
25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद को लेकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह खबर सुर्खियों में तो नई है, लेकिन जिस शख्सियत की यह कहानी है, वह भारतीय राजनीति में करीब चार दशक से सक्रिय हैं। ओडिशा के एक छोटे से कस्बे तालचर से निकलकर छात्र राजनीति में कदम रखने वाला एक युवा कार्यकर्ता कैसे भारत सरकार के सबसे अहम मंत्रालयों तक पहुंचा। यह सफर भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और उसमें आगे बढ़ने वाले नेताओं की कार्यशैली को भी समझने में मदद करता है। आइए विस्तार से जानते हैं छात्र राजनीति से केंद्रीय मंत्री और फिर इस्तीफे तक का पूरा सफर।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | धर्मेंद्र प्रधान |
| जन्म | 26 जून 1969, तालचर, ओडिशा |
| पिता | देवेंद्र प्रधान (वाजपेयी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री, 1999-2004) |
| पत्नी | मृदुला प्रधान (ठाकुर) |
| बच्चे | निशांत और नैमिषा |
| समुदाय | चासा समुदाय (OBC श्रेणी) |
| शिक्षा | तालचर कॉलेज से हायर सेकेंडरी व स्नातक; उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर से मानवशास्त्र (Anthropology) में एमए (1990) |
| पार्टी | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक यात्रा तब शुरू हुई जब वे तालचर कॉलेज में पढ़ते हुए महज़ 14 साल की उम्र में 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े। उस दौर में ओडिशा जैसे राज्य में ABVP का संगठनात्मक ढांचा अभी उतना मजबूत नहीं था, और यहीं से युवा धर्मेंद्र ने संगठन बनाने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और छात्रों के बीच पैठ बनाने का हुनर सीखा। जो आगे चलकर उनकी पूरी राजनीतिक शैली की पहचान बना।
1985: तालचर में छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। बाद में छात्र संघ में सचिव पद भी संभाला। यह उनकी पहली बड़ी चुनावी जीत थी, भले ही यह कॉलेज स्तर की राजनीति थी।
1995: वे ABVP के राष्ट्रीय सचिव बने- यानी राज्य स्तर से निकलकर राष्ट्रीय संगठन तक पहुंचे। इसी हैसियत में 1997 में जब ओडिशा में एक राज्य-स्तरीय प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक हो गया था, तब उन्होंने करीब 1,500 छात्रों के साथ भुवनेश्वर में ओडिशा सचिवालय के बाहर एक बड़ा प्रदर्शन किया था। दिलचस्प यह है कि करीब तीन दशक बाद, 2026 में, वे खुद NEET-UG पेपर लीक विवाद के कारण शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देंगे।
1998: उन्होंने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली, और इसके बाद पार्टी संगठन में सचिव व अखिल भारतीय महासचिव जैसी भूमिकाएं निभाईं।
2004-2006: वे भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। यह उनके करियर का एक अहम राष्ट्रीय पद था।
इस दौर में उनकी पहचान एक 'संगठन के आदमी' के तौर पर बनी। यानी ऐसा नेता जो चुनाव जीतने से ज्यादा पार्टी ढांचे को मजबूत करने और जमीनी कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने में माहिर है। यही गुण आगे चलकर उन्हें ओडिशा जैसे राज्य में, जहां भाजपा का जनाधार सीमित था, पार्टी को खड़ा करने में काम आया।
| साल | घटनाक्रम |
|---|---|
| 2000 | मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में पहली एंट्री — ओडिशा के पल्लहारा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधायक बने |
| 2000–2004 | पल्लहारा से ओडिशा विधानसभा के सदस्य रहे |
| 2004 | पहली बार लोकसभा पहुंचे — ओडिशा के देवगढ़ निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतकर 14वीं लोकसभा के सदस्य बने |
| मार्च 2018 | मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए |
संगठन में शुरुआती दशक की मेहनत का ही नतीजा था कि वे 2000 में सीधे विधानसभा चुनाव जीत गए, और महज़ चार साल बाद 2004 में लोकसभा तक पहुंच गए। वे अब तक तीन बार सांसद और एक बार विधायक रह चुके हैं।
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद धर्मेंद्र प्रधान का राष्ट्रीय राजनीति में कद तेज़ी से बढ़ा:
| कार्यकाल | मंत्रालय / पद |
|---|---|
| 2014–2017 | पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) |
| 2017–2021 | पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस कैबिनेट मंत्री (2017 में पदोन्नति के बाद) |
| 2017–2024 | कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री |
| 2019–2021 | इस्पात मंत्री |
| 7 जुलाई 2021 – 25 जुलाई 2026 | केंद्रीय शिक्षा मंत्री (देश के 9वें शिक्षा मंत्री; रमेश पोखरियाल 'निशंक' के स्थान पर नियुक्त) |
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते हुए (2014 में राज्य मंत्री के तौर पर शुरुआत, 2017 में कैबिनेट रैंक में पदोन्नति, 2021 तक कार्यकाल) धर्मेंद्र प्रधान की सबसे बड़ी पहचान प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से जुड़ी। 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया से शुरू हुई इस योजना का मकसद गरीब परिवारों, खासकर महिलाओं को धुआं रहित रसोई गैस कनेक्शन मुहैया कराना था। यह योजना उनके मंत्रालय की देखरेख में लागू हुई और आगे चलकर करोड़ों घरों तक एलपीजी पहुंचाने वाली केंद्र सरकार की सबसे बड़ी सामाजिक योजनाओं में गिनी जाने लगी। इसके अलावा उन्होंने पेट्रोलियम क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने और तेल कंपनियों के आधुनिकीकरण पर भी काम किया।
2017 से 2024 तक कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की जिम्मेदारी भी उनके पास रही, जहां उन्होंने युवाओं को रोजगार-योग्य कौशल देने वाली योजनाओं पर काम किया। साथ ही 2019 से 2021 तक वे इस्पात मंत्री भी रहे, जो भारत के औद्योगिक बुनियादी ढांचे से जुड़ा एक अहम मंत्रालय है। एक साथ कई भारी मंत्रालयों को संभालना उनकी प्रशासनिक क्षमता और पार्टी नेतृत्व के भरोसे दोनों को दिखाता है।
जुलाई 2021 में रमेश पोखरियाल निशंक की जगह लेकर धर्मेंद्र प्रधान 9वें केंद्रीय शिक्षा मंत्री बने। इस कार्यकाल में उन्होंने इन क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया:
यही वह मंत्रालय था जिसमें उनका करियर सबसे लंबा और सबसे विवादास्पद दोनों साबित हुआ। पांच साल के इस कार्यकाल का अंत NEET-UG विवाद में इस्तीफे के साथ हुआ।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल का अंत विवादों में हुआ। NEET-UG 2026 परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर 26 दिन का अनशन भी शामिल था। आंदोलन के 36वें दिन धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री के पद से अपना इस्तीफा दिया।
अपनी इस्तीफा चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि वे देश के युवाओं को 'उलझन और आरोपों के जाल' में फंसने नहीं देना चाहते, और यह मुद्दा लंबी कानूनी या राजनीतिक लड़ाई नहीं बनना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि अगले साल से NEET को कंप्यूटर-आधारित टेस्ट (CBT) प्रारूप में बदला जाएगा। इस्तीफे में उन्होंने प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन और मंत्रालय के कर्मचारियों का आभार भी व्यक्त किया। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने पहले से ही उनके इस्तीफे या बर्खास्तगी की मांग की थी।