25 जुलाई 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Rajasthan Rural Sports : गांव की मिट्टी से निकले सितारे, लखानी गांव की बेटियों ने खेल में बनाई राष्ट्रीय पहचान

Rajasthan Rural Sports: सीकर के लखानी गांव की बेटियों और युवाओं ने सीमित संसाधनों के बावजूद राष्ट्रीय हॉकी में पहचान बनाई। जानिए उमा निठारवाल, लक्षिता बाजिया और अन्य खिलाड़ियों की प्रेरक कहानी।
6 min read
Google source verification
Rajasthan Sports Hockey Sikar Lakhani Village

गांव की बेटियों ने फतह किया हॉकी का मैदान (Photo: AI Generated)

Rajasthan Rural Sports : राजस्थान का नाम सुनते ही आंखों के सामने रेगिस्तान, ऊंट, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक किले उभर आते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस राज्य के गांवों से निकल रही खेल प्रतिभाएं अपनी पहचान तेजी से जिले से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बना रही हैं। जिन गांवों में कभी खेल सिर्फ कबड्डी, कुश्ती या गिल्ली-डंडा तक सीमित था, वहीं आज खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि पारंपरिक समाज की पहचान रखने वाले राजस्थान की लड़कियों ने तमाम दिक्कतों के बावजूद सफलता के झंडे गाड़ने की ठान ली है।

इन खिलाड़ियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्होंने आधुनिक सुविधाओं के बिना, सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बीच अपनी पहचान बनाई। यही वजह है कि राजस्थान के गांवों की खेल प्रतिभाओं की कहानियां प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं।

गांवों में छिपी प्रतिभा की असली ताकत

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों की भौगोलिक कठिनाइयों के बीच बच्चों का बचपन प्राकृतिक शारीरिक गतिविधियों से भरा होता है। खेतों में काम करना, लंबी दूरी पैदल तय करना, पशुपालन और खुले मैदानों में खेलना उनकी शारीरिक क्षमता को स्वाभाविक रूप से मजबूत बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही प्राकृतिक फिटनेस आगे चलकर एथलेटिक्स, कुश्ती, हॉकी, कबड्डी, बॉक्सिंग और तीरंदाजी जैसे खेलों में उनकी ताकत बनती है।

सुविधाओं की कमी, लेकिन हौसलों की नहीं

ग्रामीण खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खेल मैदान, प्रशिक्षित कोच, पोषण और खेल उपकरणों की कमी होती है। हालांकि यही संघर्ष इन खिलाड़ियों को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

  • दौड़ की प्रैक्टिस कच्ची सड़कों पर होती है।
  • कुश्ती मिट्टी के अखाड़ों में सीखी जाती है।
  • हॉकी के लिए लकड़ी की स्टिक से शुरुआत होती है।
  • जिम की जगह खेतों और रेत के टीलों पर अभ्यास किया जाता है।

लखानी गांव की बेटियों ने हॉकी में बनाई राष्ट्रीय पहचान

राजस्थान में यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। सीकर जिले का ही दुजोद गांव बास्केटबॉल के लिए प्रदेश भर में मशहूर है और यहां से कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकल चुके हैं, जबकि हनुमानगढ़ का सिलवाला खुर्द गांव वॉलीबॉल की नर्सरी माना जाता है। सीकर जिले को ही "हॉकी की नर्सरी" कहा जाता है - यहां हर साल सैकड़ों नए हॉकी खिलाड़ी तैयार होते हैं। राजस्थान का सीकर जिला शिक्षा और खेल प्रतिभाओं के लिए पूरे प्रदेश में अपनी अलग पहचान रखता है। इसी जिले के लक्ष्मणगढ़ क्षेत्र का लखानी गांव आज अपनी उभरती खेल प्रतिभाओं के कारण चर्चा का केंद्र बन गया है।

ग्रामीण परिवेश में खेलों के लिए सुविधाएं सीमित होती हैं। आधुनिक मैदान, प्रशिक्षित कोच और बेहतर खेल सामग्री का अभाव अक्सर प्रतिभाओं के सामने बड़ी चुनौती बन जाता है। इसके बावजूद लखानी गांव के खिलाड़ियों ने यह साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों तो संसाधनों की कमी सफलता की राह नहीं रोक सकती। यहां के खिलाड़ियों ने कठिन परिस्थितियों में अभ्यास किया, निरंतर मेहनत की और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

उमा निठारवाल ने राष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान

सफलता की कहानियों में सबसे प्रमुख नाम उमा निठारवाल का है। उमा ने तीन वर्ष राष्ट्रीय स्तर की हॉकी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन कर गांव का गौरव बढ़ाया। उनका खेल कौशल, अनुशासन और टीम भावना उन्हें अन्य खिलाड़ियों से अलग पहचान दिलाया। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि ग्रामीण क्षेत्र की बेटियां भी देश के बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने में पूरी तरह सक्षम हैं। उनकी उपलब्धि ने गांव की अनेक बालिकाओं को हॉकी अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

लक्षिता बाजिया ने हॉकी के मैदान पर ठोंका खम

इसी कड़ी में लक्षिता बाजिया का नाम भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता के लिए चयनित होना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। लक्षिता ने अपने लगातार अभ्यास और उत्कृष्ट प्रदर्शन के बल पर यह मुकाम हासिल किया। उनका चयन इस बात का प्रमाण है कि लखानी गांव में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। उन्होंने अपने खेल के माध्यम से यह संदेश दिया कि मेहनत और लगन से हर सपना साकार किया जा सकता है।

