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भारत में 14 साल के अंदर जंक फूड की डिमांड 150 फीसदी बढ़ी; इसे खाने से विश्व में हर साल मर रहे 1.9 करोड़ लोग

शहरों में हर गली और नुक्कड़ पर आसानी से उपलब्ध होने वाला जंक फूड लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) ने जंक फूड खाने से नुकसान (Junk Food Effects) और देश में तेजी से बढ़ी इसकी मांग को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है।
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भारत

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Vinay Shakya

Jul 27, 2026

Harmful effects of eating junk food

जंक फूड खाने से लोगों की सेहत खराब हो रही है (सांकेतिक इमेज -AI)

ICMR Junk Food Obesity : पूरी दुनिया में 1 अरब से ज्यादा लोग मोटापे से परेशान हैं। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे विकसित देशों की तरह भारत में भी मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) की हालिया रिपोर्ट ने इस समस्या की गंभीरता उजागर किया है। वैश्विक स्तर पर जंक फूड हर साल किसी न किसी रूप में करीब 1.9 करोड़ मौतों का कारण बनता है। यह जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के डेटा में उपलब्ध है।

बच्चों के खान-पान की आदतों पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने ‘Priority Policy Actions for Promoting Healthier Food Environment for Children and Youth in India’ नाम से जारी रिपोर्ट में जंक फूड के गंभीर परिणाणों को उजागर किया है। इस रिपोर्ट में ICMR-NIN के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ICMR, NIN, AIIMS, नीति आयोग और यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक बच्चों में मोटापा 11% बढ़ जाएगा। उस स्थिति में दुनिया के कुल मोटे बच्चों में हर 9वां बच्चा भारतीय होगा।

भारत में स्थिति और आंकड़े

देश में 5 से 19 साल के करीब 4.1 करोड़ बच्चे मोटापे से पीड़ित हैं। CNNS (Comprehensive National Nutrition Survey) के मुताबिक, लगभग 10% किशोर और युवा प्री-डायबिटिक हैं। यानी कि वे मधुमेह की चपेट में हैं। करीब 1% युवाओं को पहले से डायबिटीज है। इसके अलावा हर 20 में से एक युवा हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहा है।

कुल 5% किशोरों में हाई बीपी की समस्या है। भारत में 10.3 लाख स्कूलों में 24.7 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं। एक बच्चा 10-12 साल की उम्र में स्कूल में करीब 12,000 घंटे बिताता है। यही वह समय होता है जब खान-पान की आदतें बनती हैं। लेकिन स्कूलों के आसपास जंक फूड की आसानी से उपलब्धता और आकर्षक विज्ञापन इन आदतों को बिगाड़ रहे हैं।

तेजी से बढ़ा जंक फूड बाजार

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (जंक फूड) का बाजार तेजी से बढ़ा है। साल 2006 में इसका टर्नओवर मात्र 7,515 करोड़ रुपए था, जो 2019 में बढ़कर 3.16 लाख करोड़ रुपए हो गया। 2009 से 2023 के बीच जंक फूड की बिक्री 150% बढ़ गई। इन उत्पादों में चीनी, नमक, फैट और रसायनों की मात्रा अधिक होती है, जबकि पोषक तत्व न के बराबर हैं।

रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि टीवी और सोशल मीडिया पर 90% से अधिक खाद्य विज्ञापन अनहेल्दी उत्पादों के होते हैं। क्रिकेट मैचों के दौरान 80% से ज्यादा विज्ञापन जंक फूड से जुड़े होते हैं। 92.6% अभिभावक मानते हैं कि स्कूलों के पास फास्ट फूड आसानी से उपलब्ध है।

कंसोर्टियम की प्रमुख सिफारिशें

  • बच्चों की सेहत और खानृ-पान को लेकर ICMR-NIN कंसोर्टियम ने सरकार को कई ठोस सुझाव दिए हैं।
  • स्कूलों के अंदर और 50 मीटर दायरे में जंक फूड की बिक्री और विज्ञापन पर पूर्ण प्रतिबंध लगे।
  • स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में पोषण साक्षरता, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली का अध्याय अनिवार्य करें।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों को जागरूक करने के अभियान चलाएं।
  • CBSE द्वारा शुरू किए गए शुगर और ऑयल बोर्ड को सभी स्कूलों में लागू करें।
  • PM पोषण योजना (मिड-डे मील) में नमक, चीनी और तेल की मात्रा तय करें।

जंक फूड की बिक्री और कानून

भारत में पहले से स्कूलों के आसपास जंक फूड पर रोक का कानून है, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। ऐसे में जंक फूड की बिक्री तेजी से बढ़ी है।

विश्व में मोटापे से कितने लोग परेशान?

WHO के अनुसार, दुनिया में 5.5% वयस्क और 3.7% बच्चे ओवरवेट हैं। मोटापे का औसत 2012 में 12.1% से बढ़कर 16.2% हो गया है। यूनाइटेड किंगडम में 1.5 करोड़, जर्मनी में 1.39 करोड़ और फ्रांस में 1.1 करोड़ वयस्क मोटापे से प्रभावित हैं। इसके अलावा भारत में 5.5% और इसके पड़ोसी देश मालदीव में (17.9%), पाकिस्तान में (10.3%), श्रीलंका में (5.8%), बांग्लादेश में (5.2%) और नेपाल में (5.0%) लोग मोटापे से परेशान हैं।

जंक फूड की बिक्री का वैश्विक स्तर

WHO के अनुसार, फिजी, मंगोलिया, इंडोनेशिया और श्रीलंका के स्कूलों में भी सेहतमंद खाने की कमी पाई गई। इस लिस्ट में भारत भी शामिल है। कई देशों ने स्कूलों के आसपास जंक फूड की बिक्री को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। चिली में मीठे पेय की बिक्री 20-30% घटी है। दक्षिण कोरिया में जंक फूड विज्ञापन 81% कम हुए हैं। वहीं, ब्रिटेन में 37% जंक फूड की बिक्री में कमी आई है। नॉर्वे ने 2026 से 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ऑनलाइन जंक फूड विज्ञापनों पर रोक लगा दी।

चुनौतियां और समाधान

जंक फूड की बिक्री को बच्चों की पहुंच से दूर रखने के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। जंक फूड कंपनियां बच्चों को आकर्षित करने के लिए हर तरह के उपाय करती हैं। जिसमे आकर्षक पैकेजिंग, कार्टून कैरेक्टर्स, स्कूल के पास दुकानें और भारी विज्ञापन शामिल हैं। ICMR-NIN की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि स्कूल जीवन की खान-पान आदतों का आधार है। अगर यहां सुधार हुआ तो पूरे जीवन का स्वास्थ्य बेहतर होगा।

RBSK 2.0 कार्यक्रम स्क्रीन टाइम कम करने, पूरी नींद और सक्रिय जीवनशैली पर जोर दे रहा है। लेकिन कानूनों का सख्त क्रियान्वयन सबसे जरूरी है। जंक फूड अब सिर्फ स्वाद का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट है। स्कूलों को ‘हेल्दी फूड जोन’ बनाने, विज्ञापनों पर सख्ती और पोषण शिक्षा से हम अगली पीढ़ी को स्वस्थ बना सकते हैं। अगर आज नहीं तो कल बहुत देर हो जाएगी। स्थिति को कंट्रोल नहीं किया गया तो साल 2030 तक 11% बढ़ता मोटापा भारत के भविष्य को प्रभावित करेगा।