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आजादी के लिए शहीद हुआ एक अनजान परवाना, 15 अगस्त को जेल में ली अंतिम सांस, घर पहुंचा था उसके खून से सने कपड़ों का पार्सल

Freedom Fighter bhaiyya dayaramji: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार भैय्या दयारामजी खरबे को नरसिंहपुर सेंट्रल जेल लाया गया था। जेल में उनके साथ बर्बरता से मारपीट हुई। उनके शरीर पर लगी गंभीर चोटों के कारण 15 अगस्त 1942 को उनकी मौत हो गई। परिवार तक उनकी मौत की खबर भी पहुंची तो खून से सने उनके कपड़ों के पार्सल के साथ, आजादी की ऐसी मार्मिक लड़ाइयां न जानें कितने क्रांतिवीरों ने लड़ी होंगी, जो इतिहास के पन्नों में कहीं दब गईं।
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 11, 2026

MP freedom fighter bhaiya dayaramji kharbe india

MP freedom fighter bhaiya dayaramji kharbe india: AI Creative

Freedom Fighter bhaiyya dayaramji kharbe: 15 अगस्त 1942, देश अभी आजाद नहीं हुआ था। अंग्रेजों की हुकूमत थी। लेकिन उसी दिन, जब भारत के करोड़ों लोग आजादी की उम्मीद में संघर्ष कर रहे थे, नरसिंहपुर की जेल की चारदीवारी के भीतर एक स्वतंत्रता सेनानी ने आखिरी सांस ली। नाम था, भैय्या दयारामजी खरबे। वे उन हजारों लोगों में से थे जिनके लिए आजादी कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जिंदगी का मकसद बन चुकी थी। 1942 में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया, तो देश के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन भड़क उठा। दयारामजी भी इस संघर्ष में शामिल हुए। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। और फिर उन्हें नरसिंहपुर सेंट्रल जेल लाया गया। यहीं से उनकी जिंदगी की आखिरी और सबसे दर्दनाक कहानी शुरू होती है।

जेल में मिला आंदोलन का जवाब बर्बरता से मिला

इतिहास बताता है कि दयारामजी को जेल में बंद कर दिया गया। लेकिन कैद करने के बाद भी अंग्रेजी प्रशासन उनके हौसले को तोड़ना चाहता था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार जेल में उनके साथ मारपीट की गई और उनकी छाती पर गंभीर चोटें आईं। एक स्वतंत्रता सेनानी, जिसने देश के लिए आवाज उठाई थी, अब अंग्रेजी जेल की चारदीवारी में अपने शरीर की चोटों से जूझ रहा था।

बाहर आंदोलन, जेल में जिंदगी और मौत के बीच लड़ाई

बाहर देश में आंदोलन चल रहा था और अंदर जेल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष चल रहा था। फिर आया वह दिन जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता। 15 अगस्त लेकिन आजादी से पहले वाला 15 अगस्त 1942। भारत के लिए यह तारीख आजादी की तारीख नहीं थी। देश को स्वतंत्र होने में अभी पांच साल बाकी थे। लेकिन इसी दिन नरसिंहपुर जेल में दयारामजी खरबे की मौत हो गई।

जिस आजादी को देखने का सपना उन्होंने देखा था, वह उनकी आंखों के सामने नहीं मिल सकी। वे उस भारत को नहीं देख पाए, जिसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। लेकिन उनकी कहानी का सबसे मार्मिक अध्याय अभी बाकी था।

घर पहुंचा ऐसा पार्सल, जिसे देखकर परिवार टूट गया

ये किस्सा वाकई मन को भारी कर देता है कि जिस परिवार को बेटे के लौटने की उम्मीद थी, वो तो नहीं लौटा। लेकिन, उसके खून से सने कपड़े जरूर उसके घर पहुंचा दिए गए। जेल से उसके कपड़े एक पार्सल के माध्यम से परिवार के पास भेजे गए थे और यह सूचना भी कि दयाराम की जेल में मौत हो गई। घटना की खबर और पार्सल में रखे खून से सने कपड़े देखकर दयाराम का परिवार टूट गया। सोचिए जरा उसके परिवार की हालत क्या होगी? परिवार आखिरी मुलाकात और बात तक के लिए तरस गया। बस उन्हें जैसे सूकून होगा कि उनका बेटा मरा तो नहीं, शहीद हुआ है अपने देश के लिए।

दयारामजी की मौत परिवार के लिए त्रासदी थी, लेकिन देश के लिए अहम

दयारामजी की मौत एक परिवार की निजी त्रासदी थी, लेकिन उसके पीछे उस समय के पूरे स्वतंत्रता आंदोलन की कीमत छिपी थी। 1942 में अंग्रेजी सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं। हजारों लोग जेल गए। कई जेलों में बीमारी, कुपोषण, मारपीट और खराब परिस्थितियों ने कैदियों की जिंदगी मुश्किल कर दी। दयारामजी भी उसी दमन का हिस्सा बने। उन्होंने आजादी देखे बिना दुनिया छोड़ दी। लेकिन उनकी मौत उस संघर्ष का हिस्सा बन गई, जिसने आखिरकार 1947 में अंग्रेजी शासन को भारत से विदा होने के लिए मजबूर किया।

आज उनकी कहानी क्यों पढ़नी चाहिए?

दरअसल आज हम 15 अगस्त को देखते हैं तो हमारे लिए यह एक उत्सव है, तिरंगा फहराना है। राष्ट्रगान गाना है। आजादी का जश्न मनाना है। लेकिन 15 अगस्त 1942 को दयारामजी के परिवार के लिए यह खुशी का दिन नहीं था। उनके लिए यह वह दिन था जब जेल की चारदीवारी के भीतर उनका अपना आदमी हमेशा के लिए चला गया। आजादी आने में पांच साल बाकी थे। लेकिन उनका बलिदान आजादी की उस कीमत का हिस्सा था जिसे हजारों परिवारों ने चुकाया। एक लाइन जो पूरी कहानी कह देती है

'देश को आजादी मिलने में पांच साल बाकी थे, लेकिन 15 अगस्त 1942 को एक स्वतंत्रता सेनानी की जिंदगी जेल में खत्म हो गई, और उसकी राहत ताकते परिवार को मिला एक पार्सल जिसमें दयारामजी के कपड़े निकले जो बता रहे थे जेल में यातना झेलते उस आजादी के परवाने की मौत हो गई।'