
आधुनिक युग में 'डिजिटल डिटॉक्स' शब्द काफी चलन में है। डिजिटल डिटॉक्स का सीधा मतलब- हमारे स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट और सोशल मीडिया प्लेफॉर्म से है। दूसरे शब्दों में कहें तो 'डिजिटल डिटॉक्स' का मतलब तकनीकी को हमेशा के लिए त्याग देना नहीं, बल्कि इसके और वास्तविक जीवन के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाना है। इसको इस प्रकार समझ सकते हैं, जैसे- एक तय समय के लिए स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल को पूरी तरह बंद या बेहद सीमित कर देना और असली दुनिया से दोबारा जुड़ना।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दुनिया से पूरी तरह कटना न तो संभव है, न ही जरूरी। लेकिन, वास्तविक जिंदगी के बीच एक सोच-समझकर बनाया गया संतुलन ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। भारत में नीति स्तर से लेकर व्यक्तिगत स्तर तक इस दिशा में जागरूकता बढ़ रही है। अब डिजिटल डिटॉक्स सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का एक जरूरी कदम बनता जा रहा है।
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की लगातार मौजूदगी ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक फिटनेस, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कई मनोवैज्ञानिक अब डिजिटल डिटॉक्स को हर परिवार के लिए जरूरी मानने लगे हैं। लगातार स्क्रीन देखने और एक ही जगह देर तक बैठे रहने से मोटापा, गर्दन-कमर दर्द, आंखों पर दबाव, नींद की समस्या, तनाव, अवसाद और एकाग्रता में कमी जैसी दिक्कतें तेजी से बढ़ रही हैं।
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल की सीमा तय करना: रोजाना सोशल मीडिया के लिए सीमित समय (लगभग 30-45 मिनट) तय करना और स्क्रीन-टाइम ट्रैकर ऐप्स का इस्तेमाल करना चाहिए।
स्क्रीन-फ्री घंटे: हर दिन कुछ घंटे पूरी तरह स्क्रीन से दूर रहना चाहिए। खासकर सुबह उठने के बाद और रात को सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाएं।
नोटिफिकेशन बंद करना: आज के समय में हर स्मार्टफोन पर बार-बार विभिन्न प्रकार के ऐप्स और वेबसाइट्स के नोटिफिकेशन आते हैं। इसलिए अनावश्यक सूचनाओं को बंद रखना चाहिए, ताकि बार-बार ध्यान न भटके।
ऑफलाइन गतिविधियां अपनाना: पढ़ाई, खेल, योग, परिवार के साथ समय बिताना और आत्म-अनुशासन एवं नियमित व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाना, डिजिटल डिटॉक्स से बचने के प्रभावी उपाय बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल को पूरी तरह छोड़ना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन उसका संतुलित इस्तेमाल बेहद जरूरी है। अगर मोबाइल की लत को कम नहीं किया गया तो आगामी समय में शारीरिक और मानसिक समस्याएं गंभीर हो सकती हैं।
भारत में डिजिटल डिटॉक्स का चलन अब सिर्फ व्यक्तिगत आदत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीति स्तर पर भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। हाल ही में आए इकोनॉमिक सर्वे में भारत के युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत को लेकर चिंता जताई गई है। इस सर्वे में सुझाव दिया गया कि इसका समाधान पूर्ण प्रतिबंध नहीं, बल्कि संतुलन है।
सर्वे में कहा गया कि डिजिटल लत पढ़ाई और कामकाज को नुकसान पहुंचा रही है। इसके साथ ही ध्यान भटकने, नींद की कमी व फोकस घटने के कारण युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रही है। सर्वे में यह भी बताया गया कि 2024 में लगभग 48 प्रतिशत इंटरनेट यूजर ऑनलाइन वीडियो देखते थे, जबकि 43 प्रतिशत यूजर सोशल मीडिया इस्तेमाल करते थे। इसके अलावा 40 प्रतिशत इंटरनेट यूजर ईमेल या म्यूजिक का उपयोग करते थे और 26 प्रतिशत डिजिटल पेमेंट करते थे। इसका मतलब है कि डिजिटल गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
डिजिटल लत को कम करने के लिए कर्नाटक सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। कर्नाटक सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल इस्तेमाल में संतुलन बढ़ाने के लिए 'बियॉन्ड स्क्रीन' नाम से एक डिजिटल डिटॉक्स सेंटर पहल भी शुरू की है। इसके अलावा नए साल 2026 के जश्न में भी यह ट्रेंड दिखाई दिया। नए साल पर बड़ी संख्या में लोगों ने शोर-शराबे वाली पार्टियों की बजाय शांत, हरियाली भरी जगहों पर स्क्रीन से दूरी बनाकर रहना पसंद किया। विशेषज्ञ इसे प्राथमिकताओं को रीसेट करने वाला बड़ा बदलाव मानते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार यह सलाह दे रहे हैं कि संतुलित डिजिटल जीवन जीना जरूरी है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल जानकारी और जुड़ाव के लिए हो, न कि यह जीवन का केंद्र बन जाए। अगर कोई महसूस करे कि सोशल मीडिया उसकी दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, तो तुरंत इस्तेमाल पर नियंत्रण करने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने की सलाह दी जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई संस्थाएं डिजिटल लत को अब एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखने लगी हैं।