
भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में गिना जाता है। देश में 68 हजार किलोमीटर से ज्यादा रेल मार्ग, हजारों स्टेशन और हर दिन करोड़ों यात्री सफर करते हैं। लेकिन इस विशाल नेटवर्क के बावजूद आज भी देश के कुछ जिले ऐसे हैं जहां रेलवे की सीटी कभी नहीं गूंजी या जिला मुख्यालय अब भी सीधे रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ पाया है।
यही वजह है कि जब हम रेलवे को भारत की जीवनरेखा कहते हैं, तो यह सवाल भी उठता है कि आखिर आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी कुछ इलाके रेल मानचित्र से पूरी तरह क्यों नहीं जुड़ पाए?
इस सवाल का जवाब थोड़ा जटिल है। रेल मंत्रालय कई बार संसद में स्पष्ट कर चुका है कि रेलवे परियोजनाओं की योजना जिला-वार नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क के आधार पर बनाई जाती है। इसलिए 'रेलविहीन जिलों' की कोई आधिकारिक राष्ट्रीय सूची जारी नहीं की जाती।
फिर भी विभिन्न राज्य सरकारों, स्थानीय प्रशासनिक रिकॉर्ड और रेलवे परियोजनाओं के आधार पर यह माना जाता है कि कुछ जिलों में या तो:
देश के सबसे चर्चित उदाहरणों में सिक्किम आता है। सिक्किम आज भी ऐसा राज्य है जहां अभी तक कोई चालू रेलवे स्टेशन नहीं है। राज्य को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए सेवोक-रंगपो रेल परियोजना पर काम चल रहा है, लेकिन फिलहाल यात्रियों को सड़क मार्ग पर निर्भर रहना पड़ता है।
इसके अलावा पूर्वोत्तर, हिमालयी और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कई ऐसे जिले हैं जहां रेलवे पहुंचाने की परियोजनाएं वर्षों से निर्माणाधीन हैं।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियां : हिमालयी राज्यों, पूर्वोत्तर भारत और घने जंगलों वाले क्षेत्रों में रेलवे लाइन बिछाना बेहद चुनौतीपूर्ण और महंगा होता है।
पहाड़ों को काटना, लंबी सुरंगें बनाना और बड़े पुल तैयार करना पड़ते हैं। यही कारण है कि सड़क पहले पहुंचती है और रेल बाद में।
कम आबादी और कम यात्री मांग : कुछ जिलों में आबादी कम है और संभावित यात्रियों की संख्या भी सीमित रहती है। ऐसे में परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता चुनौती बन जाती है। रेल मंत्रालय भी परियोजनाओं को यातायात, मांग और लागत के आधार पर मंजूरी देता है।
भूमि अधिग्रहण की समस्या : रेल परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। कई परियोजनाएं वर्षों तक इसी वजह से अटकी रहती हैं। हाल में पश्चिम बंगाल में रणनीतिक रेल परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण तेज करने के फैसले ने इस समस्या को फिर उजागर किया है।
पर्यावरणीय मंजूरियां : वन क्षेत्र, वन्यजीव अभयारण्य और संवेदनशील पारिस्थितिकी वाले क्षेत्रों में रेलवे निर्माण के लिए लंबी मंजूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
रेलवे केवल यात्रा का साधन नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास का इंजन भी माना जाता है। जहां रेल नहीं पहुंचती वहां:
इसी वजह से किसी क्षेत्र तक रेल पहुंचना अक्सर उसके आर्थिक नक्शे को बदल देता है।
| मुद्दा | स्थिति |
|---|---|
| भारत का रेल नेटवर्क | दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में शामिल |
| आधिकारिक रेलविहीन जिलों की सूची | उपलब्ध नहीं |
| पूरी तरह रेलविहीन राज्य | सिक्किम (अभी तक कोई चालू स्टेशन नहीं) |
| मुख्य बाधाएं | पहाड़ी भूगोल, जंगल, भूमि अधिग्रहण, लागत |
| चल रही प्रमुख परियोजना | सेवोक-रंगपो रेल लाइन |
| सबसे अधिक चुनौती वाले क्षेत्र | पूर्वोत्तर और हिमालयी इलाके |
| लाभ | रोजगार, उद्योग, पर्यटन और बेहतर कनेक्टिविटी |