पेपर लीक के खिलाफ सड़क पर उतरे नजर आए थे। यह इत्तेफाक इतना गहरा है कि राजनीति के जानकार भी इसे 'इतिहास खुद को दोहराता है' कहकर बयां कर रहे हैं।
धर्मेंद्र प्रधान उस वक्त महज 27 साल के थे और RSS की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव थे। ओडिशा में उस दौर में परीक्षा पेपर लीक होना कोई नई बात नहीं थी। 1990 के दशक में यह एक बार-बार होने वाली समस्या बन चुकी थी, जो छात्रों और अभिभावकों के लिए लगातार चिंता का विषय था।
1996/1997 में जब हायर सेकेंडरी एजुकेशन काउंसिल (CHSE) द्वारा आयोजित कक्षा 12वीं बोर्ड परीक्षा का पेपर लीक हुआ, तो धर्मेंद्र प्रधान ने इसके खिलाफ एक बड़े आंदोलन का आह्वान किया। उन्होंने 2,000 से ज़्यादा छात्रों के साथ मिलकर ओडिशा विधानसभा के बाहर प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन उस समय की कांग्रेस सरकार के खिलाफ था, जिसके मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ (जे.बी.) पटनायक थे।
इस आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने सामान्य पुलिस बल के बजाय रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) तैनात कर दी। इसी झड़प में धर्मेंद्र प्रधान गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्कल विश्वविद्यालय में प्रधान के जूनियर रहे और खुद भी ABVP से जुड़े प्रशांत राउत इस घटना के चश्मदीद हैं। उनके मुताबिक, यह प्रदर्शन इतना बड़ा हो गया था कि पुलिस के लाठीचार्ज में सैकड़ों छात्र घायल हुए। राउत ने बताया कि प्रधान छात्र राजनीति के दिनों से ही छात्रों के मुद्दों पर बेहद मुखर थे और अक्सर प्रशासन से उनकी टक्कर होती रहती थी।
यह प्रदर्शन बेअसर नहीं गया। 1996/1997 के इस छात्र आंदोलन के दबाव में सरकार को कई सुधार करने पड़े, जिनमें परीक्षा समिति का पुनर्गठन भी शामिल था। इस समिति में अब विधायकों (MLAs) को भी शामिल किया जाने लगा, ताकि जवाबदेही बढ़े।
धर्मेंद्र प्रधान का जन्म 26 जून 1969 को हुआ था, एक ऐसे परिवार में जो शुरू से ही राजनीति और RSS की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से गहराई से जुड़ा था। उनके पिता देवेंद्र प्रधान पेशे से डॉक्टर थे, लेकिन ओडिशा में भाजपा के एक प्रमुख नेता के तौर पर पहचाने जाते थे और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बने।
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने गृहनगर तालचेर के तालचेर कॉलेज में हायर सेकेंडरी की पढ़ाई के दौरान ही ABVP कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय राजनीति शुरू कर दी थी। 1985 में वे कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष बने, 1993 में ABVP के ओडिशा राज्य सचिव, और 1995 में यानी उस पेपर लीक आंदोलन से ठीक एक साल पहले वे संगठन के राष्ट्रीय सचिव नियुक्त हुए।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि धर्मेंद्र प्रधान हमेशा जीतते नहीं आए। उत्कल विश्वविद्यालय (जहां उन्होंने एंथ्रोपोलॉजी में मास्टर्स की पढ़ाई की) के छात्र संघ चुनाव में उन्होंने 1990 में खुद चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे उनके प्रतिद्वंद्वी अरुण साहू थे, जो आज बीजू जनता दल (BJD) के वरिष्ठ नेता हैं। प्रधान के यूनिवर्सिटी सीनियर रहे वरिष्ठ भाजपा नेता सुदीप्त रे उन्हें 'अच्छा मैनेजर' और 'बारीकी से योजना बनाने वाला' नेता बताते हैं, जिन्होंने हार के बावजूद हार नहीं मानी और संगठन में मेहनत जारी रखी।
1996/1997 के इस आंदोलन के दो साल बाद, 1998 में धर्मेंद्र प्रधान अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए भाजपा में शामिल हुए। 2000 में वे पल्लाहाड़ा सीट से पहली बार विधायक बने, और एक विधायक के तौर पर उनके काम को ओडिशा विधानसभा के 'उत्कलमणि गोपबंधु प्रतिभा सम्मान' (सर्वश्रेष्ठ विधायक पुरस्कार) से नवाजा गया।
1996/1997 में जो युवा नेता एक छात्र के तौर पर पेपर लीक के खिलाफ सरकार से लड़ रहा था और इसके लिए चोटें सहीं, वही तीन दशक बाद, 2026 में, खुद उस सरकारी व्यवस्था के मुखिया यानी केंद्रीय शिक्षा मंत्री के तौर पर पेपर लीक के आरोपों को झेलते हुए इस्तीफा देने पर मजबूर हुआ। NEET पेपर लीक को लेकर 6 जून 2026 से शुरू हुआ छात्र आंदोलन 49 दिन तक चला, जिसके बाद 25 जुलाई 2026 को धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।