स्कूल में पढ़ रही थी तभी हुआ नेशनल टीम में सेलेक्शन

अनीता बाजिया ने भी हॉकी के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपने विद्यालय का प्रतिनिधित्व कर गांव का मान बढ़ाया। विद्यालय स्तर से राष्ट्रीय प्रतियोगिता तक का सफर आसान नहीं होता। इसके लिए वर्षों की मेहनत, अनुशासन और समर्पण की आवश्यकता होती है। अनीता ने इन सभी गुणों का परिचय देते हुए अपने प्रदर्शन से यह सिद्ध किया कि ग्रामीण क्षेत्रों की छात्राएं भी बड़े मंच पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं।

अंजू और प्रियांशु बनी गांव के बच्चों के लिए प्रेरणा

गांव की प्रतिभाशाली खिलाड़ी अंजू चौधरी ने भी राष्ट्रीय स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी खेल प्रतिभा का परिचय दिया। राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचना ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। अंजू ने अपने प्रदर्शन से न केवल स्वयं को स्थापित किया, बल्कि गांव की अन्य छात्राओं के लिए भी प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया। उनके संघर्ष और सफलता की कहानी आज गांव के बच्चों में नया उत्साह भर रही है। प्रियांशु बाजिया ने हॉकी में शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उन्होंने यह साबित किया कि गांव के युवा भी बड़े खिलाड़ियों से किसी भी तरह कम नहीं हैं। प्रियांशु की उपलब्धियों ने गांव के युवाओं में खेलों के प्रति नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार किया है।

सफलता की कहानी लिखने में परिवार ने भी किया त्याग

इन खिलाड़ियों की सफलता के पीछे उनके परिवारों का त्याग और सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसान और सामान्य परिवारों से आने वाले इन खिलाड़ियों के माता-पिता ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपने बच्चों के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया। उन्होंने हर परिस्थिति में उनका उत्साह बढ़ाया और अभ्यास के लिए प्रेरित किया। यही पारिवारिक सहयोग इन खिलाड़ियों की सफलता की मजबूत नींव बना।

स्कूल के शिक्षकों ने खिलाड़ियों में भरा जोश

गांव के विद्यालयों, शिक्षकों और खेल प्रशिक्षकों ने भी इन प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय-समय पर अभ्यास, मार्गदर्शन और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहन ने खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ाया। गांव के वरिष्ठ नागरिकों और समाज के लोगों ने भी इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त करते हुए नई पीढ़ी को खेलों की ओर प्रेरित किया।

बेटियों ने बदल दिया गांव का माहौल

आज लखानी गांव में खेलों का वातावरण पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। सुबह और शाम गांव के मैदानों में बड़ी संख्या में बच्चे और बच्चियां अभ्यास करते दिखाई देते हैं। विशेष रूप से बेटियों की बढ़ती भागीदारी गांव में सामाजिक बदलाव का सकारात्मक संकेत है। अब अभिभावक भी अपनी बेटियों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए खुलकर प्रोत्साहित कर रहे हैं।

हालांकि, गांव में अभी भी आधुनिक खेल मैदान, बेहतर हॉकी टर्फ, प्रशिक्षित कोच और पर्याप्त खेल संसाधनों की आवश्यकता है। यदि सरकार, खेल विभाग और स्थानीय प्रशासन इन प्रतिभाओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराएं, तो लखानी गांव से भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी निकल सकते हैं।

चैंपियन तैयार करने के लिए इन बातों पर देना होगा ध्यान

खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि राजस्थान के गांवों में यदि कुछ क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाए तो राजस्थान की खेल क्षमता कई गुना बढ़ सकती है। प्रत्येक पंचायत स्तर पर खेल मैदान, नियमित कोचिंग, खेल विज्ञान, आधुनिक उपकरण और बेहतर पोषण उपलब्ध कराया जाए तो राजस्थान आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक खिलाड़ी तैयार कर सकता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में खेल अवसंरचना को मजबूत करने, खेलो इंडिया और खेलो राजस्थान जैसी पहलों के विस्तार तथा ग्रामीण प्रशिक्षण केंद्रों के विकास से भविष्य की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं।

सरकार ने भी चैंपियन तैयार करने के लिए खोली झोली

राज्य सरकार ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में परंपरागत खेलों को बढ़ावा देने के लिए राजीव गांधी ग्रामीण एवं शहरी ओलंपिक खेल योजना शुरू की है, जिसके तहत बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी आयु वर्ग के लोग हिस्सा ले सकते हैं।

बजट घोषणा 2025-26 के तहत खेलो इंडिया यूथ गेम्स की तर्ज पर खेलो राजस्थान यूथ गेम्स ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर आयोजित किए जा रहे हैं, जिन पर प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है।

राजस्थान बजट 2026 में राज्य के कई जिलों में नए स्टेडियम बनाने और करीब 2,500 गांवों में खेल अवसंरचना विकसित करने की घोषणा की गई है।

खिलाड़ियों की प्रगति मापने के लिए सरकार SPEED (Sports Performance Enhancement and Efficiency Development) नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म भी तैयार कर रही है, जिससे अकादमियों में प्रशिक्षण ले रहे खिलाड़ियों की क्षमता को ट्रैक किया जा सकेगा।

राजस्थान के गांवों की खेल प्रतिभाएं केवल पदक जीतने की कहानियां नहीं हैं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और बदलाव की मिसाल हैं। मिट्टी के अखाड़ों से लेकर राष्ट्रीय मैदानों तक का यह सफर साबित करता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि सही अवसर और मार्गदर्शन मिलने पर वह दुनिया के सामने अपनी पहचान बना सकती है।