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Jupiter के पास कई ‘बड़े चाँद’ तो शनि अकेला क्यों? वैज्ञानिकों ने सुलझाई 4.5 अरब साल पुरानी गुत्थी

Magnetic Cavity: जापान और चीन के खगोलशास्त्रियों ने सिमुलेशन से खुलासा किया है कि युवा बृहस्पति के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र ने एक 'सुरक्षित गुहा' बनाई, जिससे उसके विशाल चंद्रमा नष्ट होने से बच गए। वहीं कमजोर चुंबकीय क्षेत्र के कारण शनि के कई शुरुआती चंद्रमा ग्रह में गिरकर समा गए और केवल टाइटन ही बच सका।
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भारत

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MI Zahir

Jul 27, 2026

Solar System Research News.

बृहस्पति का शक्तिशाली चुंबकीय सुरक्षा कवच उसके विशाल चंद्रमाओं को शुरुआती तबाही से बचाने में अहम साबित हुआ। ( फोटो: ChatGPT.)

Space Research: सौर मंडल के दो सबसे विशाल गैसीय ग्रहों बृहस्पति और शनि के चंद्रमाओं की संरचना को लेकर वैज्ञानिकों का दशकों पुराना रहस्य आखिरकार सुलझ गया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में जापान और चीन की एक संयुक्त अंतरराष्ट्रीय रिसर्च टीम ने इस बात का खुलासा किया है कि आखिर क्यों बृहस्पति के पास कई विशालकाय चंद्रमा मौजूद हैं, जबकि शनि के पास केवल टाइटन ही अकेला बड़ा चंद्रमा बच सका है। 'नेचर एस्ट्रोनॉमी' (2026) जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन को प्रमुख वैज्ञानिक यूरी आई. फुजी, मासाहिरो ओगिहारा और यासुनोरी होरी ने अंजाम दिया है।

बृहस्पति के पास आज 100 से भी अधिक चांद खोजे जा चुके

रिसर्च के अनुसार हमारे सौर मंडल के दो सबसे बड़े पड़ोसी—बृहस्पति (Jupiter) और शनि (Saturn) दशकों से खगोलशास्त्रियों के लिए एक रहस्य बने हुए थे। दोनों ही गैस से बने विशालकाय ग्रह (Gas Giants) हैं और दोनों के पास ही अपना-अपना बड़ा कुनबा यानी चंद्रमाओं का परिवार है। जहां बृहस्पति के पास आज 100 से भी अधिक चांद खोजे जा चुके हैं, वहीं वलयों (Rings) वाले शनि ग्रह के पास 280 से भी ज्यादा चंद्रमाओं की मौजूदगी पाई गई है। लेकिन जब बात बड़े और विशाल चंद्रमाओं की आती है, तो दोनों ग्रहों का ढांचा एक-दूसरे से बिलकुल अलग नजर आता है:

सौर मंडल के ग्रहों की संरचना को लेकर वैज्ञानिकों ने रिसर्च कर नया खुलासा किया है। ( विजुअल: ChatGPT)

बृहस्पति (Jupiter): इसके पास 4 बेहद विशालकाय चंद्रमा हैं—गैनीमेड (Ganymede - सौर मंडल का सबसे बड़ा चंद्रमा), कैलिस्टो (Callisto), आयो (Io) और यूरोपा (Europa)।

शनि (Saturn): शनि के पास विशाल आकार का केवल एक ही प्रमुख चंद्रमा है—टाइटन (Titan - सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा चंद्रमा)।

बड़ा सवाल: जब दोनों ग्रह एक ही समय पर, एक ही तरह की गैस और धूल से बने थे, तो बृहस्पति के पास चार-चार विशाल चंद्रमा कैसे बच गए, जबकि शनि का विशालकाय परिवार खत्म हो गया और केवल टाइटन ही अकेला बच सका?

इस 4.5 अरब साल पुराने रहस्य का जवाब खगोलविदों ने ढूंढ निकाला है। क्योटो यूनिवर्सिटी (जापान) के नेतृत्व में जापान और चीन के वैज्ञानिकों की एक विशेष शोध टीम ने यह पता लगाया है कि इसके पीछे ग्रहों का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) जिम्मेदार था।

कैसे बनती है ग्रहों और उनके चंद्रमाओं की दुनिया?

जब सौर मंडल का निर्माण हो रहा था, उस समय बृहस्पति और शनि जैसे युवा गैस ग्रहों के चारों ओर धूल, बर्फ और गैस की एक घूमती हुई डिस्क बनी हुई थी। विज्ञान की भाषा में इसे परिग्रहीय डिस्क (Circumplanetary Disk) कहा जाता है। इसी डिस्क के अंदर जमा हुए पदार्थ आपस में जोड़कर धीरे-धीरे चंद्रमाओं का रूप लेते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में एक बहुत बड़ी चुनौती होती है-ग्रेविटेशनल ड्रैग (गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव)। जैसे-जैसे कोई चंद्रमा बड़ा होता है, डिस्क में मौजूद घनी गैस और धूल उस पर ब्रेक लगाने लगती है। इसके कारण चंद्रमा अपनी कक्षा (Orbit) खोने लगता है और धीरे-धीरे अंदर की तरफ खिसकते हुए अपने ही मुख्य ग्रह में गिरकर नष्ट हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने कैसे किया यह परीक्षण? (Research Methodology)

क्योटो यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री यूरी आई. फुजी (Yuri I. Fujii), मासाहिरो ओगिहारा (Masahiro Ogihara) और यासुनोरी होरी (Yasunori Hori) की टीम ने इस जटिल प्रक्रिया को समझने के लिए आधुनिक सुपरकंप्यूटिंग का सहारा लिया:

सुपर कंप्यूटर सिमुलेशन: जापान की नेशनल एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी के 'कम्प्यूटेशनल एस्ट्रोफिजिक्स सेंटर' में लगे पीसी क्लस्टर का इस्तेमाल करके अरबों साल पुराने हालातों का सिमुलेशन (कंप्यूटर मॉडल) तैयार किया गया।

थर्मल और मैग्नेटिक इवोल्युशन: रिसर्चर्स ने युवा बृहस्पति और शनि के आंतरिक ढांचे, उनके तापमान में आए बदलाव और चुंबकीय क्षेत्र के बनने की प्रक्रिया का सटीक गणितीय अध्ययन किया।

एन-बॉडी सिमुलेशन (N-Body Simulations): इस तकनीक के जरिए यह देखा गया कि गैस डिस्क के अंदर अलग-अलग आकार के चंद्रमा किस तरह गति करते हैं और उनका चुंबकीय बलों के साथ कैसा व्यवहार रहता है।

असली अंतर: बृहस्पति का 'चुंबकीय सुरक्षा कवच'

रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि बृहस्पति और शनि के चंद्रमाओं के भाग्य का फैसला उनके चुंबकीय क्षेत्र की ताकत ने किया था:

  1. बृहस्पति का 'सेफ ज़ोन' (Safe Zone)अपने शुरुआती दौर में बृहस्पति का चुंबकीय क्षेत्र बेहद आक्रामक और शक्तिशाली था। इस प्रचंड चुंबकीय शक्ति ने उसकी परिग्रहीय डिस्क के अंदरूनी हिस्से को धकेल कर एक 'खाली चुंबकीय गुहा' (Magnetic Cavity) बना दी।

जब बृहस्पति के विशाल चंद्रमा (आयो, यूरोपा और गैनीमेड) बाहरी डिस्क में बने और अंदर की ओर खिसकने लगे, तो जैसे ही वे इस चुंबकीय गुहा की सीमा पर पहुंचे, गैस का खिंचाव समाप्त हो गया। इस खाली जगह ने एक 'ब्रेक' या 'सुरक्षित क्षेत्र' का काम किया, जिससे ये चंद्रमा ग्रह के अंदर गिरने से बच गए और अपनी स्थिर कक्षाओं में स्थापित हो गए।

[ परिग्रहीय डिस्क ] ──> ( चंद्रमा अंदर की ओर खिसके ) ──> [ चुंबकीय सुरक्षा गुहा ] ──> "चंद्रमा सुरक्षित बच गए"

  1. शनि का 'असुरक्षित क्षेत्र' (Unprotected Zone)

इसके विपरीत, युवा शनि का चुंबकीय क्षेत्र काफी कमजोर था। वह अपनी डिस्क के अंदर इस तरह की कोई खाली जगह या सुरक्षा चक्र नहीं बना सका।

परिणामस्वरूप, जब शनि के चारों ओर बड़े-बड़े चंद्रमा बनने शुरू हुए, तो गैस डिस्क के खिंचाव के कारण वे एक-एक करके शनि के अंदर गिरकर खत्म होते चले गए। केवल टाइटन ही सही दूरी और समय पर बना, जिसकी वजह से वह इस विनाशकारी खिंचाव से बच सका और आज शनि के एकमात्र सबसे बड़े चंद्रमा के रूप में चमक रहा है।

जापान और चीन के खगोलशास्त्रियों ने जुपिटर और शनि ग्रह की रिसर्च कर नया खुलासा किया है। (फोटो: ChatGPT)

सौर मंडल के पार 'एक्सोमून' खोजने में मिलेगी मदद

रिसर्च के अनुसार इस नई खोज से केवल हमारे सौर मंडल के अतीत की ही परतें नहीं खुली हैं, बल्कि यह एक्सोप्लैनेट (Exoplanets - सौर मंडल से बाहर के ग्रह) और उनके एक्सोमून (Exomoons) की खोज में भी एक नई दिशा देगा।

कई विशाल चंद्रमाओं का परिवार होने की संभावना सबसे ज्यादा

वैज्ञानिकों के इस नए गणितीय मॉडल के अनुसार बृहस्पति जितने या उससे बड़े आकार के दूरस्थ गैस ग्रहों के पास कई विशाल चंद्रमाओं का परिवार होने की संभावना सबसे ज्यादा है। शनि के आकार या उससे छोटे गैसीय ग्रहों के पास आमतौर पर केवल एक या दो ही बड़े चंद्रमा देखने को मिलेंगे।

एक्सपर्ट कमेंट: गहरे ब्रह्मांड को समझने का एक शानदार अवसर

'ग्रहों के निर्माण के सिद्धांतों का परीक्षण करना बेहद कठिन काम है क्योंकि प्रयोगशाला के रूप में हमारे पास केवल हमारा सौर मंडल ही मौजूद है। लेकिन हमारे पड़ोस में मौजूद ये उपग्रह प्रणालियां हमें गहरे ब्रह्मांड को समझने का एक शानदार अवसर देती हैं।' -यूरी आई. फुजी,मुख्य शोधकर्ता,क्योटो यूनिवर्सिटी।

कंक्लूजन: ब्रह्मांडीय नियमों की अनूठी मिसाल

बहरहाल, जापान और चीन के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन यह साबित करता है कि किसी ग्रह का अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र केवल उसकी सतह या वायुमंडल की रक्षा ही नहीं करता, बल्कि उसके पूरे उपग्रह परिवार की किस्मत का निर्धारण भी करता है। बृहस्पति का प्रचंड चुंबकीय क्षेत्र यदि 4.5 अरब साल पहले वह सुरक्षा कवच न बनाता, तो शायद आज हम सौर मंडल के सबसे बड़े चंद्रमा गैनीमेड या महासागरों से भरे यूरोपा का दीदार नहीं कर पा रहे होते